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T-20 मैच: दर्शकों का दुर्व्यवहार खेल के लिए नुकसानदेह

दूसरे टी-20 मैच में टीम इंडिया के खराब प्रदर्शन के बाद दर्शकों के उपद्रव ने देश को दुनिया के सामने शर्मसार कर दिया है।

T-20 मैच: दर्शकों का दुर्व्यवहार खेल के लिए नुकसानदेह
अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला के नाम पर खेली जा रही सीरीज के तहत सोमवार को कटक के बाराबती स्टेडियम में दूसरे टी-20 मैच में टीम इंडिया के खराब प्रदर्शन के बाद दर्शकों के उपद्रव ने देश को दुनिया के सामने शर्मसार कर दिया है। स्टेडियम में बैठे दर्शकों ने पहले भारतीय टीम के कम स्कोर पर जल्दी आउट हो जाने पर नाराज हो कर मैदान पर पानी की बोतलें फेंकी।
बाद में जब दक्षिण अफ्रीका की टीम आसानी से जीत के करीब बढ़ रही थी तब फिर से उन्होंने हंगामा खड़ा कर दिया और पानी की बोतलें फेंकने लगे, जिससे मैच को थोड़े- थोड़े अंतराल में दो बार रोकना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी-20 मैच में भारत की हुई लगातार दूसरी हार से ज्यादा दर्द दर्शकों के दुर्व्यवहार ने दिया है। भद्रजनों का खेल कहे जाने वाले क्रिकेट में दर्शकों का अभद्र हो जाना कोई नई बात नहीं है। दर्शकों द्वारा इस तरह के शर्मनाक व्यवहार पहले भी हुए हैं।
1996 में कोलकाता के ईडन गार्डन मैदान पर खेले गए विश्वकप सेमीफाइनल मैच में भी भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन से नाराज दर्शकों ने स्टेडियम में बोतलें फेंकनी शुरू कर दी थी। इतना ही नहीं, कुछ दर्शकों ने तो आग भी लगा दी थी। स्थिति बिगड़ते देख अंपायरों ने मैच रोक दिया और र्शीलंका को विजेता घोषित कर दिया गया। उस फैसले से विनोद कांबली मैच अधूरा रहने पर अपने आंसू नहीं रोक पाए थे। इसके अलावा फरवरी 1999 में भारत-पाकिस्तान के बीच कोलकाता के ईडन गार्डन में ही खेले गए एशियन टेस्ट चैंपियनशिप के पहले टेस्ट के दौरान दर्शकों के अभद्र व्यवहार को कौन भूल सकता है, जब उन्हें खदेड़ने की नौबत आ गई थी।
यही नहीं विदेशों में जब कभी टीम इंडिया खराब प्रदर्शन करती है तब भी देश में क्रिकेट प्रेमी उनके प्रति बुरा बर्ताव करते देखे जाते रहे हैं। इस साल विश्व कप में जब टीम इंडिया हार गई थी तब क्रिकेटरों के खिलाफ कैसे कैसे अपशब्द प्रयोग किए गए थे, उनको सोचकर ही शर्म का अनुभव होता है। जाहिर है, ऐसे व्यवहार से खेल भावना नाम का शब्द चकनाचूर हो जाता है। ऐसे दृश्य सवाल पैदा करते हैं कि दर्शक क्या सिर्फ अपनी ही टीम को जीतते देखना चाहते हैं? क्या यह संभव है कि कोई टीम हमेशा जीते ही।
यह ठीक हैकि भारत में क्रिकेट एक धर्म की तरह है। क्रिकेट प्रेमियों के लिए खिलाड़ी भगवान जैसे होते हैं, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि जब दो टीमें मैदान पर उतरती हैं तो उसमें से एक की हार होनी ही है। और यह जीत-हार स्टेडियम में बैठे दर्शकों के अनुसार तय न होकर उस टीम द्वारा उस दिन किए गए प्रदर्शन पर निर्भर करती है। एक सच्चा खेल प्रेमी वही है जो हारने वाली टीम को भी उतना ही सम्मान देता है जितना जीतने वाली टीम को।
एक दर्शक के रूप में हमें खेल को जीत-हार से ऊपर उठकर देखना होगा, तभी हमें सभी खेल प्रतिस्पर्धाएं मनोरंजक लगेंगी और इसी तरह हम उस खेल के विकास में योगदान भी दे सकेंगे। याद रखें, यदि हम अपने देश में खेल को फलते-फूलते देखना चाहते हैं तो हमें सम्मानित और धैर्यवान खेलप्रेमी बनना होगा। दुनिया के जो देश खेल में आगे हैं, वहां के दर्शकों में ये गुण मौजूद हैं।
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