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प्रभात कुमार रॉय : चीन से चौंकन्ना ही रहे भारत

भारत कूटनीतिक तौर पर सभी विश्व शक्तियों के साथ मधुर संबंध बनाए रखने का सदैव ही हिमायती रहा है। दक्षिण एशिया में चीन की सैन्य दादागिरी से निपटने के लिए भारत को क्वाड में सक्रिय होना पड़ा है, जिससे कि चीन और रूस दोनों देश ही सशंकित हो उठे हैं। भारत की रूस के साथ प्रगाढ़ और अटूट दोस्ती सदैव कायम बनी रही है और इतिहास में गहन संकट के दौर में प्रत्येक कसौटी पर खरी उतरी है। भारत चीन के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहता, किंतु चीन की विस्तारवादी कुटिल कूटनीति और रणनीति का भारत कड़ा मुकाबला भी करेगा। जैसा कि लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक अपनी पचास हजार सेना को सरहद पर तैनात करके चीन को स्पष्ट संकेत दे दिया है।

भारत-चीन बॉर्डर पर झड़प: सिक्किम के नाकुला में 20 चीनी सैनिक घायल
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भारत-चीन बॉर्डर 

प्रभात कुमार रॉय

भारत-चीन की सरहद पर तकरीबन 13 महीनों तक जारी रहे जबरदस्त सैन्य तनाव के तत्पश्चात जब भारत के रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने संसद के पटल पर आधिकारिक तौर पर कहा है कि दोनों देशों के मध्य दीर्घ काल तक चलती रही कूटनीतिक और सैन्य वार्ताओं के पश्चात यह सहमति बन गई है कि दक्षिण लद्दाख में विद्यमान पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिणी किनारों से दोनों देशों की सेनाएं पीछे हट जाएगीं। भारतीय रक्षामंत्रालय ने अपने बयान में कहा है कि पैंगोंग क्षेत्र से दोनों देशों की सेनाओं ने पीछ हटना शुरु भी कर दिया है। उल्लेखनीय है दक्षिण लद्दाख क्षेत्र में अनेक ऊचें-ऊंचे पहाड़ों की चोटियों पर भारतीय सैनिकों द्वारा रणनीतिक तौर पर अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर लिए गए हैं। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा संसद के पटल पर यह भी फरमाया गया है कि चीन द्वारा लद्दाख के 38000 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित किया हुआ है। उल्लेखनीय है कि भारत और चीन के मध्य वर्ष 1962 का भीषण युद्ध लद्दाख में स्थित आक्साईचीन के इसी 38000 वर्ग किलोमीटर इलाके के विवाद को लेकर ही अंजाम दिया गया था। विगत वर्ष जनवरी के महीने से भारत- चीन सरहद पर पर सैन्य तनाव से जबरदस्त गतिरोध कायम बना रहा है। भारत चीन के मध्य विद्यमान सरहद को आमतौर पर लाइन ऑफ एक्च्यूअल कंट्रोल (एलएसी) कहा जाता है। एलएसी वस्तुतः दोनों देशों के मध्य सन्ा् पचास के दशक से ही गंभीर तौर पर विवादित बनी रही है। अतः एलएसी को दोनों राष्ट्रों द्वारा अधिकारिक तौर पर कदापि तसलीम नहीं किया गया है।

विगत वर्ष जून में को दक्षिण लद्दाख में स्थित गलवान घाटी में भारत और चीन के सैन्य टुकड़ियों के मध्य एक भयानक हिंसक झड़प अंजाम दी गई थी। इस खूनी झड़प में भारत के 20 और चीन के तकरीबन 40 सैनिकों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थी। लद्दाख की गलवान घाटी औ पैंगोंग झील के साथ ही एलएसी पर स्थित उत्तरी लद्दाख के देपसांग क्षेत्र में भी चीनी लालसेना द्वारा अपने सैन्य ठिकाने स्थापित कर लिए गए है। भारत को बहुत अधिक कूटनीतिक कौशल और सैन्य मजबूती के साथ देपसांग इलाके को चीनी लाल सैनिकों के आधिपत्य से मुक्त कराने की कोशिशें तेज कर देनी चाहिए, क्योंकि देपसांग क्षेत्र से दौलत बेग ओल्डी और कारोकोरम दर्रे को आसानी से लाल सेना अपना निशाना बना सकती है, जोकि भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्र हैं। सियाचीन के दुर्गम रणनीतिक क्षेत्र में पाकिस्तान का निर्णायक सैन्य मुकाबला करने में उत्तरी लद्दाख के देपसांग क्षेत्र का अहम किरदार रहा है।

