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भारतीय शिक्षा नीति: विकराल होती बेरोजगारी, विफल होते रोजगार के वादे

स्कूली स्तर पर तकनीकी,व्यावसायिक वोकेशनल कोर्स के मामले में नेशनल सैंपल सर्वे के एक अध्ययन के अनुसार, स्कूली शिक्षा के दौरान कंप्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त 44 प्रतिशत घर बैठे हैं।

भारतीय शिक्षा नीति: विकराल होती बेरोजगारी, विफल होते रोजगार के वादे

युवा शक्ति हर युग में और हर समाज में सबसे उर्वर मानी जाती रही है। आर्थिक विकास के लिहाज से भी युवा शक्ति समाज के लिए वरदान हो सकती है। सो, अगर भारत के नीति नियंता इस बात से खुश हैं कि उन्हें युवा शक्ति का अक्षय भंडार मिला है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह तथ्य भारत के ही लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है कि 2020 में एक औसत भारतीय की उम्र महज 29 साल होगी। औसत चीनी और अमेरिकी नागरिक 37 साल का होगा। उसी साल पश्चिम यूरोप में यह उम्र 45 साल और जापान में 48 साल होगी।

21वीं सदी में भारत की जिस प्रभावी भूमिका की चर्चा हम पिछले कुछ समय से लगातार सुनते आ रहे हैं और जिस भूमिका के लिए अब देश तैयार हो रहा है जिसका मुख्य आधार भी यही है कि भारत अब एक लंबे समय तक सबसे युवा देश बना रहने वाला है। लेकिन अब सबसे बड़ी समस्या यह है कि इतनी बड़ी युवा आबादी को सही दिशा कैसे दे या इतनी बड़ी युवा आबादी को राष्ट्र निर्माण के लिए सकारात्मक दिशा में कैसे मोड़ें? इस महत्वपूर्ण प्रश्न का सिर्फ एक ही जवाब है कि सम्ाग्र शिक्षा और रोजगार के माध्यम से हम देश के युवाओं को सही दिशा दे सकतें हैं,

जबकि अभी देश में रोजगारपरक शिक्षा न मिलने से बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है। देश के श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के आधार पर तैयार आर्थिक सर्वेक्षण 2016-17 में कहा गया है कि रोजगार के अवसर पैदा करने की गति सुस्त हुई है। श्रम मंत्रालय के पांचवें वार्षिक रोजगार-बेरोजगार सर्वेक्षण की रिपोर्ट में कहा गया है कि बेरोजगारी दर पांच फीसदी रही। देश में बेरोजगारी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पढ़े-लिखे लोगों मे बेरोजगारी के हालात ये हैं कि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के पद के लिए प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले और इंजीनियरिंग के डिग्रीधारी भी आवेदन करते हैं।

रोजगार के मोर्चे पर हालात विस्फोटक होते जा रहे हैं। सरकार को चाहिए कि इस मसले पर वह गंभीरता से विचार करे। घोषित तौर पर सरकारी योजनाएं बहुत हैं, मगर क्या उन पर ईमानदारी से अमल हो पाता है? इसकी जांच करने वाला कोई नहीं। आखिर देश के युवा कहां जाएं, क्या करें, जब उनके पास रोजगार के लिए मौके नहीं हैं, समुचित संसाधन नहीं हैं, अधिकतर योजनाए सिर्फ कागजों में सीमित हैं। पिछले दिनों एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आईआईटी नहीं बल्कि आईटीआई है सदी की जरूरत। उनकी इस बात का सीधा मतलब प्रशिक्षित युवा से था जिसे अपनी आजीविका चलाने के लिए कुछ काम आता हो,

क्योंकि आज देश में हालात ऐसे हैं कि आधे से ज्यादा पढ़े लिखे उच्च शिक्षित युवा बेरोजगार हैं उन्हें कोई काम नहीं आता या आंशिक तौर पर जो काम आता है उसमें वो ठीक से प्रशिक्षित नहीं है। वैसे तो देश में युवाओं को शिक्षा और वोकेशनल ट्रेनिंग देने के लिए कई कार्यक्रम चल रहे हैं, लेकिन उन सब में सबसे अहम है आईटीआई क्योकि इसका बुनियादी ढांचा गांव और कस्बों तक मौजूद है। शिक्षाविद डॉ अशोक गदिया के अनुसार अगर सरकार सिर्फ आईटीआई की गुणवत्ता को सुनिश्चित कर दे तो देशभर के आधे बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिल जाए।

