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प्रो. रणबीर सिंह का लेख : स्वतंत्रता और विभाजन का हरियाणा की राजनीति पर प्रभाव

विभाजन के बाद जनसंख्या में हुए इस परिवर्तन ने हरियाणा की राजनीति में शहरी-ग्रामीण और जमींदार की बजाय यहां स्थानीय और पंजाबी के मुद्दे को शहरी क्षेत्रों की राजनीति में महत्वपूर्ण बना दिया। उस समय की कांग्रेस-अकाली सरकार के पुर्नस्थापना विभाग के मंत्री, ज्ञानी करतार सिह ने जहां हिंदुओं को रोहतक, गुरुग्राम हिसार, करनाल और अंबाला जिलों में बसाया, वहां सिखों को मुख्यत: करनाल और हिसार जिलों में बसाया गया।

प्रो. रणबीर सिंह का लेख : स्वतंत्रता और विभाजन का हरियाणा की राजनीति पर प्रभाव
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15 अगस्त 1947 के दिन जहां देश स्वतंत्र हुआ, वहां इसका विभाजन भी हो गया। दोनों घटनाओं का हरियाणा की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। पूर्वी पंजाब के प्रांत भारत में शामिल हुए, जिसमें इस क्षेत्र के गुरुग्राम, हिसार, रोहतक, करनाल और अंबाला जिले शामिल थे। शेष भारत की तरह यहां भी सांप्रदायिक दंगे हुए और गुरुग्राम के मेवात क्षेत्र को छोड़कर बाकी क्षेत्रों को मुसलमान पाकिस्तान चले गए और पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) से एक बड़ी संख्या में हिंदू और सिख यहां अपना सब कुछ गंवाकर पहुंच गए। उस समय की कांग्रेस-अकाली सरकार के पुर्नस्थापना विभाग के मंत्री, ज्ञानी करतार सिह ने जहां हिंदुओं को रोहतक, गुरुग्राम हिसार, करनाल और अंबाला जिलों में बसाया, वहां सिखों को मुख्यत: करनाल और हिसार जिलों में बसाया गया ताकि पंजाब में एक सिख बहुल क्षेत्र स्थापित किया जा सके।

1949 में 1949 में बंजर लॉ यूिटलाइजेशन एक्ट बनाकर अमृतसर जिले के सिख किसानों को पट्टेदार के रूप में इन्हीं दोनों जिलों में बसाया गया। जनसंख्या में हुए इस परिवर्तन ने हरियाणा की राजनीति में शहरी-ग्रामीण और जमींदार की बजाय यहां स्थानीय और पंजाबी के मुद्दे को शहरी क्षेत्रों की राजनीति में महत्वपूर्ण बना दिया। क्योंकि परिश्रम में पंजाबियों के यहां के व्यापार और उद्योगों में और आधुनिक व्यवसायों (जैसे कि वकालत, चिकित्सा आदि) में स्थानीय लोगों को पीछे छोड़ दिया। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार से मिली सांख्यता और अपनी मेहनत तथा मशीनीकरण की शैली से सिख किसान वर्ग ने स्थानीय किसानों से आगे निकल गए। सत्या. एम.राय ने अपनी पुस्तक 'पार्टीशन ऑफ पंजाब' में इन्हें ही हरियाणा प्रांत की मांग की उत्पति का कारण माना है।

स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान के द्वारा सार्वजनिक व्यस्क मताधिकार प्रदान करने का भी यहां की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ा। अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों और अन्य जातियों के साधन विहीन लोगों को मताधिकार मिलने, उच्च जातियों और वर्चस्व प्राप्त भूमिपति जातियों को नई चुनौतियां मिलने लगी। यूनियनस्टि पार्टी के समाप्त होने से चौधरी छोटूराम द्वारा स्थापित जमींदार जातियों का गठबंधन भी समाप्त हो गया तथा अहीरों, गूजरों, राजपूतों, रोड और सैनियों ने जाटों के वर्चस्व को चुनौती देना शुरू कर दिया। उपरोक्त दोनों प्रवृतियों को बढ़ावा देने में कांग्रेस की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका रही क्योंकि वह यूनियनस्टि पार्टी के नए अवतार जमीदार लीग के बचे खुचे प्रभाव को समाप्त करना चाहती थी। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के बाद शेष भारत की तरह, हरियाणा में भी कांग्रेस का वर्चस्व स्थापित हो गया था लेकिन इस पर पंजाब राज्य में गोपीचंद भार्गव और भीमसैन सच्चर के धड़ों में गुटबंदी का बहुत गहन प्रभाव था। जहां हिसार के कैप्टन रणजीत सिहं भार्गव के साथ थे वहां पंडित श्रीराम शर्मा और चौधरी लहरी सिंह सच्चर के समर्थक थे। इस गुटबंदी से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता को खत्म करने के लिए ही 1951 में पंजाब के तत्कालीन गर्वनर चन्दू लाल त्रिवेदी की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

1947-52 की हरियाणा की राजनीति पर 1949 में बने सच्चर फार्मूले का भी गहन प्रभाव पड़ा। इसे बनवाने में अकाली नेता ज्ञानी करतार सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। क्योंकि भार्गव मुख्यमंत्री रहते हैं या सच्चर मुख्यमंत्री बनते हैं यह अकालियों के समर्थन पर निर्भर करता था। इस फार्मूले पर हरियाणा के कांग्रेसी नेता, प्रो. शेर सिंह के भी हस्ताक्षर थे।

इस फार्मूले को इसलिए भी बनाया गया क्योंकि अकाली नेता मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी सूबे की मांग खड़ी कर दी थी और वे चाहते थे कि गुरुमुखी लिपि में पंजाबी भाषा को पंजाब की सरकारी भाषा बनाया जाए लेकिन पंजाब के हिंदु इस मांग के खिलाफ थे। हरियाणा क्षेत्र के लोग भी हिंदी भाषी होने के कारण इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं थे। इसीलिए बीच का रास्ता निकाला गया जिसे सच्चर फार्मूला कहते हैं। पंजाबी क्षेत्रों में पहली कक्षा से पंजाबी की िशक्षा अनिवार्य कर दी गई। हरियाणा और पहाड़ी क्षेत्रों में पांचवीं कक्षा से पंजाबी को दूसरी भाषा के तौर पर अनिवार्य कर दिया गया। भाषा के प्रश्न पर पंजाब में इतनी कटुता पैदा हुई कि 1951 की जनगणना में पंजाब में भाषा का कॉलम ही हटा दिया गया। हरियाणा राज्य की मांग को इसी परिपेक्ष में समझा जा सकता है। 1957 का हिंदी रक्षा आंदोलन भी इसी फार्मूले के विरुद्ध था।

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