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आलोक पुराणिक का लेख : उम्मीद जगाने वाले आंकड़े

रिजर्व बैंक महंगाई के आंकड़ों को लेकर अतिरिक्त संवेदनशील रहता है। कुल मिलाकर संभावना यही है कि ब्याज दरों में गिरावट नहीं होगी और इससे उद्योग जगत की लागत पर असर पड़ेगा। कर्ज महंगा पड़ेगा तो मुनाफे कम ही होंगे और मांग भी कम ही होगी। कुल मिलाकर आने वाला वक्त खासा चुनौती वाला रहेगा, इसलिए कुछ आंकड़ों में उम्मीदें दिख रही हैं, पर कुछ आंकड़े अभी भी चिंता का सबब बने हुए हैं। खासकर लघु उद्यमों का कोरोना पूर्व की स्थिति की तरफ आने में अभी समय लगता प्रतीत होता है।

आलोक पुराणिक का लेख : उम्मीद जगाने वाले आंकड़े
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आलोक पुराणिक

आलोक पुराणिक

मंदी के दौर का सामना करने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए आखिर अच्छी खबर आ गई है। दिसंबर 2020 में खत्म हुई तिमाही में भारत के सकल घरेलू उत्पाद 0.4 फीसदी की विकास दर दर्ज की गई है। यानी अब मोटे तौर पर माना जा सकता है कि अर्थव्यवस्था वापसी की राह पर आधिकारिक तौर पर निकल चली है। तकनीकी तौर पर मंदी की स्थिति तब मानी जाती है जब लगातार दो तिमाहियों में अर्थव्यवस्था सिकुड़ाव दर्ज करे। गौरतलब है कि जून 2020 में खत्म हुई तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 24.38 प्रतिशत की गिरावट दिखाई थी फिर सितंबर 2020 में खत्म हुई तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 7.35 प्रतिशत की गिरावट दिखाई थी। यानी कुल मिलाकर तकनीकी तौर पर भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की गिरफ्त में मानी जा रही थी। पर दिसंबर 2020 में खत्म हुई तिमाही में .4 प्रतिशत की विकास दर ने भारत को आधिकारिक तौर पर मंदी से बाहर निकाल लिया है। मंदी से बाहर निकल आने के गहरे आशय हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, इसके मंदी में जाने और मंदी से निकलने के गहरे आशय हैं। इसका मंदी में जाना और मंदी से बाहर आना ग्लोबल अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करता है

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) के अनुसार, चालू वित्त वर्ष की शुरुआती दो तिमाहियों में विकास दर शून्य से काफी नीचे चली गई थी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था भी तकनीकी रूप से मंदी की चपेट में आ गई थी। हालांकि वी आकार में तेज सुधारों के बूते अर्थव्यवस्था ने तीसरी तिमाही में ही मंदी को पीछे छोड़ दिया। अप्रैल-जून तिमाही में जहां विकास दर शून्य से 23.9 फीसदी नीचे चली गई थी, वहीं जुलाई-सितंबर की दूसरी तिमाही में भी 7.35 फीसदी की बड़ी गिरावट का सामना करना पड़ा था। अक्तूबर 2020 के बाद से ही औद्योगिक गतिविधियों में तेजी और घरेलू उत्पादन व खपत बढ़ने से तीसरी तिमाही में विकास दर 0.40 फीसदी पर आ गयी है। कई उद्योगों में मांग का स्तर कोरोना के पूर्व के स्तर पर पहुंच रहा है। आॅटोमोबाइल उद्योग और मोबाइल हैंडसेट ऐसे ही उद्योग हैं, जहां मांग का स्तर कोरोना के पूर्व के स्तर पर पहुंच रहा है। इस स्थिति के सकारात्मक परिणाम ये हैं कि इन कारोबारों से जुड़े तमाम कारोबारियों और कर्मचारियों की स्थिति भी बेहतर हो रही है और अर्थव्यवस्था में क्रय शक्ति का नया प्रवाह हो रहा है। इससे मांग को मजबूती मिल रही है और अर्थव्यवस्था को गति पकड़ने में मदद में मिल रही है। यूं तो रिजर्व बैंक और दूसरे महत्वपूर्ण संस्थानों में इस आशय के अनुमान आकलन पहले भी दिए थे कि भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से पटरी पर लौट रही है, पर आकलन की बात अलग होती है और हकीकत की बात और होती है। जब सरकार खुद घोषित कर दे कि हालात सुधर रहे हैं या बिगड़ रहे हैं, तब ही बात प्रामाणिक होती है और जब सरकार ने खुद ही घोषित कर दिया है, तब माना जा सकता है कि अब आधिकारिक तौर पर अर्थव्यवस्था का पटरी पर लौटना आकलन का नहीं, तथ्यों का विषय है।

