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आलोक पुराणिक : भारत बनाम चीन आर्थिक मोर्चा

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भारत-चीन सीमा विवाद: भारत सरकार का बड़ा फैसला, 4जी के उपयोग के लिए चीनी उपकरणों पर लगाई रोक

आलोक पुराणिक

देश में चीन के खिलाफ गहरे विरोध का माहौल है। बीच में यह खबर भी है कि चीनी ब्रांड के मोबाइल फोनों की बिक्री में तेजी है। कुछेक मिनटों की सेल में हजारों में फोन बिक रहे हैं, भारतीय उपभोक्ताओं को चीनी फोनों की दीवानगी इस कदर है कि चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स यह कहने की हिम्मत जुटा पाता है कि भारतीयों के लिए चीनी आइटम बहुत जरूरी जैसे हो गए हैं।

जनवरी मार्च 2020 के आंकड़ों के मुताबिक स्मार्टफोन बाजार का करीब 30 प्रतिशत शाओमी, 17 प्रतिशत वाईवो, 12 प्रतिशत ओप्पो और 14 प्रतिशत रीयल मी के पास था। करीब अस्सी प्रतिशत चीनी ब्रांडों के पास था। करीब पचास करोड़ स्मार्टफोन हैं भारत में यानी 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में अभी स्मार्टफोन का बाजार बहुत जोरदार है। चीन इस बाजार पर लगभग कब्जा कर चुका है, अभी अस्सी प्रतिशत स्मार्टफोन चीनी ब्रांड के ही हैं।

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने सिनेमा और खेल की बड़ी हस्तियों को जारी एक खुले पत्र में आमिर खान, दीपिका पादुकोण, कैटरीना कैफ, विराट कोहली और अन्य लोगों से अपील की गई है कि वे चीनी उत्पादों का विज्ञापन करना बंद करें, जबकि दूसरी ओर कैट ने अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, शिल्पा शेट्टी, माधुरी दीक्षित, महेंद्र सिंह धोनी, सचिन तेंदुलकर और अन्य लोगों से राष्ट्रीय आंदोलन भारतीय सम्मान-हमारा अभिमान के तहत चीनी उत्पादों के बहिष्कार में शामिल होने का न्योता दिया है। उधर, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने लोगों से चीन के उत्पादों का बहिष्कार करने की अपील की।

2019-20 का आर्थिक सर्वेक्षण बताता है कि अप्रैल 2019 से नवंबर 2019 के आंकड़ों के हिसाब से चीन और हांगकांग को मिलाकर भारत को करीब चालीस अरब डालर का व्यापार घाटा हुआ, सामान के आयात-निर्यात में। भारत और भारतीय चीनी माल खरीदते ही जा रहे हैं, कुछ वजहें हैं। चीन से माल सस्ता पड़ता है। दवाओं के निर्माण में इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थों की बात करें, तो हम 70 फीसदी चीन पर निर्भर हैं। देश में टीवी के 80 फीसदी एलईडी पैनल चीन से आ रहे हैं। गत एक वर्ष के दौरान भारत ने चीन से 81 हजार करोड़ रुपये के टीवी उपकरणों का आयात किया था। एयरकंडीशनर के 80 फीसदी कंप्रेसर चीन से ही आयात किए जाते हैं। चीनी एप्लीकेशन टिकटाॅक के भारतीय दीवाने हैं। 20 अप्रैल से 20 मई 2020 के बीच आरोग्य सेतु 4 करोड़ 28 लाख बार डाउनलोड किया गया और टिकटाॅक का नंबर दूसरा था 2 करोड़ 67 लाख बार डाउनलोड हुआ सिर्फ एक महीने में ही। पेटीएम, बिग बास्केट, बायजूस, फ्लिपकार्ट, मेक माय ट्रिप, ओला, ओयो, स्विगी, जोमाटो जैसे प्रसिद्ध कारोबारों में चीन से निवेश है।

