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प्रो पीके आर्य का लेख : मैं धरती बोल रही हूं

मुझे लगा कि आज इस अवस्था में मुझे भी अपने बच्चों से बात करनी चाहिए। तुम मेरे आगोश में इस दुनिया में कहीं भी हो, तुम्हारी हालत देखकर मैं बहुत दु:खी हूं। कोई भी मां अपने बच्चों को कराहता हुआ देखकर भला खुश कैसे रह सकती है? आज कहने की हिम्मत कर रही हूं। मैं तुम्हारा बेहतर और सुखी भविष्य चाहती हूं। आज तुम जिस हालत में हो यह देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा है, लेकिन इस स्थिति के कुछ न कुछ जिम्मेदार तुम स्वयं भी हो!

प्रो पीके आर्य का लेख : मैं धरती बोल रही हूं

इस धरती पर रहने वाले मेरे बच्चों, मैं धरती बोल रही हूं! मैं आज तुमसे मुखातिब हूं। तुम सब ने कभी न कभी किसी न किसी रूप में मुझसे संवाद किया ही है, लेकिन यह पहला मौका है जब मुझे लगा कि आज इस अवस्था में मुझे भी अपने बच्चों से बात करनी चाहिए। तुम मेरे आगोश में इस दुनिया में कहीं भी हो, तुम्हारी हालत देखकर मैं बहुत दु:खी हूं। कोई भी मां अपने बच्चों को कराहता हुआ देखकर भला खुश कैसे रह सकती है? लेकिन ममता वश मैं आज तक जो कह नहीं पाई, आज कहने की हिम्मत कर रही हूं। मैं तुम्हारा बेहतर और सुखी भविष्य चाहती हूं। आज तुम जिस हालत में हो यह देखकर मेरा कलेजा मुंह को आ रहा है लेकिन इस स्थिति के कुछ न कुछ जिम्मेदार तुम स्वयं भी हो!

परमात्मा के परामर्श पर तुम्हारे महापिता सूर्य से करोड़ों साल पहले मैं छिटककर अलग हो गई थी। मैं अपनी छोटी बहन प्रकृति और उसके बच्चों वायु, जल और उसके पति आकाश के साथ मिलकर तुम सबको अपने आंचल में लाने की अभीप्सा रखती थी। तुम्हारा मन लगा रहे इसके लिए हम सबने बैठकर खूब सोचा समझा। हम सबने मिलकर सबसे पहले जल की मदद से समुन्दर और नदी पोखरों का निर्माण किया। फिर वन जंगल और खेत खलिहान बनाएं। तुम जब आओ तो तुम्हारा मन लगा रहे यह सोचकर हमने अपने एक बड़े हिस्से पर जंगली जानवरों, पशुओं, पक्षियों, जीव जंतुओं और रेंगने वाले सर्पों को भी जन्म दिया, लेकिन मेरा मन उदास था क्योंकि मैं तुम्हारा चेहरा देखना चाहती थी। वह घड़ी भी आई। तुम मानवों को देखकर हमारी खुशी का कोई ठिकाना न था। सब ठीक चल रहा था लेकिन तुम्हारे ही कुछ भाई बहनों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया। जंगल के पेड़ आकर रोने लगे की तुम्हारे बच्चे हमें मार रहे हैं। झगड़े ने तूल पकड़ा तो तुम्हारे ही बीच से एक व्यक्ति ने उठकर कहा हमें इसकी जरूरत है और अगर हम एक पेड़ काटेंगे तो चार लगा भी देंगे। बड़ी मुश्किल से मामला सुलझा पाई थी मैं! कुछ ही दिन बीते थे कि तुम्हारे ही कुछ बच्चों ने फल सब्जी छोड़कर जल के घर से मछलियां बाहर निकाल लीं। जल भी नाराज हुआ और प्रकृति अलग से आग बबूला होती हुई मेरे पास आई। मछलियों की शिकायत को बढ़ता देख तुम्हारे ही बीच से एक बूढ़ा सामने आया और कहने लगा कि हमारे बच्चे अगर आगे से मछलियां पकड़ेंगे तो हम उसी के वज़न के अनुपात में आटे की गोलियां और खाने की बाकि चीजें मछलियों को डाला करेंगे। किसी तरह से सुलझा था वो मामला भी। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि सवेरे सवेरे घर के बाहर बड़ा शोर था, मैंने बाहर निकल कर देखा कि बहुत से वन्य प्राणी खड़े रो रहे थे उनकी शिकायत थी कि तुम्हारे बच्चों की करतूतें अब बर्दाश्त से बाहर होने लगीं हैं। वे न सिर्फ हमें मार रहें हैं बल्कि हमारी खाल उतारकर अपने कपड़े भी सिल रहे हैं।

