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ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री से मुलाकात के निहितार्थ

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि सहकारी संघवाद की भावना मजबूत होगी।

ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री से मुलाकात के निहितार्थ

पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार एक तरफ जहां केंद्र-राज्य संबंधों को टीम इंडिया और सहकारी संघवाद के रास्ते पर ले जाने का प्रयास कर रही है, तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसके उलट टकराव के रास्ते पर चल रही थीं। उन्होंने कई मौकों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्द का प्रयोग करने से भी गुरेज नहीं किया।

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उनके व्यवहार से ऐसा लग रहा था कि वे राजनीतिक लड़ाई को व्यक्तिगत लड़ाई मान बैठी हैं और इसी खुन्नस में केंद्र की भाजपा की अगुआईवाली राजग सरकार के साथ असहयोगात्मक रवैया अख्तियार की हुई थीं। इस राजनीतिक मतभेद में सबसे ज्यादा नुकसान प्रदेश की जनता को हो रहा था, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि सहकारी संघवाद की भावना मजबूत होगी।

दरअसल, प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी से उनकी पहली मुलाकात है। इससे पहले वे प्रधानमंत्री से मिलने से बचती रही थीं। यहां तक कि उन्होंने बीते दिनों नीति आयोग की पहली बैठक में पश्चिम बंगाल की तरफ से किसी प्रतिनिधि तक को नहीं भेजा था। खैर, देर सवेर ये मुलाकात होनी ही थी, क्योंकि भारत के संघीय ढांचे में कोई भी राज्य केंद्र को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकता है। वैसे भी राजनीतिक हित अपनी जगह हैं तथा देशहित अपनी जगह। और जहां देशहित की बात आए वहां राजनीतिक मतभेदों भुलाना ही बेहतर होता है।

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आज पश्चिम बंगाल की आर्थिक हालात बेहद खस्ता है। राजनीतिक रूप से ममता बनर्जी भी कमजोर हुई हैं। तृणमूल कांग्रेस की छवि भी दागदार हो गयी है, क्योंकि सारधा घोटाले में उनके कई विधायकों और सांसदों की संलिप्तता उजागर हुई है। इन दिनों पश्चिम बंगाल भारी कर्जके बोझ से लदा हुआ है। उसकी आमदनी उतनी नहीं कि वह उसकी भरपाई कर सके। कर्ज के कारण उसके विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि इसके लिए राज्य सरकार की लोकलुभावन नीतियां कहीं ज्यादा जिम्मेदार हैं।पश्चिम बंगाल इस संकट से अकेले नहीं उबर सकता है। इसके लिए केंद्र सरकार की मदद की दरकार होगी।

कानून ही नहीं सोच को भी बदलना जरूरी

केंद्र सरकार के सामने समस्या यह है कि वह एक झटके में भारी भरकम कर्ज को माफ भी नहीं कर सकती है और न ही एकमुश्त ब्याज दरों में कोईभारी कटौती कर सकती है, क्योंकि बाकी पिछडे राज्यों के बीच इसका गलत संदेश जाएगा और वे भी इस तर्क के आधार पर रियायत मांगने लगेंगे। हालांकि बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने साफ कर दिया है कि केंद्र सरकार राज्य में विकास योजनाओं को पैसे के अभाव में बाधित नहीं होने देगी। मौजूदा समय में तृणमूल कांग्रेस सारधा घोटाले में बुरी तरह फंसी हुई है। कईबड़े नेताओं के इसमें नाम आए हैं। इससे उबरने का एक ही रास्ता है कि ममता बनर्जी जिन मुद्दों पर राज्य की सत्ता में आई थीं, उसे पूरा करें। इसके लिए केंद्र सरकार का कदम कदम पर साथ जरूरी है। अब ममता बनर्जी पर निर्भर है कि उसका साथ लेते हुए बचे हुए समय में राज्य में विकास कार्यों को कितना आगे बढ़ा पाती हैं। क्योंकि अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव भी होने हैं।

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