असली समस्या यह है हर नई सरकार आते ही अपने एजेंडे के हिसाब से कई कार्यक्रम चलाती है, लेकिन वो पुराने बुनियादी और बने बनाए ढांचे को ठीक नहीं करती। सरकार बदलते ही कार्यक्रम बदलते रहते हैं, पर तस्वीर वही रिती है, क्योकि वो जमीनी स्तर पर काम नहीं करते। स्कूली स्तर पर तकनीकी,व्यावसायिक वोकेशनल कोर्स के मामले में नेशनल सैंपल सर्वे के एक अध्ययन के अनुसार, स्कूली शिक्षा के दौरान कंप्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त 44 प्रतिशत घर बैठे हैं। टेक्सटाइल प्रशिक्षण प्राप्त 66 प्रतिशत के पास नौकरियां नहीं हैं।

स्कूलों में वोकेशनल कोर्स किए हुए सिर्फ 18 प्रतिशत युवाओं को ही संबंधित ट्रेड की नौकरी मिल पाई है, बाकी 82 प्रतिशत अपनी पढ़ाई का लाभ नहीं उठा पाए। ज्यादातर बेरोजगारी झेलने को मजबूर हैं। इस 18 प्रतिशत में से मात्र 40 प्रतिशत को ही औपचारिक शर्तों पर नौकरी मिली। जाहिर है कि शेष 60 प्रतिशत की नौकरी अस्थाई किस्म की है। नौकरियां हासिल करने वालों में 30 प्रतिशत ऐसे थे, जिनके पास स्नातक अथवा उच्च डिग्री थी। हमें सोचना होगा कि चाहे वोकेशनल कोर्स हो, आईटीआई हो, डिप्लोमा हो, इंजीनियरिंग की डिग्री हो आखिर कुछ भी पढ़ लेने के बाद बेरोजगार ज्यादा क्यों हैं?

सच्चाई यह है कि इन सभी जगहों पर ठीक से प्रशिक्षण प्राप्त युवा नहीं हैं। जाहिर सी बात है जिन युवाओं को कोई काम नहीं आता ऐसे में कोई कंपनी उन्हें क्यों लेगी। अगर किसी तरह से ले भी लिया तो पहले वो उन युवाओं को अपने काम के हिसाब से प्रशिक्षण देगी जिस पर उन्हें पैसे खर्च करने होगे। देश में युवाओं को स्किल और वोकेशनल ट्रेनिंग देने के लिए जितने भी कार्यक्रम चल रहे हैं, उनमे फिलहाल आईटीआई सबसे अहम है जिस पर सबसे ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। देश में प्रशिक्षित युवा नहीं निकल रहें हैं तो साथ में यह भी सच है कि उनकी फैकल्टी ही ठीक से प्रशिक्षित नहीं है।

देश में 14000 आईटीआई हैं, जिनमें लगभग 2000 सरकारी और 12000 प्राइवेट हैं। आईटीआई शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण आज भी एक बड़ी चुनौती है, क्योकि सिर्फ सरकार अपने 2000 आईटीआई के लिए ट्रेनिंग उपलब्ध कराती है और इसके लिए कुछ टीचर ट्रेनिंग संस्थान भी हैं, लेकिन 12000 प्राइवेट आईटीआई के लिए टीचर ट्रेनिंग उपलब्ध कराना आज भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि निजी क्षेत्र में आज भी पर्याप्त टीचर ट्रेनिंग संस्थान नहीं है। अधिकांश प्राइवेट आईटीआई शिक्षक जब खुद ट्रेंड नहीं हैं, ऐसे में वो बच्चों को कैसे ट्रेनिंग दे पाएंगे?

कुल मिलाकर आईटीआई शिक्षकों के लिए टीचर ट्रेनिंग संस्थान और गुणवत्ता के मानक स्थापित किए जाने की जरूरत है। आईटीआई की गुणवत्ता को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि 2012 के पहले खुले लगभग 10000 आईटीआई की गुणवत्ता को रिव्यू और असेसमेंट कैसे किया जाए, क्योंकि अब वो नाबेट (नेशनल ऐक्रीडेशन बोर्ड फार एडुकेशनल एंड ट्रेनिंग) से अपना ऐक्रीडेशन नहीं कराना चाहते न सरकार ही उन्हें बाध्य कर पा रही है।

कुल मिलाकर देश में निचले स्तर पर सबसे पहले आईटीआई पर ध्यान देना होगा, क्योंकि इसकी पहुंच समाज के निचले स्तर तक है। कुल मिलाकर सरकार का मेक इन इंडिया कार्यक्रम भी तभी सफल हो पाएगा जब शिक्षा व्यवस्था में बुनियादी बदलाव किया जाएगा। वास्तव में हम अपने ज्ञान को बहुत ज्यादा व्यावहारिक नहीं बना पाए है। आज पूरी शिक्षा व्यवस्था में खासकर वोकेशनल कोर्स, आईटीआई, डिप्लोमा, इंजीनियरिंग में बड़े इनोवेशन की जरूरत है । तभी हम देश की एक बड़ी युवा आबादी को रोजगार दिला पाएंगे।

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