Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

प्रधानमंत्री को श्रीलंका जाने का फैसला करना चाहिए

भारत की विदेश नीति कोई एक राज्य और वहां के कुछ नेता तय करें, यह कहीं से भी उचित नहीं है।

प्रधानमंत्री को श्रीलंका जाने का फैसला करना चाहिए
X

भारत की विदेश नीति कोई एक राज्य और वहां के कुछ नेता तय करें, यह कहीं से भी उचित नहीं है। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में 15 से 17 नवंबर तक होने वाली राष्ट्रमंडल देशों की सरकार प्रमुखों की बैठक (सीएचओजीएम) में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के भाग नहीं लेने के लिए तमिलनाडु की राजनीति से आने वाले कुछ केंद्रीय मंत्रियों और राज्य की प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों डीएमके और एआईएडीएमके की ओर से जिस तरह के दबाव बनाए जा रहे हैंवह दुर्भाग्यपूर्ण है। राज्य सरकार ने तो इसके खिलाफ तमिलनाडु विधानसभा में प्रस्ताव भी पास कर रखा है। क्षेत्रीय दल इसके जरिए चुनावी फायदे लेना चाहते हैं परंतु केंद्र सरकार क्यों इतना विचार कर रही है। अभी तक प्रधानमंत्री की बैठक में भाग लेने पर संशय क्यों है। यह स्थिति दिखाती हैकि संघीय व्यवस्था में जहां संघ को मजबूत होना चाहिए था अब राज्य प्रभावी हो रहे हैं। किसी भी देश की विदेश नीति एक क्षेत्र या राज्य से संबंधित नहीं होती है, बल्कि उससे समूचा देश प्रभावित होता है। राज्यों को भी समझना होगा कि क्षेत्रीय विषयों को आधार बनाकर राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह की स्थिति पैदा कर रहे हैं उससे भविष्य में देश कूटनीतिक स्तर पर कई समस्याओं में उलझ सकता है। विदेश नीति के मोर्चे पर राज्य की ओर से संघ को झुकाने का उदाहरण सिंतबर 2011 में देखने को मिला था जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी के दबाव में बांग्लादेश के साथ तीस्ता नदी समझौता नहीं हो पाया था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को तब बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के सामने शर्मसार होना पड़ा था। राज्य एक देश की विदेश नीति तय नहीं कर सकते। किसी भी राष्ट्र के व्यापक हित होते हैं। यह राज्य की सीमाओं से परे होते हैं। केंद्र को भी चाहिए कि जहां राष्ट्रहित की बात हो वहां राज्यों के दबावों से स्वतंत्र होकर निर्णय करे। बांग्लादेश की नाकामी से सबक ले प्रधानमंत्री को श्रीलंका जाना चाहिए। केंद्र को विदेश नीति तय करने के अधिकार को पूरी ताकत के साथ इस्तेमाल करना चाहिए। यदि नहीं जाते हैं तो भविष्य के लिए ठीक नहीं होगा।

भारत श्रीलंका की अनदेखी नहीं कर सकता है। प्रधानमंत्री के कोलंबो नहीं जाने से श्रीलंका भारत के परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों चीन और पाकिस्तान के और करीब जा सकता है। चीन इस मौके की तलाश में रहता है कि वह श्रीलंका के रास्ते भारत की सामरिक घेराबंदी कर सके। इसके अलग भी कई मुद्दे हैं जिसके लिए भारत को श्रीलंका की जरूरत है। दोनों के द्विपक्षीय संबंध हमेशा से अच्छे रहे हैं। वैसे भी पड़ोसियों के साथ हमारे रिश्ते संवाद, सहयोग और भरोसे के होने चाहिए। यह सही है कि श्रीलंकाई तमिलों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं हुआ है पर इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत अतीत की घटनाओं को पकड़कर बैठा रहे और भविष्य की ओर न देखे। प्रधानमंत्री के जाने का मतलब यह नहीं है कि तमिलों की हत्या के मुद्दे पर भारत श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को माफ कर रहा है, बल्कि वहां जाकर सार्वजनिक तौर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर प्रधानमंत्री श्रीलंका पर दबाव बना सकते हैं।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story