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हिंद महासागर का युद्ध: शांति समूचे विश्व के हक में

हिंदी महासागर में शांति और स्थिरता न केवल भारत के लिए जरूरी है, बल्कि यह विश्व के हक में भी है। खासकर हिंद सागरीय बेल्ट के देशों के लिए भी इस क्षेत्र में उथल-पुथल ठीक नहीं है। इसका कारण यह है कि हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र से विश्व का दो तिहाई कारोबार होता है।

हिंद महासागर का युद्ध: शांति समूचे विश्व के हक में
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हिंदी महासागर में शांति और स्थिरता न केवल भारत के लिए जरूरी है, बल्कि यह विश्व के हक में भी है। खासकर हिंद सागरीय बेल्ट के देशों के लिए भी इस क्षेत्र में उथल-पुथल ठीक नहीं है। इसका कारण यह है कि हिंद-प्रशांत महासागर क्षेत्र से विश्व का दो तिहाई कारोबार होता है। यह क्षेत्र दुनिया का सबसे व्यस्त जलमार्ग है। इससे होकर गुजरने वाले तीन-चौथाई वाहन हिंद महासागर के भारतीय क्षेत्र से बाहर जाते हैं।

यह व्यापार और ईंधन के लिए महत्वपूर्ण जलमार्ग है। विश्व के आधे कंटेनर शिपमेंट, करीब एक-तिहाई माल और दो-तिहाई तेल के शिपमेंट इसी रास्ते होकर जाते हैं। इसलिए हिन्द महासागर के अपने तटों और तटवर्ती क्षेत्रों में बसे देशों से आगे बढ़कर सभी के लिए महत्वपूर्ण होने के चलते भारत ने दोहराया है कि हिंद महासागर में वर्चस्व की जगह आपसी सहयोग पर आधारित निर्बाध आवागमन भारतीय विदेशी नीति की प्राथमिकता है।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज चार दिनों की यात्रा पर वियतनाम व कंबोडिया गई हैं। ये दोनों देश आसियान के अहम सदस्य हैं। दस सदस्यों वाले संगठन आसियान के साथ भारत तेजी से अपना सहयोग बढ़ा रहा है। आज आसियान भारत का चौथा सबसे बडा व्यापारिक भागीदार है। सुषमा की इस यात्रा का मकसद आसियान क्षेत्र के दो अहम मुल्कों- वियतनाम व कंबोडिया के साथ भारत के रिश्तों को गहरा करना है।

साथ ही विदेश मंत्री ने वियतनाम में आयोजित तीसरे हिन्द महासागर सम्मेलन में भी शिरकत की, जिसमें उन्होंने बिना चीन का नाम लिए कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी धीरे-धीरे पूर्व की ओर खिसक रही है, हिन्द महासागर उभरते हुए एशियाई कालखंड के लिए केन्द्र बन गया है। ऐसे में इस क्षेत्र में रहने वालों की पहली प्राथमिकता है कि वह शांति, स्थिरता और समृद्धि बनाए रखें।

चीन द्वारा हिन्द महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ाए जाने के मद्देनजर स्वराज का यह बयान काफी महत्वपूर्ण है। चीन पुराने सिल्क रूट के नव निर्माण के बहाने अपने महत्वाकांक्षी वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट को बढ़ावा दे रहा है। इसके जरिये वह हिंद-प्रशांत महासागर व इस क्षेत्र के देशों में अपना वर्चस्व कायम करना चाह रहा है। इसके साथ ही चीन हिंद महासागर से जुड़ा दक्षिण चीन सागर पर भी अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय नियमों के खिलाफ जाकर चीन हिंद-प्रशांत सागरीय क्षेत्र में अपनी सामरिक स्थिति मजबूत कर रहा है, जो आने वाले समय में इस क्षेत्र देशों के लिए खतरनाक हो सकता है। दक्षिण चीन सागर में अवैध सैन्य बेस निर्माण को लेकर वह अंतरराष्ट्रीय हेग अदालत में फिलीपींस से हार चुका है। चीन की विस्तारवादी नीति हिंद-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र की शांति में बाधक साबित हो रही है।

इससे इंडोनेशिया, मालदीव, मलेशिया, ब्रुनेई, सिंगापुर, मलेशिया, फिलीपींस, लाओस, कंबोडिया, मंगोलिया, थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका आदि देशों की संप्रभुता को चुनौती मिल रही है। भारत की लगातार कूटनीतिक कोशिश रही है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र सामरिक रूप से चीन को मजबूत नहीं होने दिया जाय। इस क्षेत्र चीन का मनमानी रोकने के लिए भारत, अमेरिका, जापान व ऑस्ट्रेलिया की चौकड़ी काम कर रही है।

इसी क्रम में भारत ने आसियान देशों के साथ भी अपनी भागीदारी बढ़ाई है। भारत वियतनाम के साथ व्यापार, समुद्री सुरक्षा और रक्षा क्षेत्र में सहयोग बढ़ा रहा है। पूर्वी देशों के साथ भारत अपने सामरिक संबंधों को मजबूत कर रहा है, उन्हें साथ लेकर भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति कायम रखने में अहम भूमिका निभाता रहेगा।

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