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बेटों से कम नहीं बेटियां, मंगल से लेकर दंगल तक बोलबाला

भारतीय महिला क्रिकेट टीम उप विजेता बनकर लौटी है।

बेटों से कम नहीं बेटियां, मंगल से लेकर दंगल तक बोलबाला
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आमिर खान की हालिया फिल्म दंगल का एक बहुत ही प्रचलित हुआ डायलॉग म्हारी छोरियां, छोरों से कम हैं के, को हमारी भारतीय महिला क्रिकेटरों ने सच साबित करके दिखा दिया है। फाइनल मुकाबले में देश की 11 मर्दानियां विरोधी टीम के हाथों उन्नीस-बीस के अंतर से पराजित हो गईं। पूरे मैचे में मजबूत पकड़ बनाकर रखी, लेकिन अंतिम ओवरों में हिम्मत तोड़ दी।

खैर, बेशक लड़कियां हार गईं हों, लेकिन इस बार के आईसीसी महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के सभी मैचों में हमारी लड़कियां विरोधी टीमों पर छाईं रही है। भारतीय महिला क्रिकेट टीम उप विजेता बनकर लौट रही है, इसलिए पुरुष टीम की तरह महिला टीम का स्वागत भी उन्हीं की तरह किया जाना चाहिए। लाॅर्ड्स के मैदान पर रविवार को इंग्लैंड-भारत के बीच खेले गए फाइनल मैच में हमारी टीम कुछ कमियों की वजह से हार गई।

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एक समय तो ऐसा लगा कि मैच पूरी तरह से भारत के पकड़ में है, लेकिन अचानक लगातार गिरे विकटों ने मैच का रुख इंग्लैंड की तरह मोड़ दिया। यही कारण रहा कि भारत की लड़कियां सिर्फ नौ रन से हार गईं। लाॅर्ड्स के इसी मैदान पर हमने 1983 में मैदान मारा था, पर वह इतिहास हमारी लड़कियां दोहरा नहीं पाई। लड़कियां मैच तो नहीं जीत पाई, पर सभी के दिलों पर जरूर छा गईं। इनकी कामयाबी पर पूरा देश खुश है।

खुश हो भी क्यों न! भारत की इन 11 बेटियों ने कारनामा जो ऐसा किया है। पूरे टूर्नामेंट में विरोधी टीमों को धूल चटाकर हमारी टीम शान से फाइनल में प्रवेश किया था। उप विजेता बनकर भारत लौट रही है हमारी भारतीय टीम। महिला क्रिकेट विश्व कप एक अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट है जो 26 जून से शुरू हुआ था जिसका समापन 23 जुलाई को हुआ। इसका आयोजन इस बार इंग्लैंड में आयोजित किया गया था।

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मौजूदा आईसीसी महिला क्रिकेट विश्व कप का ग्यारहवां संस्करण था। इस बार आठ टीमों के ने भाग लिया है। भारतीय टीम को इस बार प्रबल माना जा रहा था, क्योंकि जिस टीम यानी इंग्लैंड से वह फाइनल हारीं हैं, उनको नाॅकआउट प्ले में पहले ही धूल चटा दी थी। लड़कियों की लगातार जीत ने आईसीसी वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराने के बाद से लगने लगा था कि कप भारत का ही होगा,

लेकिन क्रिकेट में आखिरी गेंद तक सटीक भविष्यवाणी करना खुद में बेईमानी होती है। यह टूर्नामेंट कई पलों के लिए याद किया जाएगा। हरमनप्रीत कौर के बनाए नाबाद 171 रन और मिताली राज का रनों का पहाड़ खड़ा करना आदि। टीम की कप्तान मिताली राज का आखिरी सपना पूरा नहीं हो सका। वह दूसरी बार फाइनल हारीं। यह उनका आखिरी वर्ल्ड कप था।

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हालांकि वह इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय मैच खेलती रहेंगी। भारतीय महिला इससे पहले 2005 में वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंची थीं, लेकिन वह मैच भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया से हार गई थी। इस बार का फाइनल मैच भारती टीम के लिए काफी अहम माना जा रहा था, क्योंकि इस बार महिला क्रिकेट को काफी अहमियत दी गई। हिंदुस्तान में क्रिकेट को धर्म की तरह माना जाता है।

