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डाॅ. एलएस यादव का लेख : वायु सेना की बढ़ती मारक क्षमता

इस वर्ष चीन व पाक सीमा पर चुनौतियां काफी बढ़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए वायु सेना की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास 33 स्क्वाॅड्रन लड़ाकू विमान हैं, जबकि चुनौतियों के हिसाब से भारत के पास लगभग 45 स्क्वाॅड्रन लड़ाकू विमान होने चाहिए। अब राफेल विमानों के आ जाने से वायु सेना अत्यन्त मजबूत हो गई है। अपनी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए वायु सेना हमेशा तत्पर रहती है। चीन व पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों के मद्देनजर वायु सेना भारतीय राजमार्गों पर अपने लड़ाकू विमानों को उतारने व राजमार्गों से ही युद्ध के लिए उड़ान भरने का अभ्यास कर रही है।

डाॅ. एलएस यादव का लेख : वायु सेना की बढ़ती मारक क्षमता
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डाॅ. एलएस यादव 

डाॅ. एल. एस. यादव

भारतीय वायु सेना 8 अक्टूबर 1932 से धीरे-धीरे प्रगति करती हुई अपने 90वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। बीते 89 वर्षों के इतिहास में ऐसे कई अवसर आए जब भारतीय वायु सेना के जांबाजों ने शत्रु के दांत खट्टे करके अपनी ताकत का एहसास करवाया। प्रत्येक चुनौती के समय भारतीय वायु सेना ने अपनी बहादुरी का लोहा मनवाया है। भारतीय वायु सेना के विमान हमेशा ही दुश्मन पर आफत बनकर टूटे हैं। हमेशा उन्होंने दुश्मनों को तबाह किया है और प्रत्येक युद्ध को जीतने में उन्होंने अहम भूमिका निभाई है। इस वर्ष चीन व पाक सीमा पर चुनौतियां काफी बढ़ी हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए वायु सेना की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं। वर्तमान में भारतीय वायु सेना के पास 33 स्क्वाॅड्रन लड़ाकू विमान हैं, जबकि चुनौतियों के हिसाब से भारत के पास लगभग 45 स्क्वाॅड्रन लड़ाकू विमान होने चाहिए। अब राफेल विमानों के आ जाने से वायु सेना अत्यन्त मजबूत हो गई है। अपनी मारक क्षमता बढ़ाने के लिए वायु सेना हमेशा तत्पर रहती है। चीन व पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों के मद्देनजर वायु सेना भारतीय राजमार्गों पर अपने लड़ाकू विमानों को उतारने व राजमार्गों से ही युद्ध के लिए उड़ान भरने का अभ्यास कर रही है। इसी तरह एक अभ्यास बीते माह की नौ तारीख का किया गया।

इस दिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने राजस्थान राज्य के बाड़मेर में नेशनल हाईवे-925 ए पर बने इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड (ईएलएफ) का उद्घाटन किया। इस हवाई पट्टी का उद्घाटन परिवहन विमान सी-130 जे हरक्यूलिस की आपातकालीन लैंडिंग अभ्यास से किया गया। जिस समय ये इमरजेंसी लैंडिंग ड्रिल हुई उस समय सी-130 जे हरक्यूलिस परिवहन विमान में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी एवं सीडीएस जनरल विपिन कुमार रावत सवार थे। इस दौरान वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्षल आर.के.एस.भदौरिया भी उपस्थित थे। राष्ट्रीय राजमार्ग-925 ए पर भारतीय वायु सेना के विमानों के लिए बनाया गया पहला इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड है। दोनों मंत्रियों ने इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड पर कई विमानों के संचालन को देखा। उनके सामने सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान, सैन्य परिवहन विमान एएन-32 और एमआई-17 वी हेलीकाॅप्टर ने इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड पर आपातकालीन लैंडिंग की।

