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चिंतनः चला मोदी मैजिक, भारत में कम हो रही है गरीबों की संख्या

भारत भुखमरी कम करने के लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब रहा है।

चिंतनः चला मोदी मैजिक, भारत में कम हो रही है गरीबों की संख्या
मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स रिपोर्ट-2015 के अनुसार भारत में गरीबी कम हो रही है, हालांकि इसकी रफ्तार धीमी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में प्रतिदिन 1.25 डॉलर या इससे कम पर गुजारा करने वाले लोगों की संख्या 1994 में कुल आबादी की जहां 49.4 फीसदी थी, वहीं 2011 में यह कम हो कर 24.7 फीसदी रह गई है।
जाहिर है, भारत अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के आधार पर गरीबी को आधा करने के करीब है। भारत मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स में निर्धारित कई मानकों को पहले ही प्राप्त कर चुका है। शिक्षा के क्षेत्र में खासी प्रगति हुई है। हर राज्य में बच्चों की स्कूलों में उपस्थिति बढ़ी है। भारत प्राथमिक स्कूल के नामांकन में लिंग समानता के लक्ष्य को भी हासिल कर चुका है। हालांकिशिक्षा की गुणवत्ता और बीच में ही स्कूल छोड़ने के सवाल अभी खड़े हैं।
भारत भुखमरी कम करने के लक्ष्य को हासिल करने में कामयाब रहा है। इसके बावजूद दुनिया में भुखमरी के शिकार एक-चौथाई लोग भारत में रहते हैं। इसके अलावा, दुनिया के एक तिहाई कम वजन के बच्चे भी भारत में हैं। इतना ही नहीं, भोजन की असुरक्षा से जूझ रहे दुनिया के लगभग एक तिहाई लोग भारत में रहते हैं। जाहिर है, कई मोचरें पर हमें अभी लंबी दूरी तय करनी है। अभी भी कई क्षेत्र हैं जिसमें देश को मीलों सफर तय करना है। जैसे मातृ मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, स्वच्छता आदि कई मानकों पर भारत का रिकॉर्ड तमाम पहलों के बावजूद भी खराब है। 1990 में शिशु मृत्यु दर (प्रति एक हजार जन्म पर) 88.2 थी, जबकि 2012 में यह कम हो कर 43.8 रह गई है। वहीं 1990 में शिशु के जन्म के दौरान प्रति एक लाख मांओं में से 560 मांओं की मौत हो जाती थी, जबकि 2013 में यह कम हो कर 190 पर आ गई है। वहीं स्वच्छता के मोर्चे पर भी तस्वीर कुछ ठीक नहीं है। अभी देश की साठ फीसदी आबादी खुले में शौच करने को अभिशप्त है।
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में स्वच्छता अभियान चलाया है, जिसके तहत बड़े पैमाने पर शहरी और ग्रामीण इलाकों में शौचालयों का निर्माण किया जा रहा है और लोगों को उपयोग के लिए प्रेरित किया जा रहा है। स्वच्छता के मानकों पर जल्द ही सफलता मिलने की उम्मीद है। इसी प्रकार स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी बहुत काम करने की जरूरत है, क्योंकि इससे कई सारी चीजें जुड़ी हुई हैं। इस संबंध में हमारे अपने पड़ोसी देश जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और चीन हमसे काफी आगे हैं, जहां गरीबों के उत्थान की रफ्तार हमसे कई गुना अधिक है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में स्थिति दूसरे देशों से कुछ अलग है। हमारी आबादी उनसे बड़ी है और यहां गरीबों-वंचितों की तादाद भी दूसरे देशों से कई गुना अधिक है, यही वजह है कि यहां सुधार की रफ्तार धीमी प्रतीत होती है। यह ठीक हैकि भारत के लोग भयावह गरीबी से धीरे-धीरे उबर रहे हैं, लेकिन हमें इतने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। एक निश्चित समय में उनके जीवन में गुणात्मक सुधार लाना भी जरूरी है, क्योंकि यह गरीबी हर दिन लोगों की जीवनलीला समाप्त कर रही है। लिहाजा, यहां ऐसी योजनाओं व कार्यक्रमों को अपनाने की जरूरत है जिससे विकास की रफ्तार और तेज हो सके।

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