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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग मामला: कांग्रेस की किरकिरी

पिछले कई दिनों से पूरे देश में इस बात की जोर-शोर से चर्चा हो रही थी कि कुछ विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का जो नोटिस राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू को दिया है, इस नोटिस का क्या अंजाम होता है? यह बात तो शुरू से साफ थी कि यह एक तरह से अधकचरी और बचकाना हरकत है।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग मामला: कांग्रेस की किरकिरी
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पिछले कई दिनों से पूरे देश में इस बात की जोर-शोर से चर्चा हो रही थी कि कुछ विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का जो नोटिस राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू को दिया है, इस नोटिस का क्या अंजाम होता है? यह बात तो शुरू से साफ थी कि यह एक तरह से अधकचरी और बचकाना हरकत है।

राज्यसभा के 64 सदस्यों ने इस महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। परन्तु इसके पारित होने के लिये राज्यसभा के दो-तिहाई सदस्यों की सहमती आवश्यक थी। विपक्षी दलों को राज्यसभा में इतना बहुमत प्राप्त नहीं था और मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग को लोकसभा में पारित करना तो असंभव ही था। इस तरह से यह स्पष्ट हो गया था कि हड़बड़ी में लाया गया महाभियोग का प्रस्ताव किसी भी हालत में सफल नहीं होगा।

सबसे दिलचस्प बात तो यह थी कि कांग्रेस ने महाभियोग लाने का फैसला किया था। परन्तु उसके दो वरिष्ठ सदस्य पूर्व प्रधानमंत्री डाॅक्टर मनमोहन सिंह और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया था। क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि इसका परिणाम क्या होने वाला है। इसलिए वे किसी भी हालत में अपनी किरकिरी नहीं करवाना चाहते थे।

उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने इस प्रस्ताव को खारिज करने से पहले देश के नामी-गिरामी न्यायविदों से सलाह मश्विरा किया और सभी ने सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि यह प्रस्ताव बिलकुल बेमानी है और राजनीतिक स्वार्थ के कारण महज सस्ते प्रचार के लिए लाया गया है। उपराष्ट्रपति ने न्यायविदों के अलावा पूर्व एटार्नी जनरलों, संविधान विशेषज्ञों और प्रमुख समाचारपत्रों के संपादकों के विचारों को भी पढ़ा।

फिर वे इस निर्णय पर पहुंचे कि इस प्रस्ताव को खारिज करने अलावा और कोई चारा नहीं है। जिस दिन यह महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति को सौंपा गया उसी दिन से मीडिया में प्रमुख संविधान विशेषज्ञों की राय आनी शुरू हो गई। संविधान और कानून के विशेषज्ञों ने राय जाहिर की कि यह एकदम बेमानी है, अधकचरा और बचकाना हरकत है जिसका कोई मतलब नहीं।

पूर्व एटार्नी जनरल सोली सारोबजी ने कहा कि सभापति वैंकया नायडू ने गुण-दोष के आधार पर इस नोटिस को नामंजूर कर दिया है और फैसला लेने के पहले कानूनविदों से विस्तारपूर्वक विचार विमर्श किया है। अतः उनका निर्णय शत-प्रतिशत उचित है। उसी तरह प्रसिद्व विधिवेता फली एस नरिमन ने कहा कि राज्यसभा के सभापति वैंकया नायडू ने जो फैसला लिया है वह सर्वथा उचित है।

संविधान के अनुसार इस विषय में फैसला लेने का अधिकार उन्हीं हो है और उनकी राय में वैंकया नायडू ने सही निर्णय लिया है। महाभियोग नोटिस में जो आधार रखे गये थे वे पर्याप्त नहीं है। उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज करने के पांच कारण गिनाए। सबसे बड़ा कारण यह था कि राज्यसभा के सदस्यों के लिये जो हैंडबुक जारी की गई है उसमें यह साफ लिखा गया है कि यदि इस तरह का कोई प्रस्ताव राज्यसभा के सभापति को सौंपा जाता है तो जब तक उस पर कोई फैसला नहीं हो जाता है,

उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। परन्तु विपक्षी दलों के नेताओं ने हड़बड़ी में नोटिस सौंपने के तुरन्त बाद 20 अप्रैल को प्रेस कांफ्रेस बुलाई और मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ तथा कथित आरोपों को सार्वजनिक कर दिया जो संसदीय गरिमा के खिलाफ था। इससे मुख्य न्यायाधीश पद की गरिमा को ठेस पहुंची है और मीडिया में बयानबाजी से माहौल दुषित हुआ है। उपराष्ट्रपति ने यह भी कहा कि नोटिस उचित तरीके से नहीं दिया गया।

महज किसी के विचारों के आधार पर, जबकि ठोस सबूत नहीं हो किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता है। चीफ जस्टिस की अयोग्यता या अक्षमता या उनके द्वारा पद के दुरूपयोग के आरोपों को साबित करने के लिये विश्वशनीय और सत्यापित तर्क जरूरी हैं, इसकी पूरी जानकारी होनी चाहिये। वैंकया नायडू ने यह भी कहा कि सांसदों ने जो भी आरोप लगाए हैं उनका कोई ठोस सबूत नहीं दिया गया है।

ये आरोप बुनियादी तौर पर न्यायपालिका की आंतरिक प्रक्रियाओं से जुड़े हुए हैं, ऐसे में इन पर आगे जांच की जरूरत नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि जो भी पांच आरोप लगाए गए हैं वे सुप्रीम कोर्ट के अंदरूनी मामले हैं। ऐसे में महाभियोग के लिए ये आरोप स्वीकार नहीं किए जा सकते हैं। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने अपने आदेश में यह साफ कर दिया था कि चीफ जस्टिस ही मास्टर आॅफ रोस्टर हैं और वे ही यह तय कर सकते हैं कि मामला किस जज के पास भेजा जाए।

जब से महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को भेजा गया टीवी के विभिन्न चैनलों पर बहस जारी थी और अनेक संविधान विशेषज्ञों ने एक स्वर में कहा कि यह स्वार्थ में उठाया गया कदम है और इस प्रस्ताव को उपराष्ट्पति को तुरन्त खारिज कर देना चाहिए। अंत में हुआ भी यही। उपराष्ट्रपति ने गहन विचार विमर्श के बाद और आरोप के सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद यह फैसला किया कि महाभियोग का आरोप पूर्णतः निराधार और असंवैधानिक हैं।

अतः उसे खारिज ही कर देना चािहए। उपराष्ट्रपति के इस निर्णय की देश के सभी संविधान विशेषज्ञों ने सराहना की और यह भी कहा कि भविष्य मे ंकिसी भी राजनीतिक दल को ऐसा नहीं करना चािहए। क्योंकि इससे न केवल देश के सर्वाेच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा पर आंच पहुंचती है बल्कि इससे पूरे देश की छवि विदेशों में धूमिल होती है।

सच कहा जाए तो विपक्षी दलों ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग के प्रस्ताव का नोटिस लाकर अपनी पूरी तरह किरकिरी करा ली है। अब विपक्षी नेता कह रहे हैं कि वे इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाएंगे। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट भी इस तरह के प्रस्ताव को तुरन्त खारिज कर देगा। प्रसिद्व कानूनविद रामजेठमलानी ने कहा है कि यह पूर्णतः बचकानी हरकत थी और ऐसे प्रस्ताव को शुरू में ही कूड़ेदान में डाल देना चाहिए था।

कुल मिलाकर स्थिति यह बनती है कि महज ओछि पब्लिसिटी के लिये कुछ राजनीतिक दलों ने फालतू में अपना बेड़ा ही गर्क कर लिया। इससे भविष्य मे भी राजनीतिक दलों को सीख मिलेगी कि जल्दबाजी और बदले की भावना से कोई ऐसा कदम नहीं उठाएं जिसके दुष्परिणाम अंत में उन्हें ही भोगने पड़ें।

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