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डाॅ. रहीस सिंह का लेख : भारत को साथ लेकर चलना होगा

अमेरिका में आज के हालात मेंं यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जो बाइडेन अमेरिका काे किस रास्ते पर ले जाएंगे? वे ट्रंप डाॅक्ट्रिन को आगे बढ़ाएंगे या ओबामा युग की ओर लौटेंगे? एक सवाल यह भी है कि बाइडेन की रीसेट या फारवर्ड पाॅलिसी, जो भी बनती है उसमें भारत के लिए कितनी और किस प्रकार की जगह होगी? फिलहाल यह दौर यूनिटी फॉर पीस का नहीं, बल्कि इसमें स्ट्रैटेजी फॉर वार के लिए अधिक स्पेस दिख रहा है। ऐसे में बाइडेन इंडो-पैसिफिक में भारत के रणनीतिक महत्व को अनदेखा नहीं कर पाएंगे। हालांकि वे कह चुके हैं कि भारत अमेरिका का नेचुरल फ्रेंड है, वैश्विक जरूरतें आगे भी इसके अनुपालन को बाध्य करती रहेंगी।

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बाइडेन 

डाॅ. रहीस सिंह

जो बाइडेन अमेरिका की जब सत्ता संभालने जा रहे हैं, तब अमेरिका पहले से कुछ बदला हुआ दिख रहा है, विशेषकर 6 जनवरी को कैपिटल हिल बिल्डिंग यानि अमेरिकी संसद में घटी घटना के पश्चात। दरअसल 6 जनवरी की घटना साधारण नहीं थी, बल्कि एक अमेरिका के अंदर ही एक अमेरिका का आक्रमण था और दूसरे अमेरिका का पराभव था। कैपिटल हिल में 6 जनवरी को जो हुआ, वैसा अमेरिका के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इसने ट्रंप को तो शून्य पर ला ही दिया, अमेरिका की साख को भी बट्टा लगाया। विश्व शक्ति के अपने अस्तित्व के सरवाइवल से जूझते अमेरिका में इस तरह की घटना यह बता रही है कि अमेरिकी लोकतंत्र अपने सबसे खराब समय से गुजर रहा है। अगर हाल के अश्वेत असंतोष के उभार के साथ वर्तमान घटना को जोड़कर विश्लेषण करें तो ऐसा लगता है कि अमेरिकी समाज में एक तरह की बेचैनी है। हालांकि इस बेचैनी की कई वजहें हो सकती हैं। इसकी एक खास वजह यह है कि पिछले कुछ वर्षों से पोस्ट ट्रुथ ने राष्ट्रों के भीतर अपनी एक खास जगह बना ली है, डोनाल्ड ट्रंप भी इसी पोस्ट ट्रुथ की देन हैं। जो बाइडेन को इसके साथ ही आगे बढ़ने की कोशिश करनी होगी।

दूसरी बात यह है कि अमेरिकी समाज आज ज्यादा विभाजित है और अमेरिका तरक्की में पिछड़ा हुआ एक देश, जैसा कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अभी हाल ही में कहा है। तीसरी बात-अमेरिका अब विश्व व्यवस्था का नेतृत्व नहीं कर रहा है, बल्कि कई अंतरराष्ट्रीय विचारकों को लग रहा है कि विश्व व्यवस्था में शक्ति संतुलन पश्चिम से पूरब की तरफ शिफ्ट कर रहा है और अमेरिकी नेतृत्व वाले पश्चिमी ब्रांड की साख धूमिल हो चुकी है। चौथी बात-वुहान वायरस अथवा चीनी वायरस के रूप में कोरोना की आम तौर पर स्वीकृति के बाद चीन का ट्रस्ट डेफिसिट बढ़ा, लेकिन चीन जियो इकोनाॅमी के खेल में सफल रहा। इस वैश्विक महामारी के बीच चीन अपना आर्थिक माॅडल बेचने में सफल हो गया। यही नहीं कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से अमेरिका के अलग होने और रीजनल काॅम्िप्रहेंसिव इकोनाॅमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) का नेतृत्व हासिल करने के बाद चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ क्षेत्रीय आर्थिक मंचों कहीं ज्यादा स्पेस प्राप्त कर ले गया, इसलिए यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि जो बाइडेन अमेरिका काे किस रास्ते पर ले जाएंगे? बाइडेन ट्रंप डाॅक्ट्रिन को आगे बढ़ाएंगे या फिर वे ओबामा युग की ओर लौटेंगे? एक सवाल यह भी है कि बाइडेन की रीसेट या फारवर्ड पाॅलिसी, जो भी बनती है उसमें भारत के लिए कितनी और किस प्रकार की जगह होगी?

