Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

डाॅ. एल. एस. यादव का लेख : भारत कड़ा विरोध दर्ज कराए

गिलगित-बाल्टिस्तान पीओके का हिस्सा है और पीओके जम्मू-कश्मीर का अंग है। 1947 में जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने इस पूरी रियासत का विधिवत विलय भारत में किया था। इस तरह यह सारा हिस्सा अब भारत का अभिन्न अंग है। पाक की सर्वोच्च अदालत ने 1994 में अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा है। इसके बावजूद यदि पाक ऐसा कुछ कर रहा है तो भारत को इसका कड़ा विरोध करना चाहिए क्योंकि इस आर्थिक गलियारे का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के तहत भारत को घेरने के लिए भी किया जाएगा।

डाॅ. एल. एस. यादव  का लेख : भारत कड़ा विरोध दर्ज कराए
X

डाॅ. एलएस यादव 

डाॅ. एल. एस. यादव

भारत के बार-बार विरोध जताने के बावजूद पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान को लेकर अपने नापाक इरादों से बाज नहीं आ रहा है। सामरिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण वाले इस इलाके को अस्थायी प्रांत का दर्जा देने के लिए पाकिस्तान नें कानून की रूपरेखा तैयार कर ली है। भारत ने इसका सख्त विरोध करते हुए इस्लामाबाद से साफ तौर पर कहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान समेत जम्मू-कश्मीर व लद्दाख का पूरा केन्द्र शासित इलाका भारत का अखंड हिस्सा है। भारत का कहना है कि पाक सरकार या उसकी न्यायपालिका का अवैध रूप से या जबरन कब्जा किए गए स्थानों पर कोई अधिकार नहीं है।

पाकिस्तान की इस नई योजना के मुताबिक कानून व न्याय मंत्रालय के प्रस्तावित कानून के तहत गिलगित-बाल्टिस्तान की सर्वोच्च अपीलीय अदालत समाप्त की जा सकती है। 26वें संवैधानिक संशोधन विधेयक का मसौदा तैयार कर लिया गया है और इसे प्रधानमंत्री इमरान खान को सौंप दिया गया है। प्रस्तावित कानून में सुझाव दिया गया है कि इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रांतों और क्षेत्रों से संबंधित संविधान के अनुच्छेद-1 में संशोधन करके उसे अस्थायी प्रांत का दर्जा दिया जा सकता है। गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की सरकारों समेत विभिन्न पक्षकारों से इस विचार विमर्श भी कर लिया गया है। दरअसल पाकिस्तान का मकसद इस सामरिक क्षेत्र में 46 अरब अमेरिकी डाॅलर की लागत से बनाए जाने वाले आर्थिक काॅरिडोर पर चीन की चिंताएं दूर करना है। पाकिस्तान ने यह काॅरिडोर बनाने के लिए कुछ समय पहले चीन से करार किया था, जिसके तहत तीन हजार किलोमीटर लंबे इस आर्थिक गलियारे का लगभग 634 किलोमीटर का हिस्सा गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरेगा। जम्मू-कश्मीर के उत्तर में स्थित यह क्षेत्र चीन के साथ महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में जाना जाता है और चीन-पाकिस्तान आर्थिक काॅरिडोर (सीपीईसी) के प्रमुख मार्ग पर स्थित है। यह सड़कों, राजमार्गों, रेलवे और निवेश पार्कों के नेटवर्क के जरिए दक्षिणी पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से पश्िचमी चीन के काशगर को जोड़ता है।

गुलाम कश्मीर के रास्ते सीपीईसी बनाए जाने को लेकर भारत कई बार आपत्ति जता चुका है। इसके बाद से ही चीन इस क्षेत्र में निवेश को लेकर चिंतित है, क्योंकि विवादित क्षेत्र होने के कारण इस इलाके निवेश सुरक्षित नहीं हैं। चीन की इसी चिंता को दूर करने के लिए पाकिस्तान अपनी इस योजना में इस क्षेत्र को प्रांतीय दर्जा देना चाहता है, लेकिन यह दर्जा सामान्य प्रांत की तुलना में छोटा होगा। अभी तक पाक अधिकृत कश्मीर, आजाद कश्मीर व गिलगित-बाल्टिस्तान नामक दो भागों में बंटा है। दोनों क्षेत्रों की अपनी विधानसभाएं हैं जो अंदरूनी तौर पर स्वायत्त हैं। एक विशेष मंत्री और संयुक्त परिषदों के जरिये पाकिस्तान यहां पर शासन करता है। तकनीकी रूप से यह पाकिस्तानी संघ का हिस्सा नहीं है। गिलगित-बाल्टिस्तान का क्षेत्रफल लगभग 72971 वर्ग किलोमीटर है। इस इलाके की सीमा पश्िचम में खैबर-पख्तूनवा, उत्तर में अफगानिस्तान के वाखान गलियारा, उत्तर पूर्व में चीन के शिनचियांग प्रांत, दक्षिण में आजाद कश्मीर और दक्षिण पूर्व में भारतीय जम्मू-कश्मीर राज्य से मिलती है। यदि इस इलाके को पाकिस्तान का संवैधानिक दर्जा मिलता है तो यह पहाड़ी क्षेत्र पाकिस्तान के संविधान में दर्ज हो जाएगा। दूसरा पाकिस्तान के पारंपरिक रवैये में पाक अधिकृत कश्मीर पर दूरगामी प्रभाव छोड़ेगा। तीसरे कश्मीर का अंतरराष्ट्रीयकरण करना आसान होगा, जिससे भारत के साथ तनाव बढ़ेगा। चौथा तनाव बढ़ने पर चीन भी भारत के लिए चुनौती प्रस्तुत करेगा। पांचवां संवैधानिक दर्जा बढ़ने पर पाकिस्तान अपने जबरन व अवैध कब्जे पर पर्दा डाल सकेगा।