क्रिकेट में अभी तक पुरुष टीम को ही तवज्जो मिलती थी, लेकिन इस बार महिला किक्रेट के बेहतरीन प्रदर्शन ने सभी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। बीसीसीआई भी उनको गंभीरता से आंकने लगी है। उसकी वजह उनका बेजोड़ प्रदर्शन। महिला क्रिकेटर मिताली राज और झूलन गोस्वामी जैसी क्रिकेटर सालों से देश की सेवा कर रही हैं, लेकिन आज उन्हें वह पहचान नहीं मिल सकी है, जिसकी वे असली हकदार हैं।

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भारतीय टीम उप विजेता बनकर हिंदुस्तान लौट रही है। उनके स्वागत-सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। ऐसा करने से उनका मनोबल बढ़ेगा। महिला क्रिकेट के इतिहास की बात करें तो 1973 में पहली बार अस्तित्व में आई विमेन क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया को बीसीसीआई की मान्यता मिलने और उसके नियंत्रण में आने में 23 साल लंबा वक्त लगा।

भारतीय महिला क्रिकेटरों को 2006 में पहली बार बीसीसीआई की संबद्धता मिली। बीसीसीआई का हिस्सा बनने से पहले महिला क्रिकेटरों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन बीसीसीआई से जुड़ने के बाद महिला किक्रेटरों के जीवन में कुछ सुधार देखने को मिला है। हालांकि अब भी भारत में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिला क्रिकेटरों के लिए बहुत कम टूर्नामेंट आयोजित किए जाते हैं।

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साल भर में महिला क्रिकेट टीम बहुत कम मैच खेल पाती हैं। बेटियों की मौजूदा कामयाबी उन्हें भी बराबर का दर्जा देने की दरकार महसूस की जाने लगी है। क्योंकि अभी तक पुरुष और महिला क्रिकेटरों को मिलने वाले पैसों में जमीन-आसमान का अंतर है। पुरुष क्रिकेटरों के लिए बीसीसीआई का सलाना कॉन्ट्रैक्ट, ए बी और सी कैटेगरी में बंटा है।

ए कैटेगरी में शामिल क्रिकेटरों को 1 करोड़ रुपये, बी कैटेगरी के लिए 50 लाख जबकि सी कैटेगरी के लिए 25 लाख रुपये मिलते हैं। तो वहीं महिला क्रिकेटरों के लिए ए और बी कैटिगरी बनाई गई है। इसमें महिलाओं खिलाड़ियों को 15 से 10 लाख रुपये मिलते है। अंतर सिर्फ यहीं नहीं है, टीम इंडिया के पुरुष क्रिकेटरों को एक टेस्ट मैच खेलने की मैच फीस सात लाख रुपये, एक वनडे खेलने पर चार लाख और एक टी-20 खेलने पर दो लाख रुपये मिलते हैं।

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वहीं महिला क्रिकेटरों को एक मैच वनडे या टी-20 मैच खेलने के लिए महज 2500 रुपये ही मिलते हैं। भारती क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड दुनिया का सबसे बड़ा धनी माना जाता है इसलिए बीसीसीआई के पास पैसे की कोई कमी नहीं है, लेकिन महिलाओं को पैसा देने,उनके लिए नियमित तौर पर मैच कराने में उनकी कभी कोई रुचि नहीं रहती। हालांकि पिछले साल बीसीसीआई ने पूर्व महिला क्रिकेटरों को पेंशन देने की घोषणा की थी।

जिन महिला क्रिकेटरों ने दस या इससे अधिक टेस्ट मैच खेले उन्हें प्रति माह 22,500 रुपये जबकि पांच से नौ टेस्ट मैच खेलने वाली महिला खिलाड़ियों को प्रतिमाह 15 हजार रुपये की धनराशि देने की घोषणा की गई थी। जबकि पुरुष खिलाड़ियोंं को दोगुनी पेंशन मिलेगी। पुरुष और महिला क्रिकेटरों के बीच कमाई की इस खाई के बावजूद बीसीसीआई से जुड़ने से भविष्य में महिला क्रिकेटरों को भी फायदा होने की पूरी संभावना हैं। इस कदम से निश्िचत रूप से प्रोत्साहन मिलेगा और महिला क्रिकेट और भी बुलंदियां छुएंगी।

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