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12 सालों से दगा दे रहा मानसून, देश पर मंडराया जल संकट का खतरा

एक जून से अब तक औसतन यह 44 प्रतिशत कम बारिश का संकेत है। इस साल मानसून की शुरुआत ही आठ दिन की देरी से केरल के तट पर हुई थी, लेकिन बाद में गुजरात में आए वायु चक्रवात के कारण इसकी रफ्तार पहले तो धीमी हुई और फिर जैसे थम ही गई। अलबत्ता देश पेयजल के संकट से जूझता दिखाई दे रहा है। चेन्नई में बूंद-बूंद पानी को लोग तरस गए हैं।

12 सालों से दगा दे रहा मानसून, देश पर मंडराया जल संकट का खतराIndia Threatens Water Crisis

देश के माथे पर मानसून ने चिंता गहरा दी है। इस साल पिछले 12 सालों में मानसून की गति धीमी है। आम तौर पर इस समय तक देश के दो तिहाई हिस्सों में झमाझम बारिश हो जाती है, किंतु अभी इसकी पहुंच महज 10 से 15 फीसदी क्षेत्रों में हुई है। एक जून से अब तक औसतन यह 44 प्रतिशत कम बारिश का संकेत है। इस साल मानसून की शुरुआत ही आठ दिन की देरी से केरल के तट पर हुई थी, लेकिन बाद में गुजरात में आए वायु चक्रवात के कारण इसकी रफ्तार पहले तो धीमी हुई और फिर जैसे थम ही गई। अलबत्ता देश पेयजल के संकट से जूझता दिखाई दे रहा है। चेन्नई में बूंद-बूंद पानी को लोग तरस गए हैं।

यहां कि आईटी और आॅटोमोबाइल कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को घर से पानी लाने के निर्देश दे दिए हैं। इस जल संकट ने खेती-किसानी के लिए भी संकट खड़ा कर दिया है। देश के नीति-नियंताओं को चेतने की जरूरत है, क्योंकि हमारी खेती-किसानी और 70 फीसदी आबादी मानसून की बरसात से ही रोजी-रोटी चलाती है और देश की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी खेती है। गोया, इस हद तक मानसून का कमजोर होना हमारी ढाई ट्रिलियन डाॅलर की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक संकेत है।

सालाना बारिश में जून और सितंबर के बीच 70 प्रतिशत पानी बरसता है। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार 14 जून तक 8.22 मिलियन हेक्टेयर रकबे में ही बुबाई हो पाई है, जो इसी अवधि में पिछले साल हुई बुवाई के आंकड़ों से 9 प्रतिशत कम है। दरअसल वह खेती-किसानी ही है, जो समूची आबादी को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश के ज्यादातर व्यवसाय भी कृषि आधारित हैं। देश की जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी है।

देश में मौसम का अनुमान लगाने वाली सरकारी एजेंसी के साथ निजी एजेंसी स्काईमेट भी है, लेकिन दोनों के अनुमान कसौटी के धरातल पर खरे नहीं उतरे। मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है तब कम दाव का क्षेत्र बनता है। इस कम दाव वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है।

निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं। ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर उड़ीसा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल-प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक बरसती हैं।

अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य-प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।

अब मानसून की कछुआ चाल को नापने का जो आंकड़ा मौसम विभाग ने दिया है, वह सूखे का स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहा है। 22 जून तक विभाग ने औसतन 39 फीसदी कम बारिश दर्ज की है। ओडिशा और लक्षद्वीप संभागों में सामान्य वर्षा दर्ज की गई है। जबकि जम्मू-कष्मीर और पूर्वी राजस्थान में अधिक वर्षा हुई है। इनके विपरीत अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बहुत अधिक वर्षा हुई हैं। इन क्षेत्रों के जलाशयों में जल बिल्कुल निचले स्तर तक पहुंच जाने के कारण सूखे की स्थिति निर्मित हो गई है।

गंभीर जल-संकट से जूझ रहे चेन्नई, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और कराईकल उप-संभागों में करीब 38 फीसदी कम बारिश हुई है। चेन्नई के प्रमुख चारों तालाब सूख जाने से पेयजल का संकट बढ़ गया है। इस संकट को दूर करने के लिए वेल्लोर और जोलारपेट से एक करोड़ लीटर पानी विशेष रेल से मंगाया गया है। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू का भूजल स्तर पिछले दो दशक में दस से बारह मीटर नीचे खिसक गया है। महाराष्ट्र 47 साल का सबसे बड़े सूखे के संकट की त्रासदी झेल रहा है।

नीती आयोग की रिपोर्ट के अनुसार अगले साल ऐसे ही जल संकट के दायरे में 10 करोड़ लोग आ जाएंगे। 2030 तक तो देश की 40 फीसदी आबादी इस संकट के दायरे में होगी। ऐसा नहीं है कि देश इन हालातों से निपटने में सक्षम नहीं है। अलबत्ता चिंता का बड़ा कारण यह है कि नदियों, तालाबों और देश के अन्य परंपरागत जल स्रोतों को संभालने की बजाय उन्हें नश्ट करने की नीतियां अस्तित्व में बनी हुई है। आपात स्थिति से निपटने के लिए कोई दूरगामी कार्य योजना भी दिखाई नहीं दे रही है। लिहाजा सूखे और पेयजल का संकट फिलहाल तो गंभीर ही बना रहने वाला है।

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