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ताकि फिर कभी न हो सके लोकतंत्र पर वैसा प्रहार

हमें स्वाधीनता के साथ-साथ आतंरिक लोकतंत्र भी हासिल हो गया

ताकि फिर कभी न हो सके लोकतंत्र पर वैसा प्रहार
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दुनिया भर में 18वीं और 19वीं सदी में दो मांगों-स्वतंत्रता और लोकतंत्र की स्थापना को लेकर अधिकांश आंदोलन हुए। कई देशों को आजादी तो मिल गई परंतु लोकतंत्र के लिए उन्हें और लंबा संघर्ष करना पड़ा। मगर भारत इस मामले में खुशकिस्मत रहा। हमें स्वाधीनता के साथ-साथ आतंरिक लोकतंत्र भी हासिल हो गया। अर्थात भारत के गणतंत्र की असली शक्ति देश के नागरिकों के हाथों में सौंप दी गई। संविधान के तहत उन्हें अपने अधिकारों के प्रयोग की छूट भी दी गई। आजादी के बाद भारत में लोकतंत्र तमाम सामाजिक-आर्थिक कमियों के बावजूद तेजी से फलने फूलने लगा था
लेकिन सत्तर के दशक में इसके सुनहरे सफर में एक अंधकारमय अध्याय भी जुड़ गया, जब 25 जून, 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आंतरिक आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस को प्रतिबंधित कर दिया गया। बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे स्वतंत्र भारत के इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि कहा था। करीब डेढ़ साल तक देश में लोकतंत्र पर ग्रहण लगा रहा। दरअसल, जून में ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके लोकसभा चुनाव को अवैध करार दे दिया था।
जिसके बाद उनके प्रधानमंत्री के पद पर बने रहना संभव नहीं रह गया था। साथ ही जयप्रकाश नारायण की अगुआईमें देश भर में आंदोलन चल रहा था। माना जाता हैकि सत्ता हाथ से जाने की डर से उन्होंने देश पर तानाशाही थोप दी। हालांकि तब उनके निजी सचिव रहे आरके धवन ने अपने बयान में इसका खंडन करते हुए कहा हैकि आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी दोषी नहीं थीं, बल्कि अदालत के फैसले के बाद वे इस्तीफा देना चाहती थीं लेकिन उनके सहयोगियों ने ऐसा होने नहीं दिया। हालांकि जिस तरह के मजबूत नेता की उनकी छवि थी उसे देखते हुए ऐसा नहीं लगता है कि वे सिर्फ अपने सहयोगियों के कहने पर ही देश पर आपातकाल मढ़ दी होंगी। उस घटना के 40 साल हो गए लेकिन विडंबना यह है कि कांग्रेस का कोई भी शीर्ष नेतृत्व आज तक उसकी निंदा तो दूर अफसोस तक नहीं जताया है। मौजूदा वक्त में देश में लोकतंत्र की जड़ें जिस गहराई में पहुंच गई हैं, उसे देखते हुए आपातकाल लगने के संकेत कम ही दिखाई पड़ते हैं।
देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है। लोगों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता आई है। मीडिया पहले के मुकाबले ज्यादा सक्रिय हुआ है। न्यायपालिका भी नागरिक अधिकारों को लेकर ज्यादा मुखर हुई है। इसके बावजूद पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी देश में आपातकाल लागू होने की स्थितियां मौजूद होने की आशंका जता रहे हैं, तो पक्ष विपक्ष सभी को इस पर गहन मंथन करने की जरूरत है। दरअसल, हमारे संविधान में अब भी वे प्रावधान उसी रूप में मौजूद हैं, जैसा इंदिरा गांधी के दौरान थे। आज उसमें संशोधन कर उसका स्वरूप बदलने की जरूरत है ताकि किसी एक पार्टी या व्यक्ति की इच्छा से फिर कभी लोकतंत्र पर प्रहार नहीं किया जा सके।

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