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युवाओं में आत्मघात की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक

औसतन हर चार मिनट में एक व्यक्ति खुदकुशी करता है

युवाओं में आत्मघात की बढ़ती प्रवृत्ति चिंताजनक

अभी कुछ ही महीने पहले की बात है, जब हैदराबाद यूनिवर्सिटी के शोध छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर अच्छा खासा राजनीतिक बवाल दिल्ली से पटना और हैदराबाद तक हो रहा था। उस हंगामे के पीछे कहीं न कहीं बिहार के चुनाव भी थे, परन्तु किसी ने वेमुला की आत्महत्या की मूल वजह को जानने समझने की जरूरत नहीं समझी। हैदराबाद यूनिवर्सिटी में वह पहली आत्महत्या नहीं थी। रोहित से पहले आठ और छात्र अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके थे, परन्तु राजनीतिक कारणों से उसे जानबूझकर तूल दिया गया। बहरहाल, भारत में आत्महत्या की बढ़ती वारदातें हमारे देश की दुनियाभर में एक चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही हैं।

पिछले मंगलवार को किशोर स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती विषय पर लेंसेट कमीशन ने यूसीएल इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ के केनेडी सभागार में जो रिपोर्ट पेश की है, उससे चिंता की लकीरें और गहरी होने वाली हैं। इसमें यह खतरनाक संकेत दिए गए हैं कि भारतीय युवा आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2013 में भारत में 10 से 24 साल के बीच के 62 हजार 960 युवाओं ने आत्महत्या का रास्ता चुना है। आत्महत्या के अलावा 2013 में सड़क दुर्घटना में 41 हजार 168 युवाओं की मौत हुई जबकि टीबी जैसी बीमारी से 32 हजार 171 युवाओं को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। चिंता की बात यह है कि हर विषय पर बात की जाती है, परन्तु कोई युवाओं की बात नहीं करता जो सबसे महत्वपूर्ण संसाधन हैं।
लेंसेट कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार भारत ही नहीं, दुनियाभर में सड़क दुर्घटनाओं, आत्महत्या, टीबी के अलावा अलग अलग तरह की हिंसा इस आयु वर्ग के युवाओं की मौत की वजह बन रही है। कमीशन 188 देशों के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद इस नतीजे पर पहुंचा है कि भारत में हालात बेहद निराशाजनक हैं। भारत में 2013 में 15 से 19 आयु वर्ग में 23,748 युवाओं ने आत्महत्या का रास्ता चुना, वहीं 20 से 24 के आयु वर्ग में 35,618 युवाओं ने आत्महत्या की है। आपको बताते चलें कि 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में 10 से 24 की उम्र के करीब 36 करोड़, 46 लाख, 60 हजार युवा हैं। यह देश की कुल आबादी का 30.11 प्रतिशत से भी अधिक है। लेंसेट की रिपोर्ट कहती है कि 10-14 के आयु वर्ग में डायरिया जैसे आंतों के संक्रामक रोग सबसे अधिक मौतों की वजह रहे हैं।
सांस संबंधी बीमारियां जैसे मलेरिया, टीबी के अलावा इन्सेफेलाइटिस और पशु के संपर्क में आने से होने वाली बीमारियां भी इस आयु वर्ग में मौत की बड़ी वजह बन रही हैं। ब्रिटिश शोधों के मुताबिक ऐसे युवा डिप्रेशन के ज्यादातर शिकार हो रहे हैं जिनके साथ किशोरावस्था में अच्छा व्यवहार नहीं हुआ हो। चार साल पहले विश्व स्वास्थ संगठन की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत दुनिया में ऐसे मुल्कों की कतारों में सबसे आगे खड़ा है, जहां लोग अपनी जिंदगी की डोर खुद ही काट देते हैं। इन हालात को देखते हुए यदि भारत को आत्महत्या की राजधानी कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
औसतन हर चार मिनट में यहां एक व्यक्ति खुदकुशी करता है, जिसमे 38 फीसदी लोग 15 से 29 आयु वर्ग के नौजवान होते हैं। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक 2009 में 1 लाख 27 हजार 151 लोगों ने खुदकुशी की। खुदकुशी की दर में हर साल दो फीसदी का इजाफा हो रहा है। अफसोस की बात तो यह है कि जिंदगी को ठुकराने का यह चलन भारतीय समाज के हर वर्ग और क्षेत्र में दिखाई दे रहा है। इसके कारणों को समझते हुए यदि समाधान के गंभीर प्रयास तुरंत शुरू नहीं किए गए तो हालात भवायह होते देर नहीं लगेगी।
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