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अंतरिक्ष में सुपर पावर बनने की राह पर भारत

भारत के स्कैटसैट-1 सैटेलाइट्स समुद्र के अंदर होने वाली हर हलचल, साइक्लोन और तूफान पर नजर रखेगा व अहम जानकारी भेजेगा।

अंतरिक्ष में सुपर पावर बनने की राह पर भारत
भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन (इसरो) ने अब तक के अपने सबसे मुश्किल और लंबे मिशन पीएसएलवी-सी35 को लांच कर एक बार फिर इतिहास रचा है। इसरो का यह पहला मिशन है, जिसमें आठ सैटेलाइटों को दो अलग-अलग ऑर्बिट में पहुंचाया गया। इनमें पांच विदेशी हैं। इनमें भारत के तीन और अमेरिका-कनाडा के एक-एक और अल्जीरिया के तीन सैटेलाइट्स शामिल हैं। सभी सैटेलाइटों को ऑर्बिट तक पहुंचाने में 2.15 घंटे से ज्यादा का वक्त लगा।
भारत के स्कैटसैट-1 सैटेलाइट्स से समुद्र, मौसम की जानकारी मिलेगी। यह समुद्र के अंदर होने वाली हर हलचल- साइक्लोन और तूफान पर नजर रखेगा और अहम जानकारी भेजेगा। इस पर 120 करोड़ रुपये की लागत आई है। स्कैटसैट-1 द्वारा ले जाए गए कू-बैंड स्कैट्रोमीटर पेलोड के लिए एक सतत अभियान है। कू-बैंड स्कैट्रोमीटर ने वर्ष 2009 में ओशनसैट-2 उपग्रह द्वारा ले जाए गए एक ऐसे ही पेलोड की क्षमताएं पहले से बढ़ा दी हैं।
पीएसएलवी-सी35 राकेट अपने साथ आईआईटी मुंबई और बेंगलुरु यूनिवर्सिटी का सैटेलाइट पिसाट भी साथ ले गया। ये सैटेलाइट्स पृथ्वी की स्टडी में मदद करेगा। प्रथम का उद्देश्य कुल इलेक्ट्रॉन संख्या का आकलन करना है, जबकि पीसाट अभियान रिमोट सेंसिंग अनुप्रयोगों के लिए नैनोसेटेलाइट के डिजाइन एवं विकास के लिए है। पांच विदेशी उपग्रहों में से अल्जीरिया के- अलसैट-1बी, अलसैट-2बी और अलसैट-1एन, अमेरिका का पाथफाइंडर-1 और कनाडा का एनएलएस-19 शामिल हैं।
इसरो का यह मिशन मुश्किल इसलिए है कि इसमें अलग-अलग अंतराल के बाद सैटेलाइटों को आर्बिट में स्थापित किया गया। यह पहली बार नहीं है जब इसरो ने इतिहास रचा है। इससे पहले इसी साल जून में एक साथ 20 सैटेलाइट लांच कर उसने नया कीर्तिमान बनाया था। उसमें तीन उपग्रह अपने थे, जबकि 17 विदेशी थे। इनमें ब्रिटेन और सिंगापुर के उपग्रह थे। इससे पहले इसरो ने वर्ष 2008 में 10 उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था।
1962 में स्थापना के बाद शुरूआती दौर में जीएसएलवी व पीएसएलवी सीरीज के कुछ उपग्रहों की असफलताओं के बाद से इसरो लगातार सफलताएं हासिल कर रहा है। इसरो ने अपने कारनामों से चीन को भी पीछे छोड़ दिया है। आज अमेरिकी स्पेस संगठन नासा के बाद इसरो दुनिया का सबसे भरोसेमंद स्पेस शोध संस्थान बन गया है। दुनिया में जब स्पेस साइंस की शुरूआत हुई थी, तब रूस का दबादबा था।
सोवियत रूस ने विश्व के पहले उपग्रह स्पूतनिक का सफल प्रक्षेपण कर दुनिया में अपनी धाक जमाई थी, लेकिन दो ध्रुवीय दुनिया में अपनी बादशाहत कायम रखने के लिए अमेरिका ने चांद पर सबसे पहले मानव को उतार कर यूएसएसआर को जवाब दिया था। तब से सोवियत संघ और अमेरिका के बीच स्पेस में दौड़ जारी रही। भारत को रूस के साथ अच्छे संबंध का सपेस साइंस में भी लाभ मिला। लेकिन दुनिया में अकेले सुपरपावर बनने की चाहत में अमेरिका ने भारत के स्पेस मिशन में अड़ंगा लगाया।
उसने रूस को अपनी क्रायोजेनिक इंजन तकनीक भारत को देने से रोक दिया। भारत ने अमेरिकी अड़ेंगे का डटकर मुकाबला किया और क्रायोजेनिक इंजन खुद बनाया। आज भारत ने अमेरिकी सैटेलाइट को नासा से कम खर्च में स्पेस में लांच कर साबित कर दिया कि प्रतिभा को कोई रोक नहीं सकता है। मंगलयान भी भारतीय विज्ञान की बड़ी उपलब्धि है। अब इसरो व्यवसायिक प्रक्षेपण भी सफलतापूर्व कर रहा है। वह दिन दूर नहीं जब भारत स्पेस में एक सुपर पावर होगा।
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