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भारत में हर 5 में से 1 आदमी बीमारी के कारण करता है आत्महत्या, बहुत भयानक हैं ये आंकड़े

भारत में 3.85 लाख लोग बीमारी के कारण आत्महत्या कर चुके हैं। भारत में हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है।

भारत में हर 5 में से 1 आदमी बीमारी के कारण करता है आत्महत्या, बहुत भयानक हैं ये आंकड़े

हाल ही में महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व प्रमुख हिमांशु रॉय ने खुदकुशी जैसा कदम उठाया तो पुलिस विभाग ही नहीं आम लोग भी सन्न रह गए। 'सुपरकॉप' कहे जाने वाले हिमांशु रॉय कैंसर से पीड़ित थे। लम्बे समय से उनका इलाज चल रहा था। दबंग, जिंदादिल और स्वास्थ्य को लेकर सजग रहने वाले हिमांशु रॉय का कैंसर से लड़ते हुए यूं अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेना, उन लोगों की पीड़ा से रूबरू करवाता है जो बीमारियों के आगे हार मान जाते हैं।

हालांकि इस ओर गौर नहीं किया जाता है पर देश में ऐसे लोगों का एक बड़ा आंकड़ा है जो शारीरिक-मानसिक व्याधियों से जूझते हुए जिंदगी से मुंह मोड़ लेते हैं। किसी असाध्य बीमारी से जूझते हुए जब दर्द और शारीरिक-मानसिक संघर्ष असहनीय हो जाता है तो लोग जिंदगी के सफर पर ही विराम लगा देते हैं। यह सामाजिक-पारिवारिक और चिकित्सकीय व्यवस्था के लिए बेहद चिंतनीय है कि बीमारियां भी खुदकुशी का बड़ा कारण हैं।

दरअसल, लम्बे से तक चलने वाला इलाज़ और शरीर की घटती ऊर्जा से टूटता मनोबल कई बार मौत के चुनाव को मजबूर कर देता है। आंकड़े बताते हैं कि बीते 15 वर्षों में देश में 3.85 लाख लोग बीमािरयों के चलते आत्महत्या कर चुके हैं। हर पांच में से एक आत्महत्या बीमारी के कारण होती है। कभी असहनीय दर्द तो कभी कमज़ोर आर्थिक स्थिति के चलते इलाज न करवा पाने की मजबूरी।

किसी मामले में मरीज परिजनों को सेवा और खर्चे से बचाने के लिए तो कभी खुद के बचने की कोई उम्मीद बाकी ना रहने पर, कई मरीज मौत को चुन लेते हैं। कुछ मामलों में देखने आता है कि लम्बी बीमारी इंसान को भीतर से तोड़ देती है। यह निराशा और पीड़ा का ऐसा भंवर होता है कि इंसान को अपना जीवन समाप्त कर लेना ही एकमात्र रास्ता दिखाई देता है।

हालांकि हर इंसान इन जंग को पूरी शक्ति से लड़ता है पर नैराश्य का यह दौर कभी-कभी भावनात्मक टूटन की बड़ी वजह बन जाता है। जिंदादिल ऑफिसर हिमांशु रॉय ने भी कैंसर का डटकर मुकाबला किया, लेकिन हालिया समय में वे बेहद कमजोर हो गए थे। उनके बाल झड़ गए थे। शरीर काफी थक गया था। हिमांशु रॉय ने भी इन हालातों में अपने मनोबल को बनाए रखने के लिए दर्जनों हास्य उपन्यास मंगाए और पढ़े, पर इस पीड़ा से बाहर ना सके।

कहना गलत नहीं होगा कि मनोवैज्ञानिक रूप से यह जद्दोज़हद इंसान को भीतर से इतना कमज़ोर कर देती है कि खुद को संभालना मुश्किल हो जाता है। हमारे यहां जिस अनुपात में बीमारियों के आंकड़े बढ़ रहे हैं, इन व्याधियों के चलते जीवन लीला खत्म करने वालों की संख्या में भी इज़ाफ़ा हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक भारत में वर्ष 2015 में 1,33,623 लोगों ने खुदकुशी की थी।

पारिवारिक समस्याएं और बीमारियां इन लोगों की आत्महत्या के दो सबसे बड़े कारण रहे। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2001 से 2015 के बीच भारत में 18.41 लाख लोगों ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। इनमें से 3.85 लाख लोगों ने विभिन्न बीमारियों के कारण आत्महत्या की थी। 1.18 लाख लोगों ने मानसिक रोगों के कारण और 2.37 लाख लोगों ने लंबी बीमारियों से परेशान होकर जीवन का अंत कर लिया।

