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मैं लेखक मेरे आँगन की

जीवन को ‘सेफ-जॉन’ में रखनेवाले आजकल के युवा इस मामले में मेरे प्रेरणा स्रोत हैं जो प्रत्येक क्षेत्र में ‘विकल्प’ लेकर चलते हैं। फिर मैं क्यों नही?

मैं लेखक मेरे आँगन की

‘लेखक’ शब्द सुनने में जितना ज़हीन लगता हैं उतना ही उलझावों से लबालब भरा हैं। ये मैं नहीं असल में मेरे एक लेखक मित्र का कहना हैं।शायद, वे मेरे इस क्षेत्र में आने के ख्यालात को सुन पेट की मरोड़ से परेशान हो उठे हैं और अब अपने इस दर्द की दवा मेरे लेखक ‘न बनने’ में खोज रहे हैं। उनका विचार हैं कि मैं अपनी ‘प्रोफेसरी’ तक सीमित रहूँ। मुझे इसका भी इल्म हैं कि वे दूसरों के सामने मुझे ‘सेंधमार’ का तमगा बख्श चुके हैं। वैसे मुझे रिटायरमेंट के बाद ही इस विशेष ‘आभूषण’की दरकार हैं पर चिंता अभी से छाती पर साँप की तरह लौटने लगी हैं।

जीवन को ‘सेफ-जॉन’ में रखनेवाले आजकल के युवा इस मामले में मेरे प्रेरणा स्रोत हैं जो प्रत्येक क्षेत्र में ‘विकल्प’ लेकर चलते हैं। फिर मैं क्यों नही? वैसे रिटायर्ड आदमी से ज़िंदगी भी उकताने लगती हैं ठीक परिवार और रिश्तेदार की तरह।

ये उकताहट मेरे उस अनमोल समय को बोझिल करे उससे पहले ही मैं उसे धता देने की तैयारी कर लू तो क्या बुरा है ?इसलिए ये निर्णय अंतिम हैं कि चाहे दम निकल जाये पर लेखन-क्षेत्र में फतह का झण्डा गाड़ कर ही दम लूँगी बिलकुल संतोष यादव की तरह जिसने दो बार अवरेस्ट को मात दी। पर ये होगा कैसे?अब जनाब! ये काम उतना भी आसान नहीं जितना मैंने सोचा था। कारण-‘अभिव्यक्ति की आजादी’,’अभिव्यक्ति के जोखिम’,’आहत भावनाए’,’आस्था को ठेस’, जैसे जुमले मेरे आसपास की हवा में भूतेला खौफ और डर घोल रहे है। अब, ये ‘आजादी’ तो ठीक है पर ‘जोखिम’ उठाना मेरे बूते के बाहर हैं क्योंकि बचपन में दादी सिर पर इतना गोबर उठवा चुकी कि अब किसी भी तरह का जोखिम मेरे स्वास्थ्य के लिए बड़ा हानिकारक सिद्ध होगा। मैंने ये बात बिना सबूत के नहीं कही जी! आजकल बिना सबूत के सुनता कौन हैं। बड़े बड़े घोटालोंकी नहीं सुनी जाती फिर मेरी अदनी-सी जान की क्या औकात कि मैं बिना सबूत बात करू।

मेरे पास बाकायदा मेडिकल सेर्टिफिकट हैं ! जारीकर्ता बड़े मशहूर डॉक्टर हैं। एक बड़े हॉस्पिटल के साथ साथ अपना प्राइवेट क्लीनिक भी चलाते हैं। एक व्यक्ति की अपोइंटमेंट केवल ‘इसी पुर्जे’ को जारी करने के लिए ही की हुई हैं। आप वहाँ मनचाही बीमारी का पुर्जा जारी करवा सकते हैं बिना झिझक। इतना ही नहीं महंगी दवाइयों के बिल भी बिना मशक्क्त पास कर देते हैं बशर्ते कि’लेनी-देनी’ की भूल चूक न हो बस! इसलिए सरकारी दफ्तरो के बाबुओ के अत्यंत प्रिय हैं। ये महाशय भी विकल्प सहित चालू हैं बेधड़क और इसलिए ‘बाबुओं’ के साथ साथ स्वयं भी बड़े चिंतामुक्त दिखते हैं।

