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कश्मीर पर तुर्की को कड़ा संदेश दे भारत

विश्व यह भी जानता है कि कश्मीर भारत व पाक के बीच दि्वपक्षीय मामला है। ऐसे में तुर्की के पास किसी भी रूप में कोई अधिकार नहीं है कि वह भारतीय कश्मीर के बारे में कुछ भी बोले। पाकिस्तान के प्रति दोस्ती दिखाने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन का संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में कश्मीर का मुद्दा उठाना गलत है। भारत के लिए यह बर्दाश्त से बाहर है।

कश्मीर पर तुर्की को कड़ा संदेश दे भारत
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : वैश्विक मंचों से बार-बार कश्मीर मसला उठाने वाले तुर्की को कड़ा जवाब दिए जाने की जरूरत है। केवल विरोध दर्ज कराने या कड़ी आपत्ति जताने भर से बात नहीं बनेगी। भारत को तुर्की को कड़े लहजे में समझाना चाहिए कि उसे कश्मीर पर अनाप-शनाप बोलना बंद करना चाहिए। तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगन मुस्लिम देशों का नेता बनने के युटोपियाई सनक में संयुक्त राष्ट्र के मंच का इस्तेमाल कश्मीर को लेकर अनर्गल बयान देने के लिए लंबे समय से करते आ रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि पश्चिम, मध्य व दक्षिण एशिया के अधिकांश मुस्लिम देशों को तुर्की फूटी आंख नहीं सुहाता है। तुर्की के कट्टर इस्लामिक रवैये से मुस्लिम देश भी आजीज हैं। इस वक्त अधिकांश मुस्लिम देशों के भारत से मधुर संबंध हैं और वे कश्मीर पर पाकिस्तान के प्रोपेगैंडे को समझते हैं। यह विश्व ज्ञात तथ्य है कि एकीकृत जम्मू-कश्मीर का भारत में विधिवत विलय हुआ था और पाकिस्तान ने अनधिकृत तरीके से कश्मीर के कुछ हिस्से पर कब्जा किया था।

संयुक्त राष्ट्र भी यह बात जानता है कि पीओके, गिलगित-बाल्टिस्तान समेत समूचे जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, पीओके पर पाक का अवैध कब्जा है। यूएन प्रस्ताव के अनुसार भी पाकिस्तान को पीओके व गिलगित-बाल्टिस्तान खाली कर देना चाहिए, यूएन ने ऐसा करने के लिए साफ कहा था। विश्व यह भी जानता है कि कश्मीर भारत व पाक के बीच दि्वपक्षीय मामला है। ऐसे में तुर्की के पास किसी भी रूप में कोई अधिकार नहीं है कि वह भारतीय कश्मीर के बारे में कुछ भी बोले। पाकिस्तान के प्रति दोस्ती दिखाने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन का संयुक्त राष्ट्र महासभा के 76वें सत्र में कश्मीर का मुद्दा उठाना गलत है। भारत के लिए यह बर्दाश्त से बाहर है। पिछले साल भी एर्दोगन ने यूएन में जम्मू-कश्मीर का जिक्र किया था। भारत ने उस वक्त भी इसे 'पूरी तरह अस्वीकार्य' बताया था और कहा था कि तुर्की को अन्य राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए और अपनी नीतियों पर गहराई से विचार करना चाहिए। कश्मीर पर सऊदी अरब हमेशा तटस्थ रहा है, लेकिन तुर्की बीते कुछ सालों से मुस्लिम जगत की रहनुमाई के नाम पर कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है।

असल में तुर्की की दिली इच्छा है कि वह सऊदी अरब के मुकाबले मुस्लिम जगत में खुद को लीडर के तौर पर पेश कर सके। बीते कुछ सालों में पाकिस्तान के रिश्ते एक तरफ सऊदी अरब से पहले के मुकाबले कमजोर पड़े हैं तो वहीं तुर्की से बेहतर हुए हैं। यह भी एक वजह है कि तुर्की की ओर से अकसर कश्मीर के मसले पर टिप्पणी की जाती रही है। इस बार भी भारत ने तुर्की को आईना दिखाया है कि उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए कि वह साइप्रस के साथ क्या कर रहा है? विदेश मंत्री एस जयशंकर ने साइप्रस के अपने समकक्ष निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स के साथ द्विपक्षीय बैठक कर साइप्रस के संबंध में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रासंगिक प्रस्तावों का पालन करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

भारत ने कहा कि तुर्की को साइप्रस पर यूएन के प्रस्तावों का पालन करना चाहिए। यह तुर्की को भारत का साफ संदेश है कि वह साइप्रस के साथ न्याय करे। साइप्रस मंक लंबे समय से चल रहे संघर्ष की शुरुआत 1974 में यूनान सरकार के समर्थन से हुए सैन्य तख्तापलट से हुई थी। इसके बाद तुर्की ने यूनान के उत्तरी हिस्से पर आक्रमण कर दिया था, तबसे साइप्रस पर अवैध रूप से उसका कब्जा है। भारत संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों के तहत इस मामले के शांतिपूर्ण समाधान की वकालत करता रहा है। तुर्की को कूटनीतिक रूप से कठोर संदेश दिया जाना जरूरी है, भारत को बिना देर किए ऐसा करना चाहिए।

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