प्रकृति और उसका पूरा परिवार मुझसे नाराज था कि मैंने इन इंसानों को यहां बुलाया ही क्यों? मरती क्या न करती, बच्चों मैं अपना सा मुंह लेकर उनके पास पहुंची। उन तक ये बातें पहले ही पहुंच चुकी थी। उन्होंने हल निकालते हुए कहा मैं इन इंसानों में से ही कुछ को ऐसी सद्बुद्धि और अपनी सामर्थ्य दूंगा कि उनके कहने पर चलकर तुम्हारे ये बच्चे बहुत अच्छे हो जाएंगे। उन्होंने रघु, ऋषभदेव, श्रीराम, श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, जरथ्रुस्त्र, जीसस, मोहम्मद, नानक आदि को यह काम सौंपा। थोड़े समय तक ठीक चला फिर तुम तो उनके ही नाम पर आपस में लड़ने झगड़ने लगे। फिर एक दिन ऐसा भी आया कि तुम सब स्कूल जाने लगे। मुझे लगा कि चलो पढ़ लिखकर तुम शायद अच्छे इंसान बन जाओगे। सोचती थी कभी तो वो दिन आएगा, जब तुम अपनी सद्बुद्धि का प्रयोग करोगे।

अब मेरी छोटी बहन प्रकृति और उसके दोनों बच्चे वायु और जल भी मुझसे थोड़ा थोड़ा खफा रहने लगे थे। आकाश तो पहले ही इन झंझटों से स्वयं को अलग रखे हुए था। तब तक जल की शादी ऋतु से हो चुकी थी एक दिन उनका बेटा बादल रोता हुआ आया और कहने लगा कि इंसानों ने एक अजीब सी मशीन बनाई है जिस पर चढ़कर वो हमारे घरों में झांकते फिर रहे हैं। इस मशीन को वे जहाज कह रहे हैं पता है उससे इतना धुआं निकलता है कि हमारा तो दम ही घुटने लगा है।

मेरे बच्चों तुमने जो रासयनिक रिसाव किए उससे मेरा अस्तित्त्व ही खतरे में पड़ने लगा है। ये जो तुम परमाणु परीक्षण करते हो न इससे मेरा पूरा संतुलन ही डगमगा जाता है। ये जो उच्च प्रौद्योगिकी के नाम पर तुम रसायनों का इस्तेमाल करते हो इससे तुम्हारे ही जीवन पर खतरा मंडराने लगता है। ये जो तुम बड़े बांध बनाते हो न ये तुम्हारे पर्यावरण हेतु घोर संकट पैदा करते हैं। वनों के कटाव और पेड़ लगाने की प्रवृत्ति में कमी ने तुम्हारे लिए स्वच्छ प्राणवायु का अभाव उत्पन्न कर दिया है। सैन्य प्रशिक्षण और गोला बारूद का बिना वजह प्रयोग पूरे वातावरण को खराब करता है।

बच्चों तुम लोगों में से ही कुछ जिनकी राजनीतिक महत्त्वकांक्षाएं बेलगाम हैं पूरी दुनिया के लिए संकट का सामान सिद्ध हो रहे हैं। परमाणु परीक्षण वैश्विक पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचाते हैं, परमाणु हथियार विविध किरणें मुक्त करती हैं, जो कि कैंसर, ट्यूमर, प्रजनन निष्फलता, गर्भपात, जन्म दुर्गुणता व अन्य विविध मानवीय व पर्यावरणीय समस्याओं का कारण होती हैं। दो चार बातें और कहना चाहती हूँ सबको कृषि पर नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। निर्धनता व बेरोजगारी के विरुद्ध बढ़ते दुश्चक्र को कम करना की ज़रूरत है। उस स्तर की प्रौद्योगिकी उच्चता हासिल करने की ज़रूरत है, जो पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखती हो लेकिन इसमें सबसे प्रमुख भूमिका सूचना व सम्प्रेषण प्रौद्योगिकी की हो सकती है। सार्वजनिक क्षेत्र, निजी क्षेत्र अकादमिक जगत के मध्य पर्यावरण संकट और उत्पन्न चुनौतियों पर गठबंधन आयोजित करने की ज़रूरत है, जो पर्यावरण से सम्बन्धित सतत व स्वस्थ रणनीति, कार्य योजना, समाज के संरक्षण और सुरक्षा में योगदान दे सकता है। यह वर्तमान व भविष्य के अर्थतंत्र का एक महत्वपूर्ण केन्द्रीय आधार है, जो विकास हेतु अत्यावश्यक आर्थिक, सांस्कृतिक प्रतिमानों को पुनः संशोधित व पुनः निर्मित कर सकता है।

चांद और मंगल की चिट्ठी आई थी, वे दोनों डरे हुए हैं कि तुम्हारे कुछ साथी वहां भी पहुंच गए हैं। मैंने उन्हें समझा बुझा दिया है। तुम भी अपनी हरकतों से बाज आओ। प्रकृति से मेरी बात हुई है वो कह रही थी कि आज नहीं तो कल तुम इस वायरस से मुक्त हो ही जाओगे, लेकिन बच्चों ये समय आत्म निरिक्षण का है अपना सिंहावलोकन करो, जियो और सभी को जीने दो। कुछ ऐसा करो की तुम्हारी धरती मां को तुम्हारे होने और बने रहने पर गर्व हो। अच्छा अभी के लिए इतना ही। तुम्हारी धरती मां।

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