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डॉ. मोनिका शर्मा का लेख : उत्सवधर्मिता के मानवीय रंग

होली ऐसा ही एक उत्सव है, जिससे ईश्वर का खुद अपने भक्तों संग रंग खेलने का अविश्वसनीय चाव, भाव और लगाव जुड़ा है तो लठमार होली के रूप में उत्सव का एक अलग ही सतरंगी आयाम भी। सामाजिक संबंधों की प्रगाढ़ता से लेकर सामुदायिक समरसता की उज्ज्वल सोच तक, यह इंद्रधनुषी उत्सव कितने ही मानवीय भाव लिए है। अनगिनत सामाजिक सरोकार समेटे है। राग-विराग का ऐसा अजब उत्सव शायद ही संसार के किसी दूसरे कोने में मनाया जाता है। प्रकृति, सामाजिक रीति-नीति और यहाँ तक कि इंसानी मनोवृत्ति से जुड़ा यह रंगों का त्योहार बहुत कुछ एक साथ साध लेने की सीख देता है।

डॉ. मोनिका शर्मा का लेख :  उत्सवधर्मिता के मानवीय रंग
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डॉ. मोनिका शर्मा

डॉ. मोनिका शर्मा

हमारे देश में उत्सवों से जुड़ी सामुदायिक परंपराओं के रंग अद्भुत हैं। इनसे जुड़ी रिवायतें सुखद आश्चर्य ही नहीं अविश्वसनीय भावों से भी साक्षात्कार करवाती हैं। होली ऐसा ही एक उत्सव है, जिससे ईश्वर का खुद अपने भक्तों संग रंग खेलने का अविश्वसनीय चाव, भाव और लगाव जुड़ा है तो लठमार होली के रूप में उत्सव का एक अलग ही सतरंगी आयाम भी। सामाजिक संबंधों की प्रगाढ़ता से लेकर सामुदायिक समरसता की उज्ज्वल सोच तक, यह इंद्रधनुषी उत्सव कितने ही मानवीय भाव लिए है। अनगिनत सामाजिक सरोकार समेटे है। राग-विराग का ऐसा अजब उत्सव शायद ही संसार के किसी दूसरे कोने में मनाया जाता है। प्रकृति, सामाजिक रीति-नीति और यहाँ तक कि इंसानी मनोवृत्ति से जुड़ा यह रंगों का त्योहार बहुत कुछ एक साथ साध लेने की सीख देता है। काशी में अबीर-गुलाल से रचा मनोहारी रंगोत्सव दैवीय अनुभूति से साक्षात्कार करवाता है तो चिता की भस्म से फाग रचाना, संसार का अकेला एक विचित्र त्योहारी रंग है। सुखद है कि हमारी समृद्ध उत्सवीय परंपरा में यह सब समाहित है। जो हर बार नई ऊर्जा से सराबोर कर जाता है |

समाज को एक सूत्र में बांधने वाला रंगोत्सव देश के हर हिस्से में अलग ढंग से मनाया जाता है। इस भिन्नता में ही एकता की झलक मिलती है। भारतीयता का भाव छलकता है। बरसाने में लठमार होली मनाई जाती है तो महाराष्ट्र में रंग पंचमी पर सूखा गुलाल लगाकर खुशियों के रंग बिखेरे जाते हैं। हरियाणा और राजस्थान में धुलंडी मनाई जाती है तो कुमांऊ में गीत बैठकी का आयोजन किया जाता है। पंजाब में होला-मोहल्ला का उत्सव मनाया जाता है तो छत्तीसगढ़ की होरी में लोकगीत गाए जाते हैं। यानी सब कुछ परंपरा और प्रकृति से जुड़ा सा| परंपरा और प्रकृति से जुड़े ऐसे बहुरंगी उल्लास के मानवीय रंगों का मेल ही हमें भीतरी और बाहरी पूर्णता दे जाता है। यही वजह है कि यह त्योहार उदारता और सहिष्णुता की सीख देने वाला भी कहा जाता है। जरूरत इस बात की है कि रंग पर्व के सार्थक भावों को समझते हुए इसे मनाया जाए। हालांकि बीते कुछ बरसों में होली के त्योहार को मनाने के रंग-ढंग काफी बदल गए हैं। व्यावसायिक सोच और जीवन की आपाधापी ने इस त्योहार से जुड़े रंगों को फीका कर दिया है। सामाजिक मेलजोल का परिवेश बहुत हद तक बदल गया है। आभासी जुड़ाव वास्तविक रिश्तों पर भारी पड़ा है। यह वाकई तकलीफदेह है कि हालिया बरसों की भागमभाग ने रंगपर्व से जुड़े चाव को बदल दिया तो बीते एक बरस के ठहराव ने भी उत्सवीय रंगों की छटा को फीका करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसे में फिर से बढ़ रहे कोरोना संक्रमण के बीच होली पाबंदियों के बीच मनानी होगी|

