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भारत को नई चौकड़ी से सतर्क रहने की जरूरत

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन तालिबान के खिलाफ सामूहिक एकजुटता की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई है कि तालिबान लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। तालिबान के मजबूत होने से पश्चिम एशिया के आतंकी गुटों के भी मजबूत होने का खतरा है। इधर, इस बार चीन तो पाकिस्तान से पहले ही तालिबान सरकार के साथ काम करने की इच्छा जता दी। पाक पीएम इमरान खान ने तो तालिबान की सत्ता को अफगानिस्तान की आजादी से जोड़ा है, ऐसा तब है जब पाकिस्तान अपने को आतंकवाद पीड़ित बताता रहा है।

भारत को नई चौकड़ी से सतर्क रहने की जरूरत
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संपादकीय लेख

Haribhoomi Editorial : अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के काबिज होने के बाद वैश्विक स्तर शक्ति संतुलनों के बीच विभाजन दिखना शुरू हो गया है। भारत की चुनौतियां अपनी जगह हैं, जिसमें नई दिल्ली को हमेशा चौकन्ना रहना होगा, लेकिन तालिबान सरकार को लेकर जहां अमेरिका व यूरोपीय देशों की चिंताएं उभर कर सामने आई हैं, वहीं चीन और रूस इसे अपने फायदे के नजरिये से देख रहे हैं। चीन के साथ पाकिस्तान व तुर्की को भी तालिबान सरकार को मान्यता देने में हिचक नहीं होगी। अफगानिस्तान से जाने को लेकर अमेरिका आलोचना के घेरे में है। हालांकि अमेरिका 20 साल तक अफगानिस्तान में रहने के दौरान 61 लाख करोड़ रुपये खर्चने और अपने 2300 सैनिक खोने व 64 हजार से अधिक अफगानी सुरक्षाकर्मियों के मारे जाने के बावजूद वहां लोकतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं कर सका। इसलिए यूएस राष्ट्रपति बाइडेन के कदम को रणछोड़ के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि इससे पहले सिकंदर, मुगल, अंग्रेज व सोवियत यूनियन में से भी कोई अफगानिस्तान में सफल नहीं हो सका है।

फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन तालिबान के खिलाफ सामूहिक एकजुटता की अपील की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी चिंता जताई है कि तालिबान लोकतांत्रिक संस्थाओं, नागरिक अधिकारों और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। तालिबान के मजबूत होने से पश्चिम एशिया के आतंकी गुटों के भी मजबूत होने का खतरा है। इधर, इस बार चीन तो पाकिस्तान से पहले ही तालिबान सरकार के साथ काम करने की इच्छा जता दी। पाक पीएम इमरान खान ने तो तालिबान की सत्ता को अफगानिस्तान की आजादी से जोड़ा है, ऐसा तब है जब पाकिस्तान अपने को आतंकवाद पीड़ित बताता रहा है। 1980 से 89 के बीच सोवियत संघ बेशक अफ्रानिस्तान से परास्त होकर गया हो, पर आज रूस तालिबान शासित अफगानिस्तान में अपना हित देख रहा है। एक तालिबान से चीन, पाकिस्तान, तुर्की और रूस सभी अपने हित साधना चाह रहे हैं, इनके अधिकांश हित भारत के खिलाफ होंगे। हालांकि तालिबान से डील हमेशा ही देशों के लिए महंगी रही है, यह बात चीन व रूस जितना जल्दी समझ लें, अच्छा है। चीन अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को पाकिस्तान से यूरोप की धरती तक ले जाना चाहता है, जिसमें अफगानिस्तान के साथ ईरान बहुत मददगार है।

हाल में अमेरिकी प्रतिबंध का सामना कर रहे ईरान से चीन ने नजदीकी बढ़ाई है। चीन भारत को भी तनाव में रखना चाहता है, इसके लिए कश्मीर में आतंकवाद को शह देने के लिए पाकिस्तान के बाद अब अफगानिस्तान की तालिबान सरकार भी मिल जाएगी। तालिबान की उइगर समुदाय के नेताओं से नजदीकी है, ऐसे में आने वाले वक्त में चीन को शिनझियांग प्रांत में उइगर के उग्र होने की संभावना है। चीन के लिए तालिबान से दोस्ती दुधारी तलवार की तरह होगी। ईस्ट तुर्कमिस्तान मूवमेंट को तालिबान से शक्ति मिल सकती है। समूचे तालिबान प्रकरण में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका मूकदर्शक रही है, जो कि एक वैश्विक संस्था के औचित्य पर प्रश्न है? 1996 से 2001 तक विश्व अफगानिस्तान में तालिबान के कट्टर व क्रूर शासन को देख चुका है। अब इस बार जिस तेजी से वह अफगानिस्तान पर काबिज हुआ है, निकट भविष्य में उसके जल्दी हटने के संकेत भी नहीं है। ऐसे में भारत के लिए दोहरी चिंता है।

पहली तो वहां भारत के तीन मुख्य प्रोजेक्ट चल रहे थे, जो अब खतरे में होंगे, दूसरी, अब अफगानिस्तान में भारत की कूटनीतिक बढ़त कम होगी और पाकिस्तान की बढ़ जाएगी, जिसमें पाक व तालिबान मिलकर भारत के खिलाफ आतंकवाद को हवा देंगे, परदे के पीछे चीन साथ देगा। नीतिगत रूप से लोकतांत्रिक भारत के लिए तालिबान सरकार से कूटनीतिक संबंध स्थापित करना कठिन होगा। इसलिए भारत को चीन, पाक, तालिबान व तुर्की की चौकड़ी से सतर्क रहना होगा। रूस को साध कर भारत अपने हितों की रक्षा कर सकता है।

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