Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

चीन की चाल में नहीं फंसना सही कूटनीति

जिन 65 देशों को इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाने की बात हो रही है उनमें 44 देशों को इस योजना पर शक है।

चीन की चाल में नहीं फंसना सही कूटनीति

चीन की वन बेल्ट वन रोड नीति का भारत की ओर से विरोध किया जाना बिल्कुल सही कूटनीतिक कदम है। कारण चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के ड्रीम प्रोजेक्ट में वो स्पष्टता नहीं है, जो भारत की मांग है।

इसके साथ ही इस ओबीओआर प्रोजेक्ट में चीन की दुनिया पर बादशाहत कायम करने की मंशा छिपी है। भारत इस बात को बखूबी समझता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद ड्रैगन की इस चाल को समझ रहे हैं और वे चीन की एक नहीं चलने दे रहे हैं।

भारत हमेशा से कहता रहा है कि चीन को नई दिल्ली की संप्रभुता का सम्मान करना चाहिए। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने भी ओबीओआर शिखर सम्मेलन के दौरान अपने संबोधन में कहा है कि बीजिंग दुनिया के सभी मुल्कों की संप्रभुता का सम्मान करता है, लेकिन चीन के कई ऐसे कदम हैं, जो शी के कथनी और चीन की करनी में फर्क साबित करते हैं।

दक्षिण चीन सागर, तिब्बत, ताइवान, और अरुणाचल प्रदेश पर चीनी रुख चिनफिंग के दावे से मेल नहीं खाते हैं। चीन की विस्तावादी नीति से पूरी दुनिया वाकिफ है। भारत, जापान और अमेरिका चीन के इस विस्तारवादी मानसिकता के प्रति नाखुशी जाहिर करते रहे हैं।

भारत को सबसे अधिक आपत्ति है चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीईपीसी के पीओके से गुजरने पर व इसके नामकरण पर। चीन ने इसके लिए भारत से अनुमति तक नहीं ली है। जबकि पूरी दुनिया जानती है कि पीओके भारत का हिस्सा है, जिस पर पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।

भारत में कश्मीर का विलय संवैधानिक तरीके से हुआ है और संयुक्त राष्ट्र भी मानता है कि समस्त कश्मीर भारत का है और पीओके को पाकिस्तान को खाली कर देना चाहिए। यूएन के इस मत से चीन भी अवगत है, लेकिन फिर भी वह पाकिस्तान के साथ खड़ा है और उसने सीईपीसी के रूट तय करते वक्त भारत की संप्रभुता का ध्यान नहीं रखा है।

आतंकवाद का नीतिगत विरोध करने के बावजूद चीन ने भारत के खिलाफ पाक प्रायोजित आतंकवाद का कभी विरोध नहीं किया है। खुद चीन भारत के अक्साई चीन पर 1962 से अवैध कब्जा किया हुआ है। 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण पंचशील सिद्धांत का उल्लंघन कर भारत के पीठ में छुरा भोंकने जैसा था।

चीन का तिब्बत पर कब्जा भी अंतरराष्ट्रीय नियमों के हिसाब से सवालों के घरे में है। तिब्बत पर चीन के कब्जे का दलाई लामा ने हमेशा विरोध किया है। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को तिब्बत की संप्रभुता व स्वायत्तता का ख्याल क्यों नहीं आता है?

समुद्र पर यूएन का प्रावधान है कि कोई भी सदस्य देश सागर पर अपना भौगोलिक आधिपत्य कायम नहीं करेगा, जबकि चीन यूएन के नियमों की अनदेखी कर दक्षिण चीन सागर पर कब्जा जमाने की कोशिश में लगा है।

इस मसले पर हेग अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल में फिलिपींस से हार चुका है, फिर भी उसने हेग ट्रिब्यूनल के निर्णय को मानने से इनकार किया है। भारत, अमेरिका, जापान, फिलिपींस, दक्षिण कोरिया वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीनी घुसपैठ के विरोध में हैं।

ताइवान की संप्रभुता पर चीनी रुख शी के दावे से अलग है। भारत इकलौता ऐसा देश नहीं है जिसे चीन के इरादों पर शक है। जिन 65 देशों को इस प्रोजेक्ट का हिस्सा बनाने की बात हो रही है उनमें 44 देशों को इस योजना पर शक है।

भारत की चिंता है कि जो चीन दक्षिण चीन सागर, तिब्बत, पीओके और अरुणाचल के मसले पर नई दिल्ली की भावना का ख्याल नहीं रखता है, वह कभी भारत का दोस्त हो सकता है?

दरअसल चीन वन बेल्ट, वन रोड प्रोजेक्ट के जरिये सिल्क रोड या सिल्क रूट को जिंदा कर अपनी मंद अर्थव्यवस्था को चमकाना चाहता है और दक्षिण एशिया से लेकर दक्षिण पूर्व एशिया में अपना दबदबा कायम करना चाहता है। एशिया में भारत कभी भी चीन के दबदबे को स्वीकार नहीं करेगा न ही उसे सफल होने देगा।

चीन को यह समझना चाहिए। भारत खुद चाबहार प्रोजेक्ट के जरिये यूरोप तक नई दिल्ली की पहुंच बनाना चाहता है। चीन की बेजा दखलंदाजी उसे कूटनीतिक हाशिये पर धकेल सकता है। बराबरी के स्तर पर ही चीन और भारत साथ चल सकते हैं।

Next Story
Top