सरकार ने पूरे वित्तवर्ष के दौरान जीडीपी में आने वाली गिरावट के अनुमान को बढ़ा दिया है। सरकार ने जनवरी में 7.7 फीसदी गिरावट का अनुमान लगाया था, जिसे बढ़ाकर 8 फीसदी कर दिया गया है। यानी 2020-21 में अर्थव्यवस्था पहले तय अनुमान के मुकाबले ज्यादा सिकुड़ेगी। इसका मतलब है कि 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 8 फीसदी घट जाएगा। 2019-20 में भारत की विकास दर 4 फीसदी रही थी। आरबीआई मध्यम अवधि के लिए भारत का वर्तमान महंगाई लक्ष्य अगले पांच वर्षों के लिए उपयुक्त है। इसके तहत केंद्रीय बैंक मध्यम अवधि में 4 फीसदी के महंगाई लक्ष्य को पाने के लिए इसे 2-6 फीसदी के दायरे में रखने की कोशिश करता है। आरबीआई ने ईंधन और खाद्य कीमतों के कारण होने वाली ऊंची एवं अस्थिर महंगाई को काबू में करने के लिए 2016 में लचीले महंगाई लक्ष्य ढांचे को अपनाया था। नियमों के मुताबिक, तय दायरे की समीक्षा हर पांच साल पर की जाती है। आरबीआई महंगाई को ध्यान में रखकर ही अपनी मौद्रिक नीति तय करता है। आरबीआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हर निश्चित अंतराल पर खुदरा महंगाई के लक्ष्य की समीक्षा होनी चाहिए, चाहे भले ही कानूनन इसकी जरूरत न हो। यह समझना जरूरी है कि अगले पांच वर्ष के लक्ष्य तय करते समय भविष्य में होने वाले संरचनागत बदलावों और आर्थिक झटकों का सटीक अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। दिसंबर, 2020 में खुदरा महंगाई आरबीआई के 2-6 फीसदी के सुविधाजनक दायरे में आ गई है। इससे पहले लगातार आठ महीने से यह इस तय लक्ष्य से ऊपर चल रही थी क्योंकि महामारी और लॉकडाउन के कारण आपूर्ति शृंखला प्रभावित हुई थी।

सरकार ने जब आधिकारिक तौर पर घोषित किया कि विकास दर .4 प्रतिशत पर आ गई है, तब ही रिजर्व बैंक ने महंगाई को लेकर अपनी चिंताओं को रेखांकित कर दिया है। इसका मतलब यह हुआ कि रिजर्व बैंक महंगाई को लेकर अपनी चिंताओं को किंचित मात्र भी कम नहीं करना चाहता। महंगाई और ब्याज का दर का गहरा रिश्ता है और ब्याज दर और विकास का गहरा रिश्ता है। अगर मंहगाई दर बढ़ती रही तो, तो रिजर्व बैंक ब्याज दरों में गिरावट को थामकर ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी की ओर उन्मुख हो सकता है। ब्याज दरों में बढ़ोत्तरी का मतलब कि चीजों की कीमतें बढ़ेंगी और फिर चीजों की कीमतों में बढ़ोत्तरी का मतलब यह होगा कि मांग में कमजोरी आएगी। मांग में कमजोरी का मतलब विकास का अवरुद्ध होना। ऐसा सरकार नहीं चाहेगी। कई बार रिजर्व बैंक के उद्देश्यों और सरकार की चिंताओं में टकराव हो जाता है, पर महंगाई को रोकना एक संस्थान के हाथ में नहीं है। आलू-टमाटर के भाव सीजनल कारणों से कम ज्यादा होते हैं, पर इनका असर सीधा महंगाई के आंकड़ों पर पड़ता है। रिजर्व बैंक महंगाई के आंकड़ों को लेकर अतिरिक्त संवेदनशील रहता है। कुल मिलाकर संभावना यही है कि ब्याज दरों में गिरावट नहीं होगी और इससे उद्योग जगत की लागत पर असर पड़ेगा। कर्ज महंगा पड़ेगा तो मुनाफे कम ही होंगे और मांग भी कम ही होगी। कुल मिलाकर आने वाला वक्त खासा चुनौती वाला रहेगा। इसलिए कुछ आंकड़ों में उम्मीदें दिख रही हैं, पर कुछ आंकड़े अभी भी चिंता का सबब बने हुए हैं। खासकर लघु उद्यमों का कोरोना पूर्व की स्थिति की तरफ आने में अभी समय लगता प्रतीत होता है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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