Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

कांग्रेस बसपा गठबंधन: राहुल को माया मिली ना राम

दलितों के एक और बड़े नेता बाबू जगजीवन राम को अपमानित कर एक सफदरजंग से बाहर किया गया। नतीजतन उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। कांग्रेस आज भी सामंतवादी मानसिकता से राजनीति करना चाहती है, जो अब संभव नहीं है।

कांग्रेस बसपा गठबंधन: राहुल को माया मिली ना राम

एक पुरानी परंपरा की याद दिला रहा हूं। जब कोई राजा-महाराजा किसी मुद्दे पर खुश होता था तो तोहफे में हाथी भी देता था, लेकिन नाखुश होने पर वही राजा-महाराजा हाथी के पांव तले कुचलवा भी देते थे। आज सियासत में ‘हाथी’ बिदक चुका है। बसपा अध्यक्ष मायावती ने कांग्रेस के साथ किसी भी तरह के गठबंधन से साफ इनकार कर दिया है।

फिलहाल मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव सामने हैं। भाजपा की नींद उड़ी हुई थी कि यदि इन भाजपा शासित राज्यों में कांग्रेस और बसपा का गठबंधन हो गया तो तीन महत्वपूर्ण और संवेदनशील राज्य भाजपा की गिरफ्त से छूट सकते हैं, नतीजतन असर लोकसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। अब भाजपा राहत की सांस ले सकती है।

मायावती ने कांग्रेस के साथ गठबंधन से इनकार ही नहीं किया, बल्कि गंभीर आरोप भी चस्पां किए हैं। कांग्रेस को ज्यादा जातिवादी, सांप्रदायिक और अहंकारी पार्टी करार दिया है। यही नहीं, पुराना इतिहास भी खंगाला जाने लगा है। बसपा महासचिव सुधीन्द्र भदोरिया याद दिला रहे हैं कि कांग्रेस ने दो-दो बार बाबा भीमराव अंबेडकर को चुनाव हराए।

दलितों के एक और बड़े नेता बाबू जगजीवन राम को अपमानित कर एक सफदरजंग से बाहर किया गया। नतीजतन उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी। कांग्रेस आज भी सामंतवादी मानसिकता से राजनीति करना चाहती है, जो अब संभव नहीं है। यह दौर दलितों, पिछड़ों, गरीबों, आदिवासियों की ताकत का है। बेशक मायावती के निर्णय का प्रभाव देशव्यापी न हो, लेकिन राहुल गांधी का नेतृत्व सवालिया हो सकता है।

यह चर्चा छिड़ चुकी है कि महागठबंधन का नेतृत्व शरद पवार, देवगौड़ा, ममता बनर्जी, मायावती सरीखे वरिष्ठ नेता क्यों न करें? राहुल गांधी अब भी कह रहे हैं कि यदि सहयोगी दलों ने चाहा तो वह प्रधानमंत्री भी बन सकते हैं। मायावती के कांग्रेस से अलग हटने की प्रतिक्रिया में यह विमर्श भी अस्पष्ट तौर पर शुरू हो गया है कि क्षेत्रीय दलों का एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाया जाए जो भाजपा और कांग्रेस से बिल्कुल अलग हो।

इस संदर्भ में तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस ‘संघीय मोर्चा’ की घोषणा की थी, क्या उसे ही आगे बढ़ाया जाएगा? गौरतलब यह है कि तेलंगाना में राव की पार्टी ने कांग्रेस से गठबंधन को इनकार कर दिया है। इसके अलावा बंगाल में तृणमूल ने अभी तक कांग्रेस के साथ गठबंधन का एेलान नहीं किया है। वहां भाजपा दूसरी उभरती हुई ताकत है।

वाममोर्चे का भी कुछ जनाधार है। वाममोर्चा और कांग्रेस केरल में आमने-सामने हैं। ओडिशा में बीजद ने भी कांग्रेस के साथ गठबंधन से इनकार कर दिया है। यह भी निश्चित नहीं है कि कर्नाटक में जनता दल-एस और कांग्रेस में गठबंधन कितने दिन चल पाता है। तमिलनाडु में करुणानिधि के निधन के बाद द्रमुक कितनी ताकतवर साबित होती है, यह भी एक सवाल है और कांग्रेस से गठबंधन तो बाद की बात है।

यदि बिहार में मायावती अपने उम्मीदवार उतारती है तो बेशक बसपा का जनाधार नहीं है, लेकिन वह राजद और कांग्रेस गठबंधन का खेल बिगाड़ सकती है। हरियाणा में बसपा ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो के साथ गठबंधन कर चुकी है। यहां भी किसी और गठजोड़ की उम्मीद नहीं। बहरहाल अभी तो महागठबंधन का सही आकार सामने आना है। उससे पहले ही कांग्रेस को झटका लगा है मानो माया मिली ना राम।

Next Story
Top