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भारत रूस संबंध: इतिहास रच रहे पीएम मोदी, यूएस-चीन का ट्रेडवार पर दुनिया की नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक दिनी रूस यात्रा कई मायनों में अहम है। तेजी से बदल रहे वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अपने हितों की रक्षा करना जरूरी है। मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ शिखर वार्ता उस समय हुई है, जब रूस और चीन करीब आ रहे हैं और रूस की पाकिस्तान नीति में बदलाव आ रहा है, उत्तर कोरिया वैश्विक चिंता बना हुआ है, साथ ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रोज अपनी नीति बदल रहे हैं।

भारत रूस संबंध: इतिहास रच रहे पीएम मोदी, यूएस-चीन का ट्रेडवार पर दुनिया की नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक दिनी रूस यात्रा कई मायनों में अहम है। तेजी से बदल रहे वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए अपने हितों की रक्षा करना जरूरी है। मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ शिखर वार्ता उस समय हुई है, जब रूस और चीन करीब आ रहे हैं और रूस की पाकिस्तान नीति में बदलाव आ रहा है, उत्तर कोरिया वैश्विक चिंता बना हुआ है, साथ ही अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप रोज अपनी नीति बदल रहे हैं।

यूएस ने चीन के साथ ट्रेडवार शुरू कर दिया है और सीरिया को लेकर रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया है। इससे भारत और रूस के बीच प्रस्तावित 39000 करोड़ के रक्षा सौदे खटाई में पड़ सकते हैं। जबकि रूस भारत के पुराने और भरोसेमंद सामरिक सहयोगी है। इस यात्रा से भारत की कोशिश विश्व में कूटनीतिक संतुलन साधने की है। भारत रूस के साथ अपने संबंधों को नेपथ्य में नहीं जाने देना चाहता है।

दरअसल, मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर भारत और अमेरिका के बीच रिश्ते बहुत तेजी से प्रगाढ़ हुए हैं। इससे रूस को गलतफहमी हो गई है कि भारत उनसे दूर हुआ है, जबकि भारत और रूस के बीच रणनीतिक, सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रिश्तों का एक लंबा इतिहास रहा है। इस यात्रा से पीएम रूस को भरोसा दिलाना चाहते हैं कि हमारे संबंध पहले की तरह मजबूत है।

प्रधानमंत्री ने पहले चीन और अब रूस की यात्रा कर दोनों देशों के साथ-साथ विश्व को यह संदेश देने का प्रयास किया है कि भारत सभी देशों से अच्छे संबंध बनाए रखना चाहता है और किसी खेमे में नहीं जाना चाहता है। इसलिए पीएम की रूस यात्रा का कूटनीतिक महत्व ज्यादा है। चीन के बाद रूस की यात्रा से पीएम ने अमेरिका को भी संदेश दिया है कि भारत की कूटनीति स्वतंत्र है।

अमेरिका ईरान पर भी प्रतिबंध लगाने को संकल्पित है, जबकि ईरान के साथ भी भारत के अच्छे संबंध हैं। प्रधानमंत्री का संकेत है कि अमेरिका भारत के सामरिक किलेबंदी और रक्षा सौदे की राह में रोड़ा नहीं बने। इसके अलावा अमेरिका की संरक्षणवादी नीति के चलते बढ़ती वैश्विक चुनौतियां भी अब भारत को रूस और चीन के करीब ले जा रही हैं।

अमेरिका का ट्रंप प्रशासन वैश्विक व्यवस्था के नियम-कायदे को खत्म करता जा रहा है, इससे तीनों देशों को अब यह लगता है कि यदि वैश्विक व्यवस्था में अपना हक बनाए रखना है तो विदेश नीति में ज्यादा समन्वय की जरूरत है। भारत अब लचीले रुख के साथ अमेरिका के साथ-साथ चीन और रूस के साथ संतुलन बिठा रहा है। चीन की भी शिकायत रही है कि भारत अमेरिका के करीब जा रहा है।

भारत ने वुहान की यात्रा से इस शिकायत को भी दूर किया है। इसके अलावा चीन और पाकिस्तान दोनों के साथ सीमा पर भारत का विवाद है, भारत पाक प्रायोजित आतंकवाद से जूझ रहा है, जबकि रूस चीन व पाक के साथ करीब हो रहा है, ऐसे में रूस को अपनी स्थति से अवगत करना भी भारत के लिए जरूरी है। ईरान से अपने संबंधों पर भी रूस के साथ वार्ता जरूरी है।

स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते पांच सालों में भारत के आयात किए हथियारों में 62 प्रतिशत रूसी हार्डवेयर हैं, जो साल 2008-12 के दौरान 79 प्रतिशत था। भारत की कुछ हथियार प्रणाली सोवियत या रूस मूल की हैं और इनके परिचालन को जारी रखने के लिए मॉस्को से रक्षा संबंध बनाए रखने की जरूरत है। रूस ने शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा विकसित करने में भारत की जरूरत को माना है।

दिसंबर 2014 में, डिपार्टमेंट ऑफ एटमिक एनर्जी (डीएई) और रूस के रोसाटम ने भारत और रूस के बीच परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल को लेकर सहयोग बढ़ाने के लिए स्ट्रैटजिक विजन पर हस्ताक्षर किए थे। भारत का कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट रूस की मदद से ही बनाया जा रहा है। भारत और रूस के बीच अंतरिक्ष के क्षेत्र में बीचे 4 दशक से साझेदारी जारी है।

दोनों देश मानव सहित स्पेस विमान को भेजने में आपसी सहयोग पर भी विचार कर रहे हैं। भारत ने इस यात्रा से रूस के साथ कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक रिश्ते को प्रगाढ़ किया है और अपना वैश्विक हित साधा है।

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