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आजादी के 70 साल: बदला है दुनिया का नजरिया

किसी राष्ट्र के निर्माण में बड़े व मूलभूत बदलाव के मौके आमतौर पर कम ही आते हैं।

आजादी के 70 साल: बदला है दुनिया का नजरिया

किसी राष्ट्र के निर्माण में बड़े व मूलभूत बदलाव के मौके आमतौर पर कम ही आते हैं। भारत आजादी की इकहत्तरवीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। यह अवसर खास है। इस लिहाज से नहीं कि हमें आजादी मिले सत्तर साल पूरे हो गए हैं। बल्कि इसलिए, क्योंकि सात दशक की इस यात्रा में अब दुनिया हमारी ओर एक उम्मीद और सम्मान भरी निगाहों से देख रही है। विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ रही है।

दो कुटिल पड़ोसियों चीन और पाक को छोड़ दें तो बाकी पड़ोसियों और अधिकांश देशों से हमारे रिश्ते बेहतर हुए हैं। सहयोग का सिलसिला आगे बढ़ा है। ऐसे में जबकि बहुत से विकसित और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएं हिचकोले खा रही हैं, हमारी जीडीपी सात प्रतिशत बनी हुई है। यह भी तब, जबकि मोदी सरकार ने नवंबर 2016 में 80 प्रतिशत मुद्रा को बदलने और उसके बाद जीएसटी लागू करने का साहसिक फैसला लिया।

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कुछ अर्थशास्त्री शंका जाहिर कर रहे थे कि इससे जीडीपी की दर नीचे चली जाएगी। रोजगार की संभावना को धक्का लगेगा। बहुत आसानी से लोगों ने आर्थिक सुधारों के इन बड़े फैसलों को स्वीकार किया। यही नहीं, उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में भाजपा को प्रचंड बहुमत देकर मोदी के प्रति भरोसा भी जताया। देश में जिस तरह के बुनियादी बदलाव लोग देख रहे हैं, उनसे यह उम्मीद जगी है कि वंचित, शोषित और विकास की दौड़ में पीछे छूटने वाले तबकों को अब इंसाफ मिल सकेगा।

अर्थव्यवस्था में खुलापन एक बात है और भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी व ईमानदार व्यवसाय-व्यापार दूसरी बात। इस पर गंभीरता से मंथन की जरूरत है कि हर आर्थिक सुधार का इस कदर विरोध क्यों होता है। कौन लोग हैं, कौन सी लॉबी हैं, जो सांसदों और राजनीतिक दलों के जरिये कड़े कानूनों की राह में बाधा बनकर खड़े हो जाते हैं, ताकि वे जवाबदेही से बच सकें और भ्रष्ट तरीकों से अपनी गांठ को मजबूत करते चले जाएं।

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1991 में पीवी नरसिंह राव के दौर में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ। चंद्रशेखर के समय जो हालात पैदा हो गए थे, देश को उससे उबरने में काफी वक्त लगा, लेकिन दरवाजे खुले तो विदेशी पूंजी निवेश के साथ बहुत सारी बुराइयां भी दबे पांव चली आईं। व्यवस्था में पारदर्शिता आनी चाहिए थी। इसके बजाय कई तरह के भ्रष्टाचारों ने जन्म लिया। हर तरह की कर चोरी से एक तबका अमीर होता चला गया।

दूसरा विकास की दौड़ में पिछड़ता चला गया। बेनामी संपत्तियां हर शहर-कस्बे में ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों के रूप में सिर उठाकर गरीब-गुरबा को चिढ़ाती नजर आने लगी। नेताओं, नौकरशाहों और भू-माफियाओं की मिलीभगत ने आम आदमी का जीवन दूभर कर दिया। सिर के ऊपर एक छत का उसका सपना धूल-धूसरित होने लगा। एक तरफ चमकते दमकते मॉल्स, मल्टीप्लेक्स और गगनचुंबी इमारतें खड़ी होती गईं,

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दूसरी ओर शहरों के आस-पास स्थित किसानों की जमीनें कौड़ियों के भाव हड़पी जाने लगीं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि जो ताकतें आज किसान-किसान चिल्लाते हुए दिखाई देती हैं, उन्हीं के शासनकाल में कभी एसईजेड के नाम पर तो कभी किसी दूसरे बहाने किसानों की उपजाऊ भूमि की सर्वाधिक लूट हुई और उन पर कभी एसईजेड नहीं बने। गरीबों, किसानों, वंचित तबके में आज जो असंतोष दिखाई देता है, उसकी वजहें साफ हैं।

