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लोकसभा में दागियों की संख्या बढ़ना चिंताजनक

आज देश में शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जिसमें दागी नेता नहीं हों और उस पर आपराधिक मुकदमे नहीं चल रहे हों।

लोकसभा में दागियों की संख्या बढ़ना चिंताजनक

नई दिल्‍ली. राजनीति का अपराधीकरण एक ऐसी व्याधी है जो गुजरते वक्त के साथ भारतीय लोकतंत्र को अपनी रिगफ्त में लेती जा रही है, परंतु अफसोस की बात है कि इस समस्या से छुटकारा दिलाने में राजनीतिक दलों का रवैया नकारात्मक रहा है। देश की राजनीति पर अपराधीकरण किस तरह हावी है यह सोलहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजों से भी सामने आ गया। मसलन इस बार लोकसभा में दागियों की संख्या संसदीय इतिहास में अपने चरम पर है। इस बार लोकसभा में निर्वाचित होकर आए 543 में से 186 यानी 34 प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं।

जबकि 15वीं लोकसभा में 158 यानी 30 प्रतिशत लोकसभा सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इस बार इसमें चार प्रतिशत की वृद्धि हो गई है। गैर सरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने प्रत्याशियों के शपथपत्रों के आधार पर यह तथ्य उजागर किया है। वहीं 2014 के चुनाव में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले एक प्रत्याशी के जीतने की संभावना 13 प्रतिशत रही, जबकि साफ छवि के प्रत्याशियों के मामले में यह पांच प्रतिशत रही। राजनीतिक दलों की ओर से टिकट देने की एक बड़ी वजह यह भी है। लिहाजा मतदाताओं को भी मतदान के दौरान उम्मीदवारों की छवि पर सोच विचार करनी चाहिए।

पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्टने एक फैसले के तहत जेल में बंद नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दिया था। बाद में यूपीए सरकार ने कानून बनाकर उसके आदेश को निष्प्रभावी कर दिया गया। फिर जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि निचली अदालतों में दो साल या उससे अधिक की सजा होने पर जनप्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म हो जाएगी और वे चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। लालू प्रसाद यादव और रशीद मसूद इसके शिकार भी हुए। हालांकि यूपीए सरकार इसेभी खत्म करने के लिए अध्यादेश लाने की तैयारी कर चुकी थी, परंतु ऐन वक्त पर राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद अध्यादेश नहीं आ सका।

उसी कड़ी में एक और बड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि निचली अदालतों को सांसदों एवं विधायकों पर चल रहे आपराधिक मुकदमों का निपटारा आरोप-पत्र दाखिल होने के साल भर के भीतर करना होगा। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट बार-बार अपने आदेशों से राजनीति के अपराधीकरण नहीं होने देने का भरसक प्रयास करता रहा है पर उसका कोई असर होते नहीं दिख रहा है। शायद इसकी वजह राजनीतिक दलों में असहयोग की भावना है। यह उचित नहीं है।

आज देश में शायद ही कोई राजनीतिक दल होगा जिसमें दागी नेता नहीं हों और उस पर आपराधिक मुकदमे नहीं चल रहे हों। आज भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या राजनीति का अपराधीकरण है। यह स्थिति स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह सही नहीं कि जिनके खिलाफ गंभीर धाराओं में मामले दर्ज हैं, वही शासन चलाएं, यदि ऐसा होगा तो लोकतंत्र कहां बचेगा? और पीड़ित पक्ष को ऐसे हालात में न्याय कैसे मिल सकता है? लिहाजा 16वीं लोकसभा का आंकड़ा परेशान करने वाला है। अब नई बनने वाली सरकार से लोगों को एक उम्मीद है कि वह बड़े फैसले लेगी।

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