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प्रमोद भार्गव का लेख : यूएन में तत्काल हो सुधार

संयुक्त राष्ट्र (United Nations) की उम्र 75 वर्ष हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं। इसकी निष्पक्षता भी संदिग्ध है, इसीलिए वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है, इसीलिए आतंक समर्थित चीन के रुख पर अमेरिका (America) ने चेतावनी दी है कि अगर चीन आतंकी संगठनों और सरगनाओं को प्रोत्साहित करता रहा तो सुरक्षा परिषद के श्ोष सदस्यों को नए कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

प्रमोद भार्गव का लेख : यूएन में तत्काल हो सुधार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा की 75वीं वर्षगांठ पर ऑनलाइन संबोधन में चीन (China) और पाकिस्तान पर करारा हमला बोला है। उन्होंने कहा, 'आतंकवाद और युद्ध ने लाखों जिंदगियां छीन लीं। लाखों मासूम बच्चे जो अपने हुनर के बूते दुनिया में छा जाने वाले थे, उन्हें आतंकवाद ने असमय लील लिया। यह बात सही है कि तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अनेक युद्ध हुए और अनेक गृह युद्ध भी हुए।

कितने ही आतंकी हमलों में खून की नदियां बहती रहीं। लाखों लोगों को जीवनभर की पूंजी गंवानी पड़ी और अपने घर छोड़ने पड़े। तब सवाल उठता है कि क्या संयुक्त राष्ट्र के प्रयास पर्याप्त रहे? कोरोना महामारी को फैले नौ माह बीत गए? इससे निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र (United Nations) कहां है? एक प्रभावशाली जवाबदेही कहां है, इसलिए आज पूरे विश्व समुदाय के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि जिस संस्था का गठन तब की परिस्थितियों में हुआ था, उसका स्वरूप क्या आज भी प्रासंगिक है? साफ है, संयुक्त राष्ट्र को गंभीर आत्ममंथन की जरूरत के साथ पर्याप्त सुधारों की दरकार है।

नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति पर प्रश्न-चिह्न लगाकर नसीहत दी है कि यदि यह वैश्विक संस्था अपने भीतर समयानुकूल सुधार नहीं लाती है तो कालांतर में महत्वहीन होती चली जाएगी। भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता से बाहर रखते हुए इस संस्था ने जता दिया है कि वहां चंद अलोकतांत्रिक या तानाशाह की भूमिका में आ चुके देशों की ही तूती बोलती है।

भारत समेत कई देश इसमें सुधारों की मांग कर रहे हैं। परिषद में स्थाई सदस्यता पाने के लिए भारत के दावे को अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व रूस समेत कई देश अपना समर्थन दे चुके हैं, लेकिन चीन के वीटो पावर के चलते भारत परिषद का स्थायी सदस्य नहीं बन पा रहा है। चीन के अलावा वीटो की हैसियत अमेरिका, ब्रिटेन, फांस और रूस रखते हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र की उम्र 75 वर्ष हो चुकने के बावजूद इसके मानव कल्याण से जुड़े लक्ष्य अधूरे हैं।

इसकी निष्पक्षता भी संदिग्ध है। वैश्विक परिदृश्य में संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने और आतंकी संगठनों पर लगाम लगाने में नाकाम रहा है। इसीलिए आतंक समर्थित चीन के रुख पर अमेरिका ने चेतावनी दी है कि अगर चीन आतंकी संगठनों और सरगनाओं को प्रोत्साहित करता रहा तो सुरक्षा परिषद के श्ोष सदस्यों को नए कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। अमेरिका की यह चेतावनी स्पष्ट संकेत है कि संयुक्त राष्ट्र का औचित्य अप्रासंगिक हो रहा है। लिहाजा पुनर्गठन जरूरी है।

दूसरे विश्व युद्ध के बाद शांतिप्रिय देशों के संगठन के रूप में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन हुआ था। इसका अहम्ा मकसद भविष्य की पीिढ़यों को युद्ध की विभीषिका और आतंकवाद से सुरक्षित रखना था। इसके सदस्य देशों में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन को स्थायी सदस्यता प्राप्त है। याद रहे चीन जवाहरलाल नेहरू की अनुकंपा से ही सुरक्षा परिषद का सदस्य बना था।

