Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

हुर्रियत नेताओं से वार्ता का कोई मतलब नहीं

अलगाववादियों पर पाक परस्ती के आरोप लगते रहे हैं।

हुर्रियत नेताओं से वार्ता का कोई मतलब नहीं
X

सरकार ने उच्चतम न्यायालय में कश्मीर की आजादी की मांग करने वाले अलगाववादियों से वार्ता नहीं करने की मंशा जता कर साफ कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में आकर झुकेगी नहीं। अलगाववादियों के आगे सरकार को झुकना भी नहीं चाहिए। इसका कोई फायदा भी नहीं है।

करीब साल भर से अलगाववादी जिस तरह घाटी को अशांत किए हुए हैं और शांत बहाली की सरकार की किसी कोशिश को अंजाम तक नहीं पहुंचने दे रहे हैं, उसमें सरकार के लिए वार्ता टेबल पर आना घुटने टेकने जैसा होगा। अलगाववादियों पर पाक परस्ती के आरोप लगते रहे हैं।

आरोप ये भी हैं कि वे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी व पाक रेंजर के इशारे पर कर कश्मीर में उपद्रव हिंसा जारी रखने का उपक्रम करते रहते हैं। जो अलगाववादियों से वार्ता की वकालत कर रहे हैं, वे पहले उनसे पत्थरबाजी रोकने को क्यों नहीं कह रहे हैं? जम्मू और कश्मीर बार एसोसिएशन को सुप्रीम कोर्ट आने से पहले उन आजादी के नारे लगाने वाले अलगाववादियों से बात करनी चाहिए,

जिन्होंने कश्मीर की घाटी को पत्थरबाजी की भट्ठी में झोंक रखा है। क्या इस बार एसोसिएशन को यह पता है कि अलगाववादियों की ओर से कौन लोग वार्ता करेंगे? वह अगर यह समझता है कि कश्मीर में आलगाववादी नेताओं में शुमार हुर्रियत के अलग-अलग गुटों के नेता सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर अहमद शाह, यासिन मलिक, मीरवाइज उमर फारूक आदि से मोदी सरकार को वार्ता करनी चाहिए तो बार एसोसिएशन की सोच में नयापन नहीं है और कुछ लाभ भी नहीं होगा।

कारण कि पूर्व में भारत सरकार ने इन अलगाववादी नेताओं से अनेक बार वार्ता की है। लेकिन सरकार ने जब भी वार्ता की, अलगाववादी नेता वार्ता से पहले पाकिस्तान सरकार के नुमाइंदों से जाकर मिले। इस मुलाकात के बाद स्पष्ट है कि उस वार्ता का कोई नतीजा नहीं निकलना था और नतीजा सिफर रहा।

पीएम नरेंद्र मोदी की सत्ता संभालने के बाद भी उनकी सरकार ने अलगाववादी नेताओं से वार्ता की कोशिश की, लेकिन सरकार ने शर्त यह लगाई कि वे इस वार्ता से पहले पाक सरकार के नुमाइंदे से नहीं मिलेंगे। लेकिन अलगाववादियों ने शर्त को अनसुना करते हुए पाक सरकार से मिल आए।

मोदी सरकार ने कड़ा निर्णय लेते हुए उस वार्ता को रद कर दिया। उस समय सरकार का यह ठीक कदम था। उसके बाद चंद अलगाववादी नेताओं की पोल भी खुली कि वे भारत का विरोध भी करते हैं और केंद्र सरकार से सुरक्षा और आर्थिक मदद भी डकारते हैं।

इतना ही नहीं वे भारत सरकार के खर्चे पर शाही जीवन जीते हैं और अपने बच्चों को विदेश में रखकर तालीम दिलवाते हैं, जबकि घाटी के गरीब-मजलूम युवाओं को आतंकवाद की भट्ठी में धकेलते हैं। आज भी ये सभी अलगाववादी नेता ही सैकड़ों कश्मीरी युवाओं को गुमराह कर घाटी में अशांति फैला रहे हैं।

वे पिछले साल मोदी सरकार के सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से मिलने तक से इनकार कर चुके हैं। ऐसे में इन्हीं लोगों से फिर वार्ता का कोई मतलब नहीं है। भारत सरकार ने शीर्ष अदालत में ठीक ही कहा है कि सरकार कश्मीरी आवाम के वैध नुमाइंदों से संविधान के दायरे में वार्ता को तैयार है। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और उसका भारत में विलय भी वैधानिक है।

उल्टे पाक पीओके और गिलगित क्षेत्र पर अवैध कब्जा किया हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर बार एसोसिएशन के नेताओं से बहुत ही ठीक कहा कि वह कश्मीर के मौजूदा तनाव को खत्म करने और हालात सामान्य करने के मद्देनजर ऐसे लोगों का नाम बताएं, जो कि कश्मीरी जनता के प्रतिनिधि के तौर पर केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर सकते हैं। वार्ता जरूर हो, लेकिन वार्ता के लिए प्रतिनिधि स्पष्ट हों।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top