विस्तारवादी फितरत के राष्ट्र चीन द्वारा सन्ा् 1950 के दशक से ही भारतीय जमीन पर शनैः शनैः अतिक्रमण करके आधिपत्य स्थापित करने की रणनीति अख्त्यार की गई थी और आक्साईचीन पर आधिपत्य स्थापित कर लिया गया था। सन्ा् 2017 में भूटान के डोका ला इलाके में अपने सैन्य ठिकाने निर्मित करने प्रारम्भ किए गए तो भारत द्वारा बाकायदा कड़ा सैन्य विरोध प्रकट किया गया.उल्खनीय है कि भूटान की सैन्य हिफाजत करने की जम्मेदारी भारत पर रही है, अतः भारत द्वारा डोकाला में अपनी सेना तैनात कर दी गई थी। अंततः दो महीनों की निरंतर सैन्य तकरार के बाद डोका ला विवाद का निदान कर लिया गया। साऊथ चाइना सागर में स्थित अनेक द्वीपों पर शनैःशनैः कब्जा जमाने की रणनीति को चीन अंजाम देता रहा है। वियतनाम फीलिपीन, जापान, कंबोदिया, लाओस, थाईलैंड आदि देशों के कड़े प्रतिरोध और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस द्वारा चीन के विरुद्ध दिए गए निर्णय के बावजूद चीन दूसरे देशों की जमीन पर कब्जा जमाने की अपनी रणनीति से कदम पीछ नहीं हटा रहा है. यक्ष प्रश्न है कि चीन की विस्तारवादी फितरत को मद्देनजर रखते हुए भारत को चीन पर अब कितना अधिक भरोसा करना चाहिए। लद्दाख से लेकर अरुणाचलम तक संपूर्ण एलएसी पर भारत और चीन के मध्य सैन्य तनाव बना हुआ है। पैंगोंग झील से एक अच्छी शुरुआत हो गई है किंतु कूटनीति और सैन्य वार्ताओं की कामयाबी की परीक्षा तो अरुणाचलम में की जानी है, जिस पर चीन अपना दावा 50 के दशक से जता रहा है।

भारत और चीन बड़े व्यापारिक साझीदार है और और अनेक अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साझीदार के तौर पर सक्रिय रहे है। ब्रिक्स, शंघाई सहयोग संगठन, एशिया इंफ्रास्ट्रकचर इंवैस्टमैंट बैंक, ब्रिक्स डवलैपमैंट बैंक आदि आदि। आजकल चीन का कड़ा आर्थिक और रणनीतिक मुकाबला अमेरिका के साथ है जोकि आर्थिक और सैन्य शक्ति के तौर पर चीन का सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी है। डोनॉल्ड के पराजित हो जाने और जॉ बिडेन के अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर आसीन हो जाने के तत्पश्चात भी चीन और अमेरिका के मध्य जारी तनाव के शैथिल्य हो जाने के बहुत ही कम आसार है।

भारत कूटनीतिक तौर पर सभी विश्व शक्तियों के साथ मधुर संबंध बनाए रखने का सदैव ही हिमायती रहा है। दक्षिण एशिया में चीन की सैन्य दादागिरी से निपटने के लिए भारत को क्वाड में सक्रिय होना पड़ा है जिससे कि चीन और रुस दोनों देश ही सशंकित हो उठे हैं और क्वाड की सक्रियता को अपने खिलाफ अमेरिका की साजिश करार देने लगे हैं। भारत की रुस के साथ प्रगाढ़ और अटूट दोस्ती सदैव कायम बनी रही है और इतिहास में गहन संकट के दौर में प्रत्येक कसौटी पर खरी उतरी है। क्वाड रणनीति के विषय में भारत ने रुस को भरोसा दिया है। भारत चीन के साथ भी मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित करना चाहता, किंतु चीन की विस्तारवादी कुटिल कूटनीति और रणनीति का भारत कड़ा मुकाबला करेगा। जैसा कि लद्दाख से लेकर अरुणाचल तक अपनी पचास हजार सेना को सरहद पर तैनात करके चीन को स्पष्ट संकेत दे दिया है। वस्तुतः भारत कदापि चीन पर भरोसा नहीं कर सकता। भारत को वस्तुतः भविष्य में भी पाकिस्तान और चीन संयुक्त सैन्य शक्ति का मुकाबला करना है। अतः अपनी सैन्य तैयारियों का तेज रफ्तार को कायम बनाए रखना होगा।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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