उस समय अमेरिका ने सुझाया था कि चीन को संयुक्त राष्ट्र में लिया जाए और भारत को सुरक्षा परिषद की सदस्यता दी जाए, लेकिन अपने उद्देश्य में परिषद को पूर्णतः सफलता नहीं मिली। भारत का दो बार पाकिस्तान और एक बार चीन से युद्ध हो चुका है। इराक और अफगानिस्तान, अमेरिका और रूस के जबरन दखल के चलते युद्ध की ऐसी विभीषिका के शिकार हुए कि आज तक उबर नहीं पाए हैं।

चीन किसी वैश्विक पंचायत के आदेश को नहीं मानता, जबकि भारत विश्व में शांति स्थापित करने के अभियानों में मुख्य भूमिका का निर्वाह करता रहा है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य नहीं है। भारत में दुनिया की 18 फीसदी आबादी रहती है। साफ है, संयुक्त राष्ट्र की कार्य-संस्कृति निष्पक्ष नहीं है।

1945 में परिषद के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक दुनिया बड़े परिवर्तनों की वाहक बन चुकी है, इसीलिए भारत लंबे समय से परिषद के पुनर्गठन का प्रश्न बैठकों में उठाता रहा है। परिषद के स्थायी व वीटोधारी देशों में अमेरिका, रूस और ब्रिटेन भी अपना मौखिक समर्थन इस प्रश्न के पक्ष में देते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के 193 सदस्य देशों में से दो तिहाई से भी अधिक देशों ने सुधार और विस्तार के लिखित प्रस्ताव को मंजूरी 2015 में दे दी है।

इस मंजूरी के चलते अब यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के एजेंडे का अहम्ा मुद्दा बन गया है। नतीजतन अब यह मसला एक तो परिषद में सुधार की मांग करने वाले भारत जैसे चंद देशों का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि महासभा के सदस्य देशों की सामूहिक कार्यसूची का प्रश्न बन गया है। अमेरिका ने शायद इसी पुनर्गठन के मुद्दे का ध्यान रखते हुए सुरक्षा परिषद में नई पहल करने के संकेत दिए हैं।

यदि पुनर्गठन होता है तो सुरक्षा परिषद के प्रतिनिधित्व को समतामूलक बनाए जाने की उम्मीद बढ़ जाएगी। इस मकसद पूर्ति के लिए परिषद के सदस्य देशों में से नए स्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ानी होगी। यह संख्या बढ़ती है तो परिषद की असमानता दूर होने के साथ इसकी कार्य-संस्कृति में लोकतांत्रिक संभावनाएं स्वतः बढ़ जाएंगी। असमानता दूर करने के लिए उचित प्रतिनिधित्व हेतु सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने से जुड़े मामलों पर लंबी चर्चा होगी।

इस सभा में बहुमत से पारित होने वाली सहमतियों के आधार पर अंतिम अभिलेख की रूपरेखा तैयार होगी। किंतु यह जरूरी नहीं कि यह अभिलेख किसी देश की इच्छाओं के अनुरूप ही हो, क्योंकि इसमें बहुमत से लाए गए प्रस्तावों को खारिज करने का अधिकार पी-5 देशों को है। ये देश किसी प्रस्ताव को खारिज कर देते हैं तो यथास्थिति बरकरार रहेगी। साथ ही यदि किसी नए देश को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता मिल भी जाती है तो यह प्रश्न भी कायम रहेगा कि उन्हें वीटो की शक्ति दी जाती है अथवा नहीं? हालांकि भारत कई दृष्टियों से न केवल स्थायी सदस्यता, बल्कि वीटो-शक्ति लेने की पात्रता भी है।

संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय, यूनिसेफ और शांति सेना जैसे संगठन काम करते हैं, लेकिन चंद देशों की ताकत के आगे ये संगठन नतमस्तक होते दिखाई देते हैं। इसीलिए शांति सेना की विश्व में बढ़ते सैनिक संघर्षों के बीच कोई निर्णायक भूमिका दिखाई नहीं दे रही है।

अंतरराष्ट्रीय न्यायालय जरूर युद्ध में अत्याचारों से जुड़े कई दशकों पुराने अंतरराष्ट्रीय विवादों में न्याय देता दिख रहा है, परंतु संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक संगठन जी-20, जी-8, आसियान और ओपेक जैसे संगठन लाचारी का अनुभव कर रहे है। अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों द्वारा इन्हें दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती कर दिए जाने के कारण भी इनका भविष्य संकट में है। इन खतरों के चलते इस वैश्विक मंच की विश्वसनीयता संकट में है, लिहाजा इसमें पर्याप्त सुधारों की तत्काल जरूरत है।

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