जिस इलाके से वो काम की तलाश में शहर आते हैं, वो आज भी विकास की दौड़ में बहुत पीछे हैं। उन क्षेत्रों का अंधकार अभी तक दूर नहीं हुआ है। वहां के प्राइमरी स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, रास्ते और मूलभूत सुविधाओं के हालात देखकर पता चलता है कि नारे चाहे जो उछाले जाते रहे हों, उनका जीवन आज भी नारकीय है। उन्हें हर बुनियादी जरूरत के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

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चाहे बुनियादी जरूरतों के सवाल हों या रोजगार का प्रश्न।इसके विपरीत जब वे शहरों में आते हैं और वहां की गगनचुंबी इमारतें, लंबी-लंबी गाड़ियां, चमक-दमक, रहन-सहन, जीवन शैली और खुलापन देखते हैं तो उनके दिल और दिमाग में यह प्रश्न उठते हैं कि आजादी के सत्तर साल बाद भी उन्हें तमाम सुख-सुविधाओं से वंचित करके क्यों रखा गया है। ये दो भारत क्यों बना दिए गए हैं।

एक में फटेहाल, सुविधाओं से वंचित गरीब रहते हैं और दूसरे में हर तरह की सुख सुविधाओं में अमीर और संपन्न लोग हर तरह के सुख सुविधाएं पा रहे हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि जितना ध्यान शहरों पर दिया गया है, उतना ग्रामीण क्षेत्रों पर नहीं दिया गया। वहां बुनियादी जरूरतों तक की अनदेखी की गई। रोजगारों के सवाल आए तो वह भी शहरी स्कूलों में हर तरह की सुविधाओं के बीच पढ़े-लिखे संपन्न वर्ग के नौजवानों को ही मिलती चली गई।

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गांव-गरीब, वंचित और पिछड़े वर्ग से आने वाले नौजवानों को बड़े पदों पर तैनाती न के बराबर ही मिली है। बहुत हुआ तो वे सेना, पुलिस, दूसरे सुरक्षाबलों में चले गए। रोडवेज बसों में कंडक्टर लग गए। किसी सरकारी-गैरसरकारी संस्थान में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी लग गए या फिर मनरेगा जैसी योजनाओं में मजदूरी करके दो जून की रोटी की व्यवस्था करने को मजबूर कर दिए गए।

भारत की आजादी का प्रसाद खास तबके को ही मिलता रहे तो उस बड़े वर्ग में असंतोष होना स्वाभाविक है, जिसे उसके हकों से वंचित करके रखा गया है। वह असंतोष अक्सर दिखाई देता है। छोटी-छोटी बातों पर सड़कों को जाम कर देना। वाहनों को क्षतिग्रस्त कर देना। अस्पतालों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में तोड़फोड़ करना, इसी कुंठा और अनदेखी से उपजे गुस्से का परिणाम है।

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इस ताकत का इस्तेमाल यदि सरकारें देश निर्माण में कर पाती तो अंदाजा लगाइए कि हमारा राष्ट्र आज कहां होता? कुछ लोग राजनीतिक कारणों से मोदी सरकार पर प्रहार करते रहते हैं। खास विचारधारा से ग्रस्त ऐसे लोग उन बड़े बदलावों को नहीं देख पा रहे, जो पूरी दुनिया खुली आंखों से देख रही है। बीस करोड़ से अधिक गरीबों के जनधन खाते खुलवाना।

पांच करोड़ बीपीएल परिवारों को गैस कनेक्शन देना। गांवों व स्कूलों में शौचालय बनवाना। बिजली से वंचित 18 हजार गांवों को रोशन करना। सात करोड़ नौजवानों को स्वरोजगार के लिए मुद्रा ऋण देना। कालेधन पर चोट को 80 प्रतिशत नोटों को बदलना। डिजिटल ट्रांजैक्शन को बढ़ावा देना। लालू जैसे बेनामी संपत्ति बनाने वालों पर शिकंजा कसना। किसानों के ऋण माफ करना।

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सब्सिडी सीधे लाभार्थी के खाते में देना। मेक इन इंडिया के तहत एफडीआई। तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में इंटरव्यू खत्म करना। 2022 तक सबके लिए छत मुहैया कराने का संकल्प और स्वच्छता के अभियान को आगे बढ़ाना। ये सब ऐसे कदम हैं, जिन्हें ईमानदारी से लागू किया गया तो न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगेगा,

बल्कि पिछड़ गए लोगों को समावेशी विकास में शामिल किया जा सकेगा। पारदर्शिता भी आएगी। कुछ चीजें जरूर चिंता पैदा करती हैं परन्तु यदि समग्रता में देखा जाए तो देश ने जो दिशा पकड़ी है, उससे दुनिया का भारत के बारे में नजरिया बदला है और यह हमारी बड़ी सफलता है।

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