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सतीश सिंह का लेख : जीडीपी दर में सुधार की आस

बढ़ती मुद्रास्फीति को दृष्टिगत फरवरी में होने वाली मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दरों में कटौती की जा सकती है। 150 सालों में यह चौथी बड़ी वैश्विक मंदी है। हालांकि, वित्त वर्ष 2021-22 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में 4.00 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो सकती है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 में यह कम होकर 3.8 प्रतिशत के आसपास रह सकती है। अब अर्थव्यवस्था के विविध मानकों में सुधार हो रहा है, जिसकी पुष्टि मेटल, स्टील, सीमेंट, वित्त क्षेत्र के क्रेडिट अनुपात में 20 बीपीएस के सुधार से भी होती है। अब अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कारोबारी और आम लोग बैंक से उधारी लेने लगे हैं। यह मांग और आपूर्ति में तेजी का भी सूचक है।

सतीश सिंह का लेख : जीडीपी दर में सुधार की आस
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सतीश सिंह

पूर्व के अग्रिम अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2021 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत नकारात्मक रह सकता है, जो वित्त वर्ष 2020 की समान अवधि में 4.2 प्रतिशत रहा था। हालांकि, नॉमिनल जीडीपी वित्त वर्ष 2021 में 4.2 प्रतिशत नकारात्मक रहने का अनुमान है, जो वित्त वर्ष 2020 में 7.2 प्रतिशत रहा था।

गौरतलब है कि जीडीपी और नॉमिनल जीडीपी गणना के मानक अलग-अलग हैं। जीडीपी में एक वित्त वर्ष में देश की सीमा के अंदर उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों की गणना की जाती है। इसमें देश की सीमा के अंदर रहकर, जो विदेशी उत्पादन करते हैं, उसे भी शामिल किया जाता है, जबकि वैसे भारतीय, जो विदेशों में उत्पादन करते हैं, को जीडीपी से घटा दिया जाता है। इससे अलग, नॉमिनल जीडीपी में एक वर्ष में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं के मूल्यों की गणना बाजार मूल्य पर की जाती है।

वित्त वर्ष 2020-21 की पहली छमाही में नॉमिनल जीडीपी में नुकसान 13.1 लाख करोड़ रुपये हुआ है, जबकि जीडीपी में यह नुकसान 8.6 लाख करोड़ रुपये हुआ है। दूसरी छमाही में, नॉमिनल जीडीपी 4.5 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, क्योंकि तीसरी और चौथी तिमाही में नॉमिनल जीडीपी में सकारात्मक वृद्धि होने की संभावना है। हालांकि, मुद्रास्फीति की वजह से दूसरी छमाही में जीडीपी वृद्धि दर के नकारात्मक रहने का अनुमान है।

कोरोना काल में कृषि क्षेत्र की वजह से अर्थव्यवस्था को सहारा मिला हुआ है। तालाबंदी के दौरान यही वह क्षेत्र था, जिसमें विकास का पहिया लगातार घूमता रहा। वित्त वर्ष 2021 में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में 3.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इस क्षेत्र में 4.00 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई थी। औद्योगिक क्षेत्र में वित्त वर्ष 2021 में 9.6 प्रतिशत की दर से ऋणात्मक वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इस क्षेत्र में 0.9% की दर से विकास हुआ था। सेवा क्षेत्र में, वित्त वर्ष 2021 में 8.8 प्रतिशत की दर से ऋणात्मक वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इस क्षेत्र में 5.5 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई थी। सेवा क्षेत्र के उपखंड होटल, परिवहन, संचार आदि क्षेत्रों में वित्त वर्ष 2021 में 21.4 प्रतिशत की ऋणात्मक वृद्धि होने का अनुमान है, जबकि वित्त वर्ष 2020 में इस क्षेत्र में 3.6 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई थी। सरकारी खर्च को छोड़कर सभी क्षेत्रों में खर्च में कमी आई है। निजी खर्च में नॉमिनल आधार पर 5.6 प्रतिशत की कमी आई है, जबकि वास्तविक रूप से इसमें 10 प्रतिशत की कमी आई है। निर्यात में भी कमी आई है, जो आयात से थोड़ा कम है।