ऐसा नहीं है कि केंद्र सरकार को इन सारे तथ्यों की जानकारी नहीं है। केंद्र सरकार ने कोविड-19 महामारी के कारण भारतीय कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण को रोकने के लिए मौजूदा एफडीआई-प्रत्यक्ष विदेश निवेश नीति में संशोधन किया, 18 अप्रैल 2020 को जारी एक सरकारी आदेश का आशय यह था कि जिन देशों के साथ भारत की सीमाएं मिलती हैं, उन देशों से आने वाले निवेश की वजह से अगर भारतीय कंपनियों की स्वामित्व की स्थिति में परिवर्तन होता है, तो उसकी मंजूरी सरकार से लेनी होगी। एक तरह से यह कदम भारतीय कंपनियों को चीनी कंपनियों, चीनी संस्थाओं के नियंत्रण से बचाने की कोशिश है। चीनी कंपनियां दुनियाभर में कोविड-19 के चलते मच रही अफरातफरी का फायदा उठाकर तमाम देशों में कंपनियों को सस्ते-मंदे में खरीदकर उन पर अपना नियंत्रण पक्का कर रही हैं। भारत के इस कदम का चीन ने विऱोध किया। कुल मिलाकर स्थितियां यह हैं कि चीन के खिलाफ आर्थिक युद्ध की एक ठोस तैयारी की जरूरत है। चीन के आइटमों को रोककर चीन को संदेश दिया जा सकता है, पर इसकी कीमत है। चीनी आइटम सस्ते होते हैं और सस्ते कई कारणों से होते हैं।

चीन में कैदियों से लेकर, बंधुआ मजदूरों तक से काम कराया जा सकता है। 2011 में पीटर नवारू और ग्रेग आॅट्री की एक किताब आई थी-डेथ बाय चायना, इसमें लेखकों ने बताया था कि किस तरह से चीन अमेरिकन अर्थव्यवस्था को तबाह कर रहा है, ट्रंप इस किताब से बहुत प्रभावित हुए थे। डेथ बाय चायना नें पीटर नवारु और ग्रेग आॅट्री ने साफ किया था कि तमाम वजहों से चीन में बना हुआ माल सस्ता पड़ता है। अगर सस्ता माल मिलता है तो राष्ट्रभक्ति एक तरफ चली जाती है। चीन की आर्थिक ताकत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वर्ष 2000 में चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकन अर्थव्यवस्था की 10 प्रतिशत बनती थी। अब चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिकन अर्थव्यवस्था की करीब 66 प्रतिशत बनती है।

कुल मिलाकर चीन ने अपनी आर्थिक हैसियत बनाई है, पर चीन ने दुनिया में बहुत बदनामी भी कमाई है। तमाम देश चीन के खिलाफ खड़े हो गए हैं। इस स्थिति का राजनयिक इस्तेमाल तो सरकार अलग तरह से कर सकती है, पर यदि भारतीय उद्यमी सस्ता और टिकाऊ साजो सामान बनाकर भारतीय उपभोक्ताओं को दें, तो वो चीन की तरफ क्यों जाएंगे। भारतीय उपभोक्ता चीन भक्त नहीं हैं, पर सस्ता माल उन्हें लुभाता है। भारतीय उद्यमियों को सोचना होगा कि किस तरह से सस्ता माल अपने उपभोक्ताओं को दिया जा सकता है। इसी तरह से उनको भारतीय उत्पादों की तरफ लाया जा सकता है। भावनात्मक अपील का अपना मतलब है, पर भावनात्मक अपील बहुत लंबे समय तक कारगर नहीं हो सकती है। यह देखा जा रहा है कि इस वक्त भी चीनी मोबाइलों की सेल में कुछ मिनटों में हजारों फोन बिक रहे हैं।

भारतीय उद्यमियों को चीन का मुकाबला बाजार में सस्ते आइटम और बढ़िया आइटम देकर करना होगा। इस काम में सरकार की मदद जरूरी है। सेना तो सीमा पर मुकाबला कर रही है और करेगी, पर सारे मुकाबले सीमा पर नहीं होते। चीन से होने वाले मुकाबले तो भारतीय बाजारों में हो रहे हैं। इसमें विजय हासिल करनी होगी। इसके लिए भारतीय उद्योगपतियों और सरकार को गंभीरता से और तेजी से कुछ सोचना होगा। यह लड़ाई लंबी है और सिर्फ भावना से नहीं जीती जा सकती।

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