गौरतलब है कि पिछले वर्ष साल होली के बाद कोविड-19 संक्रमण के बढ़ते मामलों के चलते सरकार ने 68 दिनों का देशव्यापी लॉकडाउन लगाया था। इस वर्ष भी होली का पर्व करीब आते-आते कोरोना की दूसरी लहर का जोखिम बढ़ गया है। हर दिन बढ़ रहे आंकड़ों के बीच कई राज्यों में प्रतिबंध लागू हो गए हैं। इन पाबंदियों से होली के रंग में थोड़ा भंग पड़ता दिख रहा है पर जीवन सहेजने के लिए यह सख्ती जरूरी भी है। यही वजह है कि राजधानी दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक, तमाम राज्यों में त्योहारी मौसम में संक्रमण से बचाव के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।

दिल्ली में भीड़ जुटा कर होली खेलने पर पाबंदी लगाई गई है। सार्वजनिक कार्यक्रम के बजाय आम जन को घरों में ही होली खेलने को कहा गया है। सार्वजनिक जगहों पर होली के उत्सव की मनाही के चलते दिल्‍ली डिजास्‍टर मैनेजमेंट अथॉरिटी ने भीड़ इकट्ठा करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने का फैसला किया है। उत्तर प्रदेश में भी होली मिलन समारोह आयोजित करने पर रोक लगा दी है। प्रशासन से अनुमति लेकर आयोजन करना हो तो लोगों को मास्क और सैनिटाइजर का प्रयोग करना अनिवार्य होगा। राज्य में कोविड हेल्प डेस्क को फिर से सक्रिय करने का भी आदेश दिया गया है। साथ ही नोएडा और गाजियाबाद में धारा 144 लागू है। यानी 4 से ज्यादा लोग घर से बाहर कहीं एकत्रित नहीं हो सकते। जिसका सीधा सा अर्थ है कि होली का त्योहार भी सामूहिक रूप से नहीं मनाया जा सकता। उत्तराखंड में कंटेनमेंट जोन्स में होली सेलिब्रेशन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाया गया है। इन इलाकों में लोग अपने घरों में ही होली खेल सकते हैं। यहां होली के दिन खाद्य पदार्थ भी एक-दूसरे परिवार में बांटने की मनाही है । झारखंड सरकार ने रंगपर्व पर ना केवल नागरिकों से एहतियात बरतने की अपील की है बल्कि आगामी कई त्योहारों जैसे सरहुल, शब-ए-बारात, नवरात्रि रामनवमी, ईस्टर को भी सार्वजनिक रूप से मनाने पर पाबंदी लगा दी है। बिहार, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब में होली पर सार्वजनिक कार्यक्रम करने और भीड़ जुटाने की मनाही है। पंजाब के तो 12 जिलों में नाइट कर्फ्यू लागू है। महाराष्ट्र में भी तेज़ी से बढ़ रहे कोविड-19 के मामलों को देखते हुए हुए बीएमसी ने सार्वजनिक स्थानों पर होली मनाने पर रोक लगा दी है।

देश के हर हिस्से में लागू दिशा-निर्देशों के बीच भी रंगपर्व पूरे उत्साह और उमंग के साथ मनाया जा सकता है। असल में देखा जाए तो होली का पर्व जुड़ाव और सहभागिता का रंग लिए है। ऐसे में सभी की कुशल कामना के लिए गाइडलाइंस का अनुसरण करते हुए भी सकारात्मकता और सद्भाव का रंग बिखेरा जा सकता है। संयमित और सधे ढंग से उल्लास भरी खुशियों को साझा करना, इस वैश्विक संकट के समय उत्सवधर्मिता के मानवीय रंगों और सामाजिक सहभागिता का सार्थक संदेश दे सकता है। यही इस पर्व को सही मायने में सार्थक बना सकता है। इतना ही नहीं होली के पर्व से कई आध्यात्मिक और धार्मिक पहलू भी गहराई से जुड़े हैं। नकारात्मक सोच पर सकारात्मक विचारों की जीत और इन्द्रधनुषी रंगों के संगम के इस त्योहार का पौराणिक, आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व इसे और भी महत्वपूर्ण बना देता है। वेद-पुराणों से लेकर रामायण और महाभारत में भी रंग पर्व का उल्लेख मिलता है। जिनमें भक्ति का रंग भी है और प्रेमपगी आत्मीयता का भाव भी। तभी तो होली के त्योहार में उत्सवधर्मिता के जो रंग बिखरते हैं, वो मानवीय और पारिवारिक मूल्यों को भी जीवंत बना देते हैं। इस उत्सव के पीछे जितनी भी धार्मिक मान्यताएं, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक घटनाएं छुपी हैं, सभी किसी न किसी रूप में हमारी सद्भाव और सहयोग भरी आस्था को ही पोषित करती हैं। आस्था के ऐसे भाव ही आपदा की अनिश्चितता के इस दौर में जिंदगी सहेजने वाले हैं। साथ ही होली के पर्व का उद्देश्य समानता के भाव और मानव-कल्याण की सोच को पोषित करना भी है, जिनके बिना जीवन में मानवीय भावनाओं के रंग नहीं निखर सकते।

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