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संसद को बाधित कर देश का अहित कर रहा विपक्ष

संसद के काम में रोड़ा बनता विपक्ष।

संसद को बाधित कर देश का अहित कर रहा विपक्ष
मानसून सत्र आरंभ होने से पूर्व जिस तरह का अनुमान लगाया जा रहा था, संसद में ठीक वैसा ही दृश्य देखने को मिल रहा है। संसद में लगातार तीसरे दिन भी हंगामा और शोरगुल होता रहा जिससे लोकसभा और राज्यसभा में कोई काम काज नहीं हो सका। विपक्षी दल खासकर कांग्रेस के रवैये को देखकर कहना कठिन है कि यह गतिरोध कब टूटेगा। कांग्रेस की ओर से कहा जा रहा है कि जब तक विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस्तीफा नहीं देंगी तब तक वह संसद नहीं चलने देगी। जबकि वे स्पष्ट कर चुकी हैं कि उन्होंने ललित मोदी की कथित मदद मानवीय आधार पर की थी।
उन्होंने ब्रिटिश सरकार से सिर्फ इतना ही कहा था कि यदि ब्रिटेन ललित मोदी को अपनी कैंसरग्रस्त पत्नी को देखने के लिए पुर्तगाल जाने की इजाजत देता है तो इससे दोनों देशों के रिश्तों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और ब्रिटिश सरकार इस बारे में अपने नियमों के हिसाब से ही फैसला ले। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी कह रहे हैं यह आपराधिक कृत है तो बेहतर यही होता कि उनकी पार्टी अदालत में जाती, क्योंकि अगर गैरकानूनी तरीके से ललित मोदी की मदद की गई है तो कानून के मुताबिक ही कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कांग्रेस इससे बच रही है। इससे तो यही लगता है कि विपक्ष की ओर से राई को पहाड़ बनाया जा रहा है। विपक्षी व्यापमं घोटाले पर भी सरकार को घेरने में लगे हैं। निश्चित रूप से यह गंभीर मामला है, लेकिन उनको इसके साथ ही दूसरे राज्यों में हो रहे घोटालों की भी बात करनी चाहिए।
वे सिर्फ उन्हीं मामलों को न उठाएं जो उन्हें सूट करते हैं। कांग्रेस शासित राज्यों के नेताओं पर गंभीर आरोप लगे हैं। इन पर भी बहस के लिए तैयार रहना चाहिए। यह उचित नहीं है कि वे सत्ता पक्ष के लिए अलग और अपने लिए अलग नियम बनाएं। वैसे भी व्यापमं घोटाले की जांच सीबीआई के हाथों में है, उम्मीद है कि निगरानी सुप्रीम कोर्ट करे, तब जांच प्रभावित होने की संभावना न के बराबर रह जाएगी। स्पष्ट है, कांग्रेस संसद को बाधित कर सिर्फ मोदी सरकार को घेरने में लगी है। उसकी मंशा कामकाज ठप करने की है जिससे सरकार का रिकॉर्ड खराब हो और वह जनता के बीच जाकर उसे असफल करार दे सके। आज वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) और भूमि अधिग्रहण जैसे कई महत्वपूर्ण बिल संसद में लंबित हैं। ये पास हो जाते हैं तो देश की विकास की रफ्तार तेज होगी, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी का यह रवैया जन विरोधी जान पड़ता है।
दरअसल, जब से केंद्र में एनडीए सरकार आई है तभी से कांग्रेस का ऐसा ही रवैया देखने को मिल रहा है। पार्टी एक जिम्मेदार विपक्ष की भूमिका में नजर नहीं आ रही है। वह एक के बाद एक राज्यों का चुनाव हारती जा रही है। गत लोकसभा के चुनावों में भी जनता ने उसे कड़ा सबक सिखाया था, इसके बाद भी वह कुछ नहीं सीख रही है। संसद का कामकाज रोक देना अच्छा संसदीय व्यवहार नहीं है। इसकी अपनी एक गरिमा है, जहां जनता से जुड़े कई अहम निर्णय लिए जाते हैं। विपक्षी दलों को चाहिए कि वे सभी मुद्दों पर संसद में चर्चा करें और सरकार से जवाब मांगें। मोदी सरकार का विरोध करने के क्रम में कहीं ऐसा न हो कि देश की आम जनता के हित प्रभावित हो जाएं।
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