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भारत-चीन सीमा विवाद: दोनों देशों को भुगतने पड़ेंगे गंभीर परिणाम

विशाल जनसंख्या के चलते दोनों देशों की कठिनाइयां और चुनौतियां भी हैं।

भारत-चीन सीमा विवाद: दोनों देशों को भुगतने पड़ेंगे गंभीर परिणाम

सीमा पर तनाव बढ़ाना न चीन के हित में है और और न ही भारत के हित में है। दोनों ही दुनिया में सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। विशाल जनसंख्या के चलते दोनों देशों की कठिनाइयां और चुनौतियां भी हैं। दोनों ही देशों की अर्थव्यवस्था भी विशाल है और वह विकासशील है।

अच्छी बात यह है कि दोनों का फोकस अपने -अपने आवाम की बेहतरी पर है। ऐसे में मामूली मनमुटाव से सीमा पर तनाव के चलते अगर दोनों देश आपस में उलझते हैं, तो दोनों देशों का गरीबी उन्मूलन और खुशहाल देश निर्माण का ध्येय पटरी से उतर जाएगा।

यह बात दोनों देशों की सरकारें भी जानती हैं। इसके बावजूद अगर चीन सिक्किम सीमा पर भारत के साथ जानबूझकर तनाव बढ़ा रहा है तो साफ है कि चीन या तो किसी खुमारी में जी रहा है या वह धौंस का नया पहाड़ा गढ़ रहा है।

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सिक्किम सीमा पर अब तक जो भी हरकतें हुई हैं, उसमें साफ दिख रहा है कि चीनी सेना जानबूझकर भारत को उकसा रही है। भारत और चीन के बीच करीब 3800 किमी की सीमा है, उसमें अब तक कम से कम सिक्किम सीमा पर कभी कोई विवाद नहीं रहा है।

वहां जिस डोकलाम क्षेत्र को लेकर चीन विवाद कर रहा है, वह भूटान का हिस्सा है और भारत व भूटान के बीच हुई संधि के मुताबिक भूटानी सीमा व उसके क्षेत्र की रक्षा करना भारत की जिम्मेदारी है। इस संधि के बारे में चीन को भी पता है।

इसके बावजूद वह भारत के साथ उलझ रहा है। ऐसा पहली बार भी नहीं है। वह भारत के साथ सीमा पर पिछले कई दशकों से उलझता रहा है। अरुणाचल सीमा पर तवांग क्षेत्र में चीन पहले से विवाद खड़ा किया हुआ है।

1962 से वह भारत के अक्साई चिन पर अवैध कब्जा जमाया हुआ है। भारतीय क्षेत्र पीओके और गिलिगत और बाल्टिस्तान से बिना भारत की अनुमति के चीन ने सीपेक का निर्माण शुरू किया है। भारतीय सीमा पर चीनी सैनिक घुसपैठ भी करते रहे हैं।

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दक्षिण चीन सागर में भी चीन अवैध निर्माण कर रहा है। हिंद महासागर में चीनी पनडुब्बियां भारतीय जल क्षेत्र में घुसपैठ करती रहती हैं। यहां तक कि उसने मानसरोवर यात्रा के लिए अपनी सीमा से रास्ता तक बंद कर दिया।

जबकि इसी दरम्यान भारत की तरफ से केवल अपनी रक्षा की गई है। भारत ने कभी भी किसी चीनी क्षेत्र पर न ही घुसपैठ किया है और न ही उसे अपना बताया है। समूची दुनिया जानती है कि तिब्बत पर चीन ने किस प्रकार अपना कब्जा जमाया है।

आज भी बौद्ध धम्म गुरु दलाई लामा समेत तिब्बत के हजारों लोग भारत में निर्वासन की जिंदगी जी रहे हैं। विश्व को यह भी मालूम है कि एक दूसरे पर आक्रमण न करने और संप्रभुता का सम्मान करने सहित पंचशील समझौते के बावजूद चीन ने 1962 में भारत पर आक्रमण कर विश्वासघात किया था।

आज भी चीन विस्तारवादी मोह से मुक्त नहीं हुआ है। इसी का परिणाम है कि भारत, जापान, वियतनाम समेत करीब 14 देशों के साथ चीन का सीमा विवाद है। चीन को समझना होगा कि भारत भी उससे तेज गति से आर्थिक महाशक्ति बनने की राह पर है।

लेकिन भारत का तरीका विस्तारवादी मोह से ग्रसित नहीं है। 1962 के युद्ध को लेकर चीन की तरफ से अहंकार वाले बयान आए हैं, उससे लगता है कि चीन वैश्विक हालात की अनदेखी कर रहा है। यह वक्त राजनीतिक व सामरिक विस्तारवाद का नहीं है, बल्कि आर्थिक विस्तारवाद का है।

इसके लिए सैन्य ताकत नहीं व्यापार की ताकत के विस्तार की आवश्यकता है, और यह शांति व मैत्री से संभव है, दुश्मनी या तनातनी से नहीं। वैसे भी हर संप्रभु राष्ट्र को अपना दोस्त और पार्टनर चुनने का हक है। भारत वही कर रहा है।

वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट से इनकार का भारत को पूरा हक है, इसके लिए चीन दबाव नहीं बना सकता है। चीन को समझना होगा कि सीमा पर सैन्य हरकतों से वह भारत को तंग तो कर सकता है लेकिन वह कुछ बिगाड़ नहीं सकता है।

आज का भारत कूटनीतिक और सामरिक रूप से अपनी रक्षा करने में पूर्णतया सक्षम है। एशिया में चीन अकेले ताकत नहीं है, भारत और जापान भी हैं। चीन को भी भारतीय कूटनीति और सामरिक शक्ति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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