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मनमोहन सिंह को किस रूप में देखेगा इतिहास

सोलहवीं लोकसभा के लिए चुनाव प्रचार थम गया है। सोमवार को अंतिम और नौवें चरण का मतदान भी समाप्त हो जाएगा।

मनमोहन सिंह को किस रूप में देखेगा इतिहास
नई दिल्ली. सोलहवीं लोकसभा के लिए चुनाव प्रचार थम गया है। सोमवार को अंतिम और नौवें चरण का मतदान भी समाप्त हो जाएगा। फिर संभावित सरकार पर अटकलों का दौर शुरू हो जाएगा। चुनाव प्रचार में सभी छोटे-बड़े नेताओं की उपस्थिति दर्ज की गई, परंतु मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहीं नजर नहीं आए। हालांकि उन्होंने पहले ही बाकायदा स्पष्ट कर दिया था कि वे तीसरी बार प्रधानमंत्री की रेस में नहीं होंगे, परंतु यह आश्चर्य ही है कि जिस चुनाव से देश को प्रधानमंत्री मिलता है, जिस पर देश को सशक्त नेतृत्व देने और आगे ले जाने की जिम्मेदारी होती है, उससे मौजूदा प्रधानमंत्री नदारद रहे।
तो क्या पार्टी द्वारा अब उन्हें चुनाव जिताऊ चेहरा नहीं माना जा रहा है, यही डॉ.मनमोहन सिंह गत लोकसभा चुनावों में दर्जनों रैलियां कर यूपीए का बखान करने में अग्रणी रहे थे। और पार्टी को जीत भी दिलाई थी। कहा जा रहा है कि वे अपनी विदाईकी तैयारी कर रहे हैं और इस बाबत दुनियाभर के नेताओं को भी विदाई चिट्ठी लिख रहे हैं। अब जब उनका जाना तय हो गया है तो उनके दस वर्षों के कार्यकाल का हर कोईअपने तरीके से आंकलन कर रहा है। गत प्रेस वार्ता में उन्होंने भी कहा था कि इतिहास ही उनका बेहतर मूल्यांकन करेगा।
कांग्रेस अपनी सरकार के दस वर्षों के काम काज का जितना भी बखान कर ले, परंतु इस दौरान उसकी नाकामियां उन सभी पर भारी हैं। किसी भी सरकार की विफलताएं उसके अगुआ यानी प्रधानमंत्री के सिर पर ही आती हैं। डॉ.मनमोहन सिंह की पहचान एक अर्थशास्त्री के रूप में है, परंतु उनके पूरे कार्यकाल में अर्थव्यवस्था बद से बदतर होती गई। वे महंगाई को रोकने में विफल रहे, आर्थिक विकास दशक के निचले स्तर पर चली गई और रुपये की कमजोरी ने देश को संकट में डाल दिया है।
उन्होंने खुद ही स्वीकारा है कि महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को दूर करने में वे नाकाम रहे। वहीं विदेश नीति की बात करें तो यहां भी उनकी कमजोरी बार-बार सामने आई। पाकिस्तान व चीन जैसे पड़ोसी देश बार-बार आंख दिखाते रहे। अमेरिका के साथ रिश्तों में तल्खी आई। उनकी नाक के नीचे घोटालों का रिकॉर्ड बना और वे सब कुछ होता देखते रहे। यहां तक कि पिछले पांच वर्ष में नीतिगत अपंगता की स्थिति रही है। सरकार में महत्वपूर्णनिर्णय नहीं लिए जाने से देश बदहाली की स्थिति में पहुंच गया है। यह सब उनके कमजोर नेतृत्व के कारण हुआ, जिसकी पुष्टि उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू की किताब ने भी की है। किताब में कहा गया हैकि उन्होंने गांधी परिवार के सामने हथियार डाल दिए थे।

यही वजह है कि उन पर अब तक के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री होने के आरोप लगे। देश के अंदर भी काफी उथल पुथल की स्थिति रही, जिसका वे कूटनीतिक हल निकालने में विफल रहे। गठबंधन में शामिल सदस्य दल भी बार-बार उन्हें हथियार डालने पर मजबूर करते रहे। यहां भी उन्होंने अपने कमजोर नेतृत्व का परिचय दिया। अब डॉ. मनमोहन सिंह भावी प्रधानमंत्री को जिम्मेदारी सौंपने की तैयारी में हैं। 16 मई को नतीजे आने के बाद वे अंतिम रूप से देश को संबोधित करेंगे, तब भले ही अपने कार्यकाल को बेहतर बताने के लिए आंकड़ों का सहारा लें, परंतु जब कभी भी निष्पक्षता से सोचेंगे तो उनको अपनी विफलताएं भी नजर आएंगी, जो कि उनकी थोड़ी बहुत उपलब्धियों पर भारी पडे़गी।

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