‘लेखक’होने के सभी गुण मुझ में प्रतिभाषित होते हैं ये सभी जानकारों का दावा हैं। वैसे इस ‘जीव’{लेखक} को लिखना आना चाहिए बस! ये मैं कर ही लेती हूँ। मैं ‘बहु डिग्री धारी’भी हूँअपने भारतीय युवाओं की तरह। ये डिग्रियाँ ही दहाड़ मार मार लोगों से मेरी लेखकीय पहचान ब्या करती हैं पर लोग सुने तब न! और हाँ, एक बात और! इतना लेखन भी कर चुकी कि मुझे ‘लेखक’ का प्रथम वर्ण ‘ले’ का अधिकारी घोषित किया जा सके। अब बचा ‘खक’। तो साहब! इसके लिए मैंने सुना हैं कुकरी क्लासिस की तर्ज पर ‘सेफ और फेक लेखन’ क्लासिस भी चलती हैं। मैंने तो ये भी सुना हैं कि यहाँ सीखने के लिए ज्यादा कुछ नहीं,बस! एक ‘हाँ’ जैसा शब्द सीख कर याद रखना हैंऔर ‘न’,‘नहीं’,‘नो’,’ना’ जैसे फालतू असहमति दर्शाने वाले शब्दों से ‘कल्टी’ मारनी हैं। बचपन में माँ कहती सुनी थी-‘हाँ’ जी की नौकरी ‘ना’ जी का घर’ चूंकि हम औरतों का तो ‘ना’ तो छोड़िए ‘हाँ’ पर भी घर नहीं हैं! सो, ये‘न’ का जोखिम मेरे बूते के बाहर हैं। अब इस‘असहमति’ अर्थात ‘न’ की ताकत को ही लीजिये-घर से लेकर सत्ता के गलियारों तक में इस ‘न’ का इस्तेमाल करके देखये जरा! हाथ, पैर तो क्या आदमी की जान तक छीन लेती हैं ये ‘न’।

एक और उदाहरण देखिये वर्ण शक्ति का -‘लेखक’ शब्द के अंतिम दो व्यंजन-‘ख,क’यदि थोड़ा भी ज़ोर लगा कर वर्णमाला से‘आ’ स्वर का साथ ले ले! अजी, वैसे ही जैसे हमारे नेता जोड़-तोड़ की राजनीति का खेल खेलते हैं न! बिलकुल वैसे ही। तब होगा येकि ’खाक’ बनकर मेरे जैसे राजनीतिक दृष्टि से कमजोर नमूने को तो खड़े-खड़े खाक में मिला दे! चूंकि बचपन में माँ मुझे ‘माटी मिली’ कह कर गरियाती थी। सो, माटी से जुड़ी बात या गाली तो ठीक हैं! पर ये खाक में मिलना जरा पसंद नहीं मुझे! सूरदास कीयसोदा -कृष्ण कोआँगन की मिट्टी में घुटनों के बल चलते देख खुश हो कह उठी थी न कि ‘घुटरनू चलत रेणु-तन मंडित’।

वास्तव में ‘माटी मिली’ गाली से माँ का भी यही भाव था। बस! माँ सुबह सुबह आँगन में लगे नीम की निबौरी खा जबान से थोड़ी कड़वी हो उठती थी।यहाँ किसी विकल्प की बात सोचिए भी मति क्योंकि मात्र इसी ‘माँ’ नामक जीव का दुनिया में कोई विकल्प नहीं इसलिए आजकल के सुपुत्र माँ को ‘मुक्ति’ देने का उपक्रम बिना सरकारी मदद के सीधे स्वर्ग में टिकट बुक कर दूध के कर्ज की अदायगी कर रहे हैं।

वैसे मैं सीखने में ज्यादा वक्त नही लगाऊँगी। असल मेंस्कॉलर रही हूँन कॉलेज टाइम में,साथ ही अर्जुन की भांति कृतसंकल्प भी!अपनी जबान और पेन की नोक को सुविधानुसार घुमाने की कूवत भी रखती हूँ अवसरवादियों की भांति ताकि ‘सेफ जॉन’ मेंटेन कर सकूँ। कोशिश रहेगी कि जल्द से जल्द ‘सुपर ब्रो’ की तर्ज पर ‘सुपर-लेखक’ बन इस क्षेत्र के धुरंधरों को जल्द ही धूल चटा सकूँ।अब‘लेखक’ का ‘ले’तो ग्रहण कर ही चुकी हूँ मात्र ‘खक’ ही बचा हैं और समय भी अभी काफी हैं। बसप्रार्थनाकीजिये कि मेरी इस भीष्म प्रतिज्ञा के बाद और कार्यसिद्धि से पूर्व कोई ‘शिखंडी’ बीच में आकर ‘खक’ तो छोड़िए कहीं अर्जित किया ‘ले’ भी न ले उड़े और मैं ‘डेढ़ स्याणी’ विकल्प के चक्कर में फुस्सी पटाखा साबित न होऊ!

-डॉ अनीता यादव

(ये लेखिका के निजी विचार हैं। लेखिका डॉ. अनीता यादव आधा दर्जन से अधिक पुस्तकों का संपादन कर चुकी हैं। इसके अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके व्यंग्य, कहानिया और लेख प्रकाशित होते हैं। वे पिछले ग्यारह वर्षों से दिल्ली विश्वविद्यालय के गार्गी महाविद्यालय में प्रोफेसर हैं। )

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