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संपादकीय लेख : जी-7 से विश्व को भारत का वन अर्थ-वन हेल्थ मंत्र

जी-7 के मंच से भारत का वन अर्थ वन हेल्थ का संदेश देना विकसित देशों को जहां आईना दिखाना है, जो सेहत संबंधी नई दवाओं व टीकों की खोज को अपनी जागीर मानकर दूसरे देशों से भेदभाव करते हैं, वहीं भारत ने विश्व को एहसास कराया है, स्वास्थ्य पर अमीर व गरीब देशों का समान हक है। भारत ने इस ओर कोरोना के समय विश्व को उदाहरण भी पेश किया है।

संपादकीय लेख : जी-7 से विश्व को भारत का वन अर्थ-वन हेल्थ मंत्र
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial :विकसित देशों के शक्तिशाली समूह जी-7 की बैठक ऐसे समय में हुई है, जब विश्व कोरोना से जूझ व लड़ रहा है। कोविड-19 महामारी को 100 दिनों के अंदर रोकने का जी-7 का संकल्प सराहनीय है, इसे कार्बिस बे डिक्लेरेशन नाम दिया गया है। हालांकि यूरोपीय देशों व अमेरिका से बाहर महज 100 दिनों में कोरोना को काबू करना व्यावहारिक रूप से कठिन लगता है। जी-7 को इसके लिए बड़ी पहल करनी होगी।

जी-7 से दूसरी अहम बात निकल कर सामने आई है कि अमेरिका भी चीन की राह चलेगा। चीन के वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) प्रोजेक्ट के खिलाफ अमेरिका ने बिल्ड बैक बेटर वर्ल्ड (बी3डब्ल्यू) का प्रस्ताव जी-7 में दिया है। चीन का ओबीओआर वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जिस पर शुरू में अमेरिका ने भी सहमति जताई थी, जबकि भारत ने दबाव के बावजूद इस पर साइन नहीं किया था। बाद में अमेरिका संभल गया था, ऑस्ट्रेलिया समेत और कई देश चीन के महत्वाकांक्षी इन्फ्रा प्रोजेक्ट से बाहर हो गए थे। अब अमेरिका को समझ आ गया है कि वैश्विक स्तर पर अपनी साख वापस पाने के लिए गरीब देशों में बड़े निवेश करने होंगे। अमेरिका डिफेंस से इतर इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भी व्यापक संभावना देख रहा है। कुछ साल पहले चीन के अलावा सऊदी अरब, यूएई, रूस आदि देशों ने वैश्विक इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में बड़े निवेश की योजना बनाई है।

जापान व दक्षिण कोरिया पहले से ही ग्लोबल इन्फ्रा सेक्टर में बड़े निवेशक हैं। अब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जी-7 मंच का इस्तेमाल करते हुए गरीब देशों में इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारने के नाम पर अपनी ग्लोबल योजना को आगे बढ़ाया है। इससे ग्लोबल स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी बनेंगे। भारत भी अपने इन्फ्रास्टक्चर को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए तेजी से काम कर रहा है। इसमें भारत में बड़े निवेश की भी जरूरत है। आने वाले वक्त में भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में जी-7 देशों से नए निवेश देखने को मिल सकते हैं। इस बार फिर भारत ने जी-7 में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। सदस्य देश ना होते हुए भी जी-7 की बैठक में आमंत्रण विश्व में भारत की बढ़ती शक्ति व महत्व को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिटेन में चल रही जी-7 समिट के आउटरीच सेशन में विश्व को वन अर्थ-वन हेल्थ का मंत्र दिया और भविष्य में महामारियों को रोकने के लिए लोकतांत्रिक और पारदर्शी समाज की जिम्मेदारी पर जोर दिया।

जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने भी मोदी की बात का समर्थन किया। इस सेशन का नाम बिल्डिंग बैक स्ट्रॉन्गर- हेल्थ रखा गया था। यह सेशन कोरोना से ग्लोबल रिकवरी और भविष्य की महामारियों के खिलाफ मजबूती से खड़े होने के उपायों पर था। जी-7 के मंच से भारत का वन अर्थ वन हेल्थ का संदेश देना विकसित देशों को जहां आईना दिखाना है, जो सेहत संबंधी नई दवाओं व टीकों की खोज को अपनी जागीर मानकर दूसरे देशों से भेदभाव करते हैं, वहीं भारत ने विश्व को एहसास कराया है, स्वास्थ्य पर अमीर व गरीब देशों का समान हक है। भारत ने इस ओर कोरोना के समय विश्व को उदाहरण भी पेश किया है। मोदी ने कोरोना से निपटने में भारत के 'समग्र समाज' के दृष्टिकोण को रेखांकित किया। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य नहीं बन पाया है, लेकिन इंटरनेशनल फोरम पर उसकी मौजूदगी हर लिहाज से ताकतवर रही है। डोनाल्ड ट्रम्प जब यूएस राष्ट्रपति थे तब उन्होंने जी-7 को जी-10 या जी-11 बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन ये भी कहा था कि इसमें सब लोकतांत्रिक देश होने चाहिए, यानी चीन को वो यहां नहीं चाहते थे। पश्चिमी देशों को लगता है कि भारत ही चीन को रोक सकता है। आने वाले वक्त में भारत जी-7 के विस्तार होने पर इसका सदस्य बन सकता है।

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