यह इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड तकरीबन तीन किलोमीटर लम्बी है। आपात स्थिति में इसका उपयोग भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमानों को उतारने व टेक आफ करने के लिए किया जाएगा। राष्ट्रीय राजमार्ग- 925 ए के समानान्तर ही तीन किलोमीटर लम्बी एयर स्ट्रिप तैयार की गई है। जिसका उद्देश्य यह है कि यदि यु़द्ध के समय षत्रु हमारी एयर स्ट्रिप पर हमला करता है अथवा आक्रमण करके उसे नष्ट कर देता है तब उस दौरान इस इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड का प्रयोग किया जा सकता है। विदित हो कि इस इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड से पाकिस्तान की सीमा मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर है। ऐसे में इसका उपयोग युद्ध के समय विशेष रूप से किया जा सकेगा। अब यहां से बड़े-बड़े युद्ध अभियान संचालित किए जा सकेंगे। अभी तक हमारे पास पाकिस्तान की सीमा के नजदीक ऐसी कोई एयर स्ट्रिप नहीं थी। अब इसके हो जाने से हमारी आक्रामक क्षमता में काफी बढ़ोत्तरी हो जाएगी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने भारतीय वायु सेना के लिए किसी भी प्रकार की आपातकालीन स्थिति में विमानों को उतारने के लिए एनएच-925 ए के सट्टा-गंधव खंड के तीन किलोमीटर के हिस्से पर इमरजेंसी लैंडिंग फील्ड का निर्माण किया गया है। यह सुविधा भारतमाला परियोजना के तहत बखासर और सट्टा-गंधव खंड के नव विकसित टू-लेन पेव्ड शोल्डर का हिस्सा है। पेव्ड शोल्डर उस भाग को कहा जाता है जो हाईवे के उस हिस्से के समीप हो जहां से वाहन नियमित रूप से गुजरते हों।

इसकी कुल लम्बाई 196.97 किलोमीटर है। जिसकी कुल लागत 765.52 करोड़ रुपये आई है। इस आपातकालीन लैंडिंग पट्टी का निर्माण 43 करोड़ रुपये में किया गया है जिसमें पांच करोड़ रुपये भूमि अधिग्रहण के भी शामिल हैं। इसका निर्माण कार्य भारतीय वायु सेना और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की देखरेख में जीएचवी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा पूरा किया गया है। इसका निर्माण कार्य जुलाई 2019 में प्रारम्भ किया गया था और जनवरी 2021 में पूरा कर लिया गया था। यह परियोजना अन्तरराष्ट्रीय सीमा पर स्थित बाड़मेर और जालौर जिलों के गांवों के बीच सम्पर्क सुधार का काम करेगी। यह पश्चिमी सीमा पर स्थित होने के कारण भारतीय सेना को निगरानी कार्यों में मददगार सिद्ध होगी। जिससे उसका बुनियादी ढांचा काफी मजबूत हो जाएगा। बाड़मेर के पास जिस एयर स्ट्रिप का निर्माण किया गया है, वह एक छोटा सा एयरफोर्स स्टेशन समझा जा सकता है। इस एयर स्ट्रिप की खास बात यह है कि इसके दोनों तरफ पार्किंग स्थल भी तैयार किए गए हैं, जिससे लैंडिंग के बाद लड़ाकू विमानों को पार्क किया जा सके। यहां पर 25 गुणा 65 मीटर की प्लिंथ का दो मंजिला एयर ट्रैफिक कंट्रोल (एटीसी) टावर का निर्माण किया गया है। इसमें वायु सेना कर्मियों के लिए एक विश्राम कक्ष भी है।

इस एयर स्ट्रिप के दोनों छोर पर आपात स्थिति में प्रयोग के लिए गेट की भी व्यवस्था की गई है। एयर स्ट्रिप के बगल में साढ़े तीन किलोमीटर लम्बी और सात मीटर चौड़ी सर्विस लेन भी बनाई गई है जो आपात स्थिति में विशेष भूमिका अदा करेगी। इस परियोजना में आपातकालीन लैंडिंग पट्टी के अलावा कुन्दनपुरा, सिंधानियां और बाखासर गांवों में वायु सेना एवं भारतीय सेना की जरूरतों के हिसाब से तीन हेलीपैड का निर्माण किया गया है। यह कार्य पश्चिमी अन्तरराष्ट्रीय सीमा पर सेना और सुरक्षा नेटवर्क के लिए मजबूती का आधार होगा। राष्ट्रीय राजमार्गों के पास लड़ाकू विमानों के लिए उड़ान भरने एवं उतरने के लिए एयर स्ट्रिप बनाने की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के समय नाजी के शासन वाले जर्मनी से की गई थी। भारत के पड़ोसी देश चीन ने इस तरह की एयर स्ट्रिप बनाने का अभ्यास वर्ष 1989 में प्रारम्भ किया था। यह बात अलग है कि उसने पहली बार 2014 में अपने लड़ाकू विमान राजमार्ग पर उतारे थे। भारत के दूसरे पड़ोसी देश पाकिस्तान में पेशावर-इस्लामाबाद और लाहौर-इस्लामाबाद राष्ट्रीय राजमार्गों पर दो-दो एयर स्ट्रिप वायुसेना के उपयोग के लिए तैयार की जा चुकी हैं। इन देशों के अलावा सिंगापुर, फिनलैंड, पोलैंड, दक्षिण कोरिया और पूर्व सोवियत रूस में ऐसी एयर स्ट्रिप बनाई गई हैं। श्रीलंका में आतंकी संगठन लिट्टे राजमार्गों का उपयोग हवाई सेवा के लिए करता था।

( ये लेखक के अपने विचार हैं। )

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