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20 हजार करोड़ रुपये का है भारतीय फिल्म उद्योग, 2020 तक 23,800 करोड़ रुपये पहुंच जाएगा

देश के फिल्म इतिहास में शायद यह पहली बार होगा, जब प्रधानमंत्री ने फिल्म उद्योग से जुड़ी हस्तियों के साथ सीधे संवाद किया हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय को राष्ट्र को समर्पित करने के मौके पर बॉलीवुड के दिग्गज फिल्मकारों को संबोधित कर राष्ट्र निर्माण व अर्थवयवस्था में फिल्म उद्योग के महत्व को रेखांकित किया।

20 हजार करोड़ रुपये का है भारतीय फिल्म उद्योग, 2020 तक 23,800 करोड़ रुपये पहुंच जाएगा

देश के फिल्म इतिहास में शायद यह पहली बार होगा, जब प्रधानमंत्री ने फिल्म उद्योग से जुड़ी हस्तियों के साथ सीधे संवाद किया हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सिनेमा के राष्ट्रीय संग्रहालय को राष्ट्र को समर्पित करने के मौके पर बॉलीवुड के दिग्गज फिल्मकारों को संबोधित कर राष्ट्र निर्माण व अर्थवयवस्था में फिल्म उद्योग के महत्व को रेखांकित किया।

एक साल में सबसे अधिक फिल्म भारत में बनने के बावजूद यह क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का शिकार रहा है। फिल्म निर्माण के लिए चाहे पूंजी की उपलब्धता की बात हो, या शूटिंग के लिए मंजूरी की, सरकार के स्तर पर दिक्कतें रही हैं। आज अगर भारतीय फिल्मों ने विश्व स्तर पर अपनी पहचान बनाई है तो यह अपने दम पर किया है।

पीएम मोदी की सरकार ने फिल्म उद्योग की कठिनाइयों को समझा है और उनकी राह आसान करने की दिशा में अनेक कदम उठाने का ऐलान किया है। फिल्म को उद्योग का दर्जा के बाद शूटिंग के लिए सिंगल विंडो शुरू करने, पायरेसी रोकने के लिए कठोर कानून बनाने का भरोसा दिया। अभी देश में शूटिंग करने के लिए एक फिल्म निर्माता को करीब 70 मंजूरी और लाइसेंस लेने पड़ते हैं।

इसके लिए उसे 30 विभागों के पास जाना पड़ता है। ऑस्कर के लिए नामित फिल्मों के प्रोमोशन में भी सरकार की मदद का ऐलान किया गया। यह एक अच्छा विचार है। पीएम ने दावोस में हुए विश्व आर्थिक मंच सम्मेलन की तरह भारत में वैश्विक फिल्म सम्मेलन आयोजित करने का भी आइडिया दिया। दरअसल देश को सांस्कृतिक मजबूती देने में भारतीय फिल्मों का बड़ा योगदान है।

भारत में इतनी विविधताएं हैं और इतने प्राकृतिक सौंदर्य का खजाना है कि अगर देश में अधिक से अधिक शूटिंग हो तो जहां भारत का विश्व स्तर पर पर्यटन उद्योग मजबूत होगा, वहीं रोजगार सृजन के साथ अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी। हाल के वर्षों में विदेशों में शूटिंग का क्रेज बढ़ा है, लेकिन जरूरत भारत की विविधताओं की मार्केटिंग की भी है। फिल्म यह काम बखूबी कर सकती है।

भारत में सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों को दूर करने की दिशा में फिल्म ने सराहनीय काम किया है। राष्ट्रवाद जगाने, सामाजिक व धार्मिक सदभाव की दिशा में भी फिल्म ने शानदार काम किया है। आलम आरा से अपना सफर शुरू करने वाले फिल्म उद्योग की स्मरणीय यात्रा को 140 करोड़ की लागत से बने राष्ट्रीय संगहालय में सहेजना आने वाली पीढ़ी के लिए धरोहर की नींव रखना है।

यह संग्रहालय भारतीय सिनेमा की एक सदी की संपूर्ण यात्रा को एक सूत्र में पिरोकर एक कहानी की भांति दर्शकों के समक्ष पेश करेगा। भारत की सांस्कृतिक शक्ति (सॉफ्ट पावर) में फिल्मों की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारतीय फिल्मों का अनुकरण पूरे दक्षिणी एशिया, ग्रेटर मध्य पूर्व, दक्षिण पूर्व एशिया और पूर्व सोवियत संघ में भी होता है।

अमेरिका व ब्रिटेन भी भारतीय फिल्मों के महत्वपूर्ण बाजार बन गए हैं। आज बॉलीवुड यूएस के हॉलीवुड तथा चीनी फिल्म उद्योग के साथ एक वैश्विक उद्योग बन गया है। सबसे अधिक फिल्में भारत में बनती हैं। यहां सभी भाषाओं में मिलाकर प्रति वर्ष 1,600 तक फिल्में बनती हैं। निर्माण में भारत के बाद नाइजीरिया सिनेमा, हॉलीवुड और चीन का स्थान आता है।

करीब 20 हजार करोड़ रुपये के मौजूदा भारतीय फिल्म उद्योग 2020 तक 23,800 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा। इसकी वार्षिक ग्रोथ 10 फीसदी से अधिक है। इसलिए भारतीय फिल्म उद्योग के विकास पर और ध्यान देने की जरूरत है। तकनीक के मामले में अभी भी हमारी फिल्में विदेश पर निर्भर हैं। इस ओर सरकार व फिल्म उद्योग को ध्यान देने की जरूरत है। चूंकि फिल्म के साथ टेलीविजन निर्माण में भी भारत बड़ा बाजार है, इसलिए इसे और भी प्राेत्साहित करने की आवश्यकता है। उम्मीद है सरकार इस ओर ध्यान देगी।

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