इस गलियारे के बन जाने से चीन सबसे अधिक फायदे में रहेगा। चीन को तेल-गैस आयात के लिए पाकिस्तान के बलूचिस्तान स्थित ग्वादर बंदरगाह तक सड़क, रेल व पाइप लाइन का नेटवर्क प्राप्त हो जाएगा। इसके बाद उसे पश्चिम एशिया और अफ्रीका के बीच व्यापार करने के लिए बड़ा मार्ग मिल जाएगा। दक्षिण सागर से कारोबारी मार्ग छोड़कर चीन वहां पर ताकत आजमाएगा। भारत को दक्षिण चीन सागर में तेल निकालने के लिए रोकने में चीनी सेना सक्षम बन जाएगी। इस हाईवे के बाद चीनी निवेश का सीधा नेटवर्क हो जाएगा। पाक-चीन का सामरिक कारोबारी रिश्ता भारत के लिए बड़ी चुनौती प्रस्तुत करेगा। विदित हो कि जुलाई 1947 तक गिलगित भारत सरकार के अधीन था। राज्य सरकार ने 60 वर्ष के पट्टे पर दिया था। जब ब्रिटिश साम्राज्य की विदाई का समय आया तो उन्होंने लीज तोड़कर जम्मू-कश्मीर के डोगरा शासक महाराजा हरि सिंह को दे दिया। हरि सिंह ने ब्रिगेडियर घंसार सिंह को गवर्नर बनाकर गिलगित भेजा। अगस्त 1947 में वहां का प्रशासन उनके हाथों में आ गया और वहां के मुसलमानों ने उनका स्वागत किया। पाक हमले के समय 31 अक्टूबर 1947 की रात्रि को मेजर ब्राउन, कैप्टन सैयद, सब मेजर बाबा खान व लेफ्टिनेन्ट हैदर खान के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने ब्रिगेडियर घंसार सिंह को घेर लिया। तब मजबूर होकर घंसार सिंह ने समर्पण कर दिया। इसके बाद वहां जो अंतरिम सरकार बनी उसमें किसी स्थानीय व्यक्ति को नहीं रखा गया। 4 नवंबर 1947 को पाक एजेंट के रूप में सरदार मोहम्मद आलम को प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंप दी गई।

तब से लेकर इन 68 वर्षों मंे यहां के लोगों को कोई बुनियादी अधिकार नहीं प्राप्त हुए। वहां के लोग भी अपनी अलग पहचान बनाने में असफल रहे, क्योंकि इस दूरदराज वाले इलाके के पास इनसे निपटने के लिए कोई साधन नहीं थे। इस प्रकार यह पाकिस्तान का एक उपनिवेश बनकर रह गया। इसे राजनीतिक दर्जा नहीं दिया गया और यहां की प्राकृतिक सम्पदा का भरपूर दोहन किया। अब पाकिस्तान इसे अपना पांचवां प्रांत बनाने की फिराक में है। ऐसा करने वालों का मानना है कि ऐसा होने के बाद लोगों को वे सारे अधिकार मिल जाएंगे जो किसी भी पाकिस्तानी प्रांत के लोगों को मिले हुए हैं।

गिलगित-बाल्टिस्तान पीओके का हिस्सा है और पीओके जम्मू-कश्मीर का अंग है। 1947 में जम्मू कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने इस पूरी रियासत का विधिवत विलय भारत में किया था। इस तरह यह सारा हिस्सा अब भारत का अभिन्न अंग है। पाक की सर्वोच्च अदालत ने 1994 में अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में कहा था कि यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा है। इसके बावजूद यदि पाक ऐसा कुछ कर रहा है तो भारत को इसका कड़ा विरोध करना चाहिए क्योंकि इस आर्थिक गलियारे का उपयोग सामरिक उद्देश्यों के तहत भारत को घेरने के लिए भी किया जाएगा। इस रास्ते के बनने से भारत की पश्िचमी सीमा पर चीनी सेनाओं की गतिविधियां काफी बढ़ जाएंगी जो भारत के लिए खतरनाक सिद्ध होंगी। चीन की सामरिकी यह भी होगी कि वह भारत को पश्चिम और मध्य एशिया के संपर्कों से काट दिया जाए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

Next Story