एक अनुमान के अनुसार वित्त वर्ष 2021 में केंद्र सरकार के राजस्व संग्रह में 3.8 लाख करोड़ रुपये की कमी आ सकती है, वहीं खर्च 4 लाख करोड़ रुपये अधिक रह सकता है। इस वजह से राजकोषीय घाटा के 15.8 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है, जो संशोधित नॉमिनल जीडीपी का 7.8 प्रतिशत होगा। वित्त वर्ष 2022 में नॉमिनल जीडीपी में 15 प्रतिशत की दर से वृद्धि होने का अनुमान लगाया गया है। ऐसा होने पर राजकोषीय घाटा 12.2 लाख करोड़ रुपये रह सकता है, जो जीडीपी का 5.4 प्रतिशत होगा। वहीं, वित्त वर्ष 2022 में केंद्र सरकार की समग्र उधारी लगभग 11.9 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। वहीं, राज्यों की उधारी 8.7 लाख करोड़ रुपये रह सकती है। केंद्र और राज्य सरकारों की उधारी को जोड़ने पर कुल उधारी 20.6 लाख करोड़ रुपये रह सकती है।

नवंबर, 2020 में सरकारी खर्च बजटीय अनुमान का 62.7 प्रतिशत रहा। इस महीने में ब्याज भुगतान ज्यादा रहा। खर्च बढ़ने से राजकोषीय घाटा बजटीय अनुमान का 135 प्रतिशत पहुंच गया है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण राजस्व संग्रह में कमी भी आना है। कॉर्पोरेट कर संग्रह बजटीय अनुमान का महज 27 प्रतिशत रहा है, जबकि आयकर बजटीय अनुमान का 37 प्रतिशत रहा। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह भी बजटीय अनुमान से 6.9 लाख करोड़ रुपये कम रहा है। एक अनुमान के अनुसार केंद्र सरकार का जीएसटी संग्रह वित्त वर्ष 2021 के लिए बजटीय अनुमान से 1.44 लाख करोड़ रुपये कम रह सकता है। हालांकि, उत्पाद शुल्क बजटीय अनुमान का 74 प्रतिशत है, जिससे राजस्व संग्रह के मोर्चे पर सरकार को थोड़ी राहत मिली है। अगर केंद्र सरकार संग्रहित आईजीएसटी का 50 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को देती है तो राज्यों की जीएसटी संग्रह की कमी घटकर 25000 करोड़ रुपये रह जाएगी। उपलब्ध आंकड़ों से पता चलता है कि राज्यों को अप्रैल से दिसंबर 2020 तक आवंटित आईजीएसटी का सिर्फ 31 प्रतिशत हिस्सा मिला है। राजस्व संग्रह में कमी आने की वजह से कोरोना काल में राज्यों ने पिछले साल के मुक़ाबले 41.5 प्रतिशत अधिक उधारी ली है।

बढ़ती मुद्रास्फीति को दृष्टिगत करते हुए फरवरी में होने वाली मौद्रिक समीक्षा में नीतिगत दरों में कटौती की जा सकती है। हालांकि, इस संदर्भ में 1 फरवरी को बजट में किए जाने वाले विविध प्रावधानों का भी ख्याल रखा जाएगा। विगत एक साल में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदमों के आलोक में ब्याज दरों को व्यावहारिक रखने की कोशिश की गई है, जिससे क्रेडिट की मांग में ज्यादा कमी नहीं आई।कोरोना महामारी के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था भी गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि 150 सालों में यह चौथी बड़ी वैश्विक मंदी है। हालांकि, वित्त वर्ष 2021-22 में वैश्विक अर्थव्यवस्था में 4.00 प्रतिशत की दर से वृद्धि हो सकती है, लेकिन वित्त वर्ष 2022 में यह कम होकर 3.8 प्रतिशत के आसपास रह सकती है।

बहरहाल, अब अर्थव्यवस्था के विविध मानकों में सुधार हो रहा है, जिसकी पुष्टि मेटल, स्टील, सीमेंट, वित्त क्षेत्र के क्रेडिट अनुपात में 20 बीपीएस या उससे अधिक के सुधार से भी होती है। इससे यह भी पता चलता है कि अब अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए कारोबारी और आम लोग बैंक से उधारी लेने लगे हैं। यह मांग और आपूर्ति में तेजी आने का भी सूचक है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

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