अब अमेरिका, जो बाइडेन और डोनाल्ड ट्रंप के बीच एक विभाजक रेखा खींचने की कोशिश करते हैं। ट्रंप ने अमेरिका फर्स्ट की शुरुआत की, जो राष्ट्रवाद का एक नया पैकेज था, लेकिन इसके चलते अमेरिका के सहयोगी भी उससे दूरे हो गए। ट्रंप ने अमेरिका रीजनल काॅम्िप्रहेंसिव इकोनाॅमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) से बाहर कर एशिया-प्रशांत के इकोनाॅमिक ब्लाॅक में चीन का खुला छोड़ दिया। एक ऐसे बाजार को जो ग्लोबल जीडीपी में लगभग तिहाई स्टेक रखता है। ट्रंप ने कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अमेरिका को बाहर कर दूसरे विश्व युद्ध के बाद से इन पर स्थापित अमेरिकी प्रभाव और लीडरशिप को एक ही झटके में समाप्त कर दिया। ट्रंप एक तरफ चीन के साथ व्यापार युद्ध लड़ते रहे दूसरी तरफ उन्होंने उसके साथ मिलकर 35 बिलियन डाॅलर के बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव ज्वांइट फंड की स्थापना कर दी जो चीन के लिए एक ऐसा स्ट्रैटेजिक हथियार है जो पावर एक्सिस की दिशा बदल सकता है और पावर प्वांइट को वाशिंगटन से बीजिंग पहुंचा सकता है। परिणाम यह हुआ कि अमेरिका आज ऐसे क्राॅस रोड्स (चौराहे) पर खड़ा दिख रहा है जहां से उसे आगे की दिशा सुनिश्चित करने में समय लग सकता है। इस स्थिति में बाइडेन के सामने दो विकल्प हैं। एक- वे ट्रंप डाॅथ में निर्मित डिप्लोमैटिक हाइवे पर ही चलें। दो- बैक ट्रैक का चुनाव करें। पहले विकल्प का चुनाव वे करना नहीं चाहेंगे, लेकिन यदि वे उसे खारिज करते हैं तो उन्हें ओबामा रेजिम की ओर लौटना होगा। इस स्थिति में अमेरिका संक्रमण की ओर बढ़ेगा। यदि यह लम्बा खिंचा तो अमेरिका के हाथ से कप्तानी छिन जाएगी, जो अभी तक कमोबेश उसी के पास है।

मोटे तौर पर भविष्य की पावर एक्सिस में तीन ध्रुव (पोल) ही हैं वाशिंगटन, बीजिंग और माॅस्को। मूल प्रतिस्पर्धा वाशिंगटन और बीजिंग के बीच है। विशेषकर ट्रेड वार को लेकर, लेकिन क्या सच में यह ट्रेड वार ही है या कुछ और? वैसे यह टकराव जितना सामान्य दिखता है, वैसा है नहीं। इसमें जियोपोलिटिक्स है, जियोस्ट्रेटजी है, वार टैक्टिस है और सबसे बड़ी चीन की एकाधिकारवादी-नवसाम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएं। चूंकि माॅस्को-बीजिंग बाॅन्ड काफी मजबूत है और डेमस्कस, तेहरान, इस्लामाबाद, प्योंगयांग.......आदि इसके प्रभाव में हैं, इसलिए बाइडेन की राह काफी कठिन होगी। जहां तक भारत के साथ रिश्तों की बात है तो राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी की दोस्ती को कुछ विचारकों ने असामान्य परिधियों तक देखा और स्वीकार किया। जिसका परिणाम यह हुआ कि भारत अमेरिका का नेचुरल पार्टनर बना, लेकिन ऐसा नहीं इस दौर में दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति नहीं बनी। ट्रंप ने ईरान के साथ हुए परमाणु समझौते को जब एकतरफा निरस्त किया था तो उसके साथ ही भारत को ईरान से कारोबार को बंद करने संबंधी दबाव भी बनाया था।

उस समय ट्रंप प्रशासन ने जिन 8 देशों को ईरान से कारोबार बंद करने का अल्टीमेटम दिया था उनमें भारत भी था। यह अलग बात है इस दौर में डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ सांसदों के साथ भारत के बहुत अच्छे रिश्ते नहीं रहे। चूंकि डेमोक्रेट्स का पाकिस्तान के प्रति साॅफ्ट कार्नर रहता है, इसलिए इस बात की भी संभावना है कि बाइडेन प्रशासन भारत का साथ पाक मसले पर उस तरह से न दे जैसे ट्रंप ने दिया। अगर बाइडेन विदेश नीति के ओबामा ट्रैक पर चले तो चीन के प्रति साॅफ्ट कार्नर रख सकते हैं। दरअसल ओबामा ने चीन के तुष्टिकरण के चलते भारत को सबकांटिनेंटल पावर के रूप में पेश करने में परहेज किया जबकि उन्हीं की टीम ने भारत को इस रूप में अनुरेखित किया था। अमेरिका को अगर अपनी कप्तानी बचानी है तो चीनी प्यार का इजहार सरेआम कम करना होगा और भारत से पुख्ता बाॅन्डिंग करनी होगी।

फिलहाल यह दौर यूनिटी फॉर पीस का नहीं दिख रहा, बल्कि इसमें स्ट्रैटेजी फॉर वार के लिए कहीं अधिक स्पेस दिख रहा है। ऐसे में जो बाइडेन इंडो-पैसिफिक में भारत के रणनीतिक महत्व को किसी भी तरह से अनदेखा नहीं कर पाएंगे। हालांकि वे पहले भी कह चुके हैं कि भारत अमेरिका का नेचुरल फ्रेंड है, वैश्विक जरूरतें, विशेषकर इंडो-पेसिफिक की, आगे भी उन्हें इसके अनुपालन के लिए बाध्य करती रहेंगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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