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भारतीय आजादी के जश्न में नासूर बनता पाकिस्तान

जिन्होंने गुलामी का खौफनाक दौर देखा है, अब उनमें से कुछ ही लोग बचे हैं।

भारतीय आजादी के जश्न में नासूर बनता पाकिस्तान
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देश आजादी का सत्तरवां पर्व मना रहा है। हर तरफ जश्न का माहौल है और हो भी क्यों नहीं। हजारों-लाखों स्वाधीनता सेनानियों की अनथक संघर्षों, कुर्बानियों और बलिदानों के बाद 1947 में आज ही दिन भारत को आजादी हासिल हुई थी। जिन्होंने गुलामी का वह खौफनाक दौर देखा है, अब उनमें से कुछ ही लोग बचे हैं। वह पीढ़ी अब हमारे बीच नहीं है। हां, ऐसे बुजुर्ग अब भी हैं, जिन्होंने आजादी के समय हुए विभाजन और हिंसा की उस त्रासदी को देखा भी है और भोगा भी है। ऐसे लाखों परिवार हैं, जो सरहद के उस पार से इस तरफ आए और जो यहां से उस पार गए।
जड़ों से उखड़कर दूसरे किसी हिस्से में जाकर बसना, अपनी नई पहचान बनाना और जिंदगी की टूटी हुई कड़ियों को जोड़कर नए सिरे से जीवन को आगे बढ़ाना हंसी खेल नहीं है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को अपनी आंखों के सामने कई तरह की हिंसा का शिकार होते देखा है। वक्त बहुत गहरे घाव भी भर देता है, परन्तु कुछ जख्म ऐसे होते हैं, जिन्हें वक्त भी शायद नहीं भर पाता, लेकिन समय की एक गति है और वह किसी के लिए नहीं रुकता। वक्त और घड़ी की सुइयों को हम सत्तर साल पीछे नहीं मोड़ सकते। इस बीच गंगा यमुना, व्यास, सतलुज, चिनाब, रावी, महानदी और कावेरी जैसी नदियों में बहुत पानी बह चुका है। 1947 में भारत का दो देशों के रूप में विभाजन हुआ था। 1971 में एक और विभाजन हुआ। पूर्वी पाकिस्तान बांग्लादेश बन गया और यही वह घटना थी, जिसे पाकिस्तानी सेना और वहां के चरमपंथी भुला नहीं पा रहे हैं।
जिस तरह गिलगित और बलूचिस्तान में पाक सेना जुल्म की नई इबारतें लिखकर वहां के लोगों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है, उसी प्रकार बांग्लादेश के मुक्ति आंदोलन को कुचलने के लिए उसने सारी हदें लांघ दी थी। मानवाधिकारों का वैसा ही उल्लंघन आज पाक अधिकृत कश्मीर, गिलगित, बलूचिस्तान और सिंध में देखने को मिल रहा है, जैसा उस दौर में बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) में देखने को मिलता था। यह सही है कि गांधीजी सहित ऐसे करोड़ों लोग थे, जिन्होंने भारत के विभाजन की कीमत पर आजादी को दिल से स्वीकार नहीं किया था। जिन्नाह और कुछ दूसरे फिरकापरस्त नेताओं की जिद के चलते सांप्रदायिक आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ, परन्तु एक लोकतांत्रिक परिपक्व राष्ट्र के तौर पर वह अपनी पहचान कायम करने में पूरी तरह विफल रहा। भारत जहां विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है, वहीं पाकिस्तान बार-बार सेना के बूटों तले कुचले जाने वाले लोकतंत्र के तौर पर बदनाम देश है।
वहां बेकारी है। भुखमरी है। कानून व्यवस्था नाम की चीज नहीं है। अस्सी फीसदी लोग गरीबी की रेखा से नीचे है। नेता, नौकरशाह, सैन्य अधिकारी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं। लोगों की मूलभूत समस्याओं का चूंकि समाधान नहीं कर सके हैं, इसलिए जो भी सत्ता में होता है वह कश्मीर जैसे भावनात्मक मुद्दे को उछालकर लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ करता रहता है। यही रणनीति वहां की सेना को भी रास आती है। भय दिखाकर ही वह लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों के तख्ते उलटती रही है।
भारत में लोकतंत्र ही परिपक्व नहीं हुआ, उत्तरोत्तर तेजी से विकास भी हुआ है। हालांकि सब कुछ हरा ही हरा है, ऐसा भी दावा नहीं कर सकते। यहां भी गरीबी है, बेकारी है। न्याय बहुत विलंब से मिलता है। भ्रष्टाचार जड़ों को खोखला कर रहा है, परन्तु जनता का दबाव सत्ताधीशों पर निरंतर बना रहता है। यही वजह है कि सुधारों की प्रक्रिया अनवरत जारी है। भारत ने हर क्षेत्र में तरक्की की है, परन्तु अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। जब तक हर हाथ को काम नहीं मिलता। हरेक को इंसाफ नहीं मिलता, तब तक आजादी का जश्न अधूरा है।
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