यह वाकई चिंतनीय है कि भारत में हर एक घंटे में 4 लोग बीमारी से तंग आकार आत्महत्या करते हैं। महाराष्ट्र बीमारी की वजह से आत्महत्या करने वाले राज्यों में सबसे आगे है | बीते पंद्रह सालों में महाराष्ट्र में 63,013, आंध्र प्रदेश में 48,776 और यूपी में 7,756 लोगों ने बीमारी के कारण ख़ुदकुशी कर ली है। जबकि हमारे यहां ऐसे अधिकतर मामले आज भी रिपोर्ट तक नहीं किये जाते।

घर-परिवार को सम्भालने में जुटी महिलाएं भी बीमारी से जूझते आत्महत्या का कदम उठा लेती हैं। खुदकुशी की घटनाओं में लगभग 21 प्रतिशत वाकये बीमारियों से जूझने वाले लोगों के हैं। निःसंदेह ऐसे हालात समाज और स्वास्थ्य विभाग दोनों को चेताने वाले हैं। गौरतलब है कि आज भी आर्थिक असमानता के कारण समाज के बड़े तबके तक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच नहीं है।

ऐसे परिवार बड़ी संख्या में हैं जो किसी गंभीर बीमारी के इलाज़ का खर्च उठाने की स्थिति में ही नहीं हैं। सेंटर फॉर इंश्योरेंस एंड रिस्क मैनेजमेंट और इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च द्वारा मध्यप्रदेश के दो जिलों में किए अध्ययन के मुताबिक़ ग्रामीण इलाकों में 40 प्रतिशत परिवारों में किसी सदस्य के बीमार पड़ने के कारण परिवार की आय को बड़ा धक्का लगता है।

वैश्विक अध्ययन भी बताते हैं कि सामाजिक और सांस्कृतिक कारक भी आत्महत्या के अहम कारक होते हैं। समाज के जिन तबकों तक चिकित्सकीय सेवाओं की पहुंच नहीं होती उनमें ऐसे मामले ज्यादा देखने में आते हैं। यही वजह है कि यह समस्या स्वास्थ्य मंत्रालय को स्वास्थ्य के अधिकार से जोड़कर भी देखनी होगी। कई असाध्य बीमारियों के रोगियों के प्रति आज भी भेदभाव की सोच देखने में आती है।

मरीजों के साथ भी डॉक्टर्स का भावनात्मक रिश्ता देखने को नहीं मिलता। ऐसे में बीमारी से जूझ रहे इंसान एकाकीपन और अपराधबोध के शिकार बन जाते हैं। यह एक कटु सच है कि ऐसे लोगों के लिए सकारात्मक और संवेदनशील व्यवहार परिवार और परिवेश में ही नहीं चिकित्सा सेवाओं से जुड़े संस्थानों से भी नदारद है। हालिया बरसों में हमारा सामाजिक-पारिवारिक ढांचा भी पूरी तरह गया है।

संयुक्त परिवारों में किसी बीमार सदस्य की देखभाल कोई बड़ी समस्या नहीं हुआ करती थी। इस व्यवस्था में परिजनों या सम्बन्धियों के उपचार या देखरेख के लिए सभी अपनी भागीदारी निभाते थे। अब एकल परिवारों की बढ़ती संख्या में मरीजों को ही नहीं स्वस्थ लोगों को भी अकेला और असहाय कर दिया है।

पारिवारिक व्यवस्था का यह मौजूदा ढांचा जाने-अनजाने पीड़ित व्यक्ति को यह अहसास करवा ही देता है कि उसकी बीमारी परिवार की आर्थिक स्थिति और परिजनों की आजादी के लिए बड़ी समस्या बन रही है। ख़ुदकुशी करने वालों में सबसे ज्यादा लकवा, कैंसर और एचआईवी संक्रमण से पीड़ित लोग शामिल हैं।

आमतौर पर देखने में आता है कि ऐसे रोगों से जूझ रहे लोगों के प्रति अपने हों या पराये, सहयोग और समझ भरा व्यवहार देखने में नहीं आता। यही वजह है कि दुविधा और दुःख के ऐसे मोड़ पर कई लोग हिम्मत हार जाते हैं।

ऐसे लोगों की हिम्मत और आत्मबल को टूटने से बचाने के लिए गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं और संवेदनशील सामाजिक माहौल की दरकार है। आज के बदलते सामाजिक ताने-बाने में भावनात्मक सहयोग देने वाला परिवेश बीमारी से जूझ रहे इंसान के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है।

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