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अस्पतालों की सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल

कई तरह की लापरवाहियां खुलेआम होती हैं और उनके गंभीर नतीजे लोगों को भुगतने पड़ते हैं।

अस्पतालों की सुरक्षा को लेकर उठे गंभीर सवाल
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के सबसे बड़े एसयूएम अस्पताल में हुए हादसे ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वहां अचानक भड़की आग में बीस से अधिक मरीज और उनके तिमारदार झुलसकर अकाल मौत के शिकार हो गए। सैकड़ों घायल हैं, जिनमें से बीस की हालत चिंताजनक बताई जा रही है। 2011 में कोलकाता के एक अस्पताल में लगी भीषण आग में अस्सी से अधिक लोग इसी तरह के दर्दनाक हादसे के शिकार हुए थे। लगता है, उस घटना से कोई सबक नहीं सीखा गया। अब ओडिशा सरकार कह रही है कि अगर अस्पताल प्रशासन जिम्मेदार पाया गया तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
बताते हैं कि 2012 में इस अस्पताल को कुछ सुरक्षा उपाय करने को कहा गया था। अब यह देखना होगा कि अस्पताल ने वह कदम उठाए या नहीं। हैरानी की बात यही है कि जब तक इस तरह के दुर्भाग्यपूर्ण हादसे नहीं होते, तब तक शासन-प्रशासन के लोग नीचे से ऊपर तक सोते रहते हैं। जैसे ही दर्दनाक घटनाएं घटती हैं, वैसे ही सब अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए दूसरे के सिर पर दोष मढ़ना शुरू कर देते हैं। सवाल यह है कि 2012 में यदि प्रशासन ने पैमाईश के बाद अस्पताल में सुरक्षा को लेकर कुछ गड़बड़ी देखी थी और उन्हें दुरुस्त करने को कहा था तो इसकी जांच क्यों नहीं की गई कि उन कमियों को दूर किया गया है अथवा नहीं।
खासतौर से अस्पताल ऐसी जगह है, जहां लोगों के बेमौत मारे जाने पर गहरा अफसोस होता है। अस्पताल लोगों को मौत नहीं, जीवन देने की जगह है। वहां इस तरह के हादसे हों और लोग मारे जाएं तो इससे खराब स्थिति और कुछ नहीं हो सकती। जो मरीज वहां इस उम्मीद से भर्ती हुए कि जल्दी स्वस्थ होकर फिर अपने परिजनों के बीच होंगे, उन्हें आखिर क्या मिला? शुरुआती सूचनाओं से पता चला है कि अधिकांश की मौत धुएं में दम घुटने से हुई है। कई मंजिले इस अस्पताल में क्या वेंटीलेशन की माकूल व्यवस्था नहीं की गई थी? और ऐसे हादसे हो जाएं तो क्या मरीजों और लोगों की सुरक्षित निकासी की सही व्यवस्था नहीं की गई थी? यह सब जांच के मुद्दे हैं।
जांच बैठाने में सरकारें जितनी जल्दी करती हैं, उसकी रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और उन पर सख्ती से अमल करने में उतनी ही ढील दिखाती हैं। ऐसा नहीं है कि पहले इस तरह के हादसों के कारणों की पड़ताल नहीं हुई होगी। जांचकर्ताओं की ओर से ऐसी सिफारिशें भी की गई होंगी, जिनसे ऐसे हादसों से बचा जा सके, परंतु क्या उन्हें सरकारें और प्रशासन सख्ती से लागू करने के प्रति संजीदा होते हैं? शायद नहीं। होते तो भुवनेश्वर जैसा दर्दनाक हादसा नहीं हुआ होता। अकेले भुवनेश्वर की क्या बात करें।
हर शहर और कस्बे में अस्पताल होते हैं। स्थानीय प्रशासन कभी इसकी जहमत नहीं उठाते कि वे हर अस्पताल की पैमाईश कराकर जांचें कि सुरक्षा की न्यूनतम उपाय भी वहां किए गए हैं या नहीं। दरअसल, अस्पतालों के प्रशासन पुलिस, प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे से जुड़े अधिकारियों और उनके रिश्तेदारों, परिचितों को मुफ्त या सस्ते में इलाज उपलब्ध कराकर पहले ही उपकृत कर चुके होते हैं। ऐसे में उनकी निष्पक्ष जांच कौन करे? सख्ती कौन करे। यह बड़ा कारण है लापरवाही का।
अस्पतालों और डाक्टरों को दूसरा जीवन देने वाला माना जाता है, परंतु इस पेशे में कितनी और किस कदर खराबियां आ चुकी हैं, यह जानता है जो भुक्तभोगी होता है। बेहतर स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधाओं को लेकर केंद्र और राज्यों के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय तरह-तरह के दावे करते रहते हैं, परंतु जमीनी स्तर पर जाकर यह देखने, जांचने-परखने की किसी को फुर्सत नहीं है कि हालात कैसे हैं? आम लोगों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं तक का अभाव होता है। कई तरह की लापरवाहियां खुलेआम होती हैं और उनके गंभीर नतीजे लोगों को भुगतने पड़ते हैं।
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