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होली के संदेशों से सराबोर हो समाज

रंगों के पावन पर्व होली को यूं ही त्योहारों के त्योहार की संज्ञा नहीं दी जाती है। दरअसल इन रंगों में पृथ्वी पर मौजूदा सभी बुराइयों को अपने अंदर समाहित कर लेने की असीम शक्ति है।

होली के संदेशों से सराबोर हो समाज

प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेंग सांग ने अपनी डायरी में एक जगह लिखा है- ‘एक दिन भारत में सभी लोग दीवाने हो जाते हैं। वे लोग इस दिन को होली कहते हैं।’ होली के बारे में बात यहीं आ कर खत्म नहीं हो जाती है, इसके संदेश इससे और भी वृहद हैं। रंगों के पावन पर्व होली को यूं ही त्योहारों के त्योहार की संज्ञा नहीं दी जाती है।

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दरअसल इन रंगों में पृथ्वी पर मौजूदा सभी बुराइयों को अपने अंदर समाहित कर लेने की असीम शक्ति है। यदि दुनिया होली के संदेशों को अपने दैनिक आचरण में उतार ले तो धरती से सारी बुराइयों मसलन आतंकवाद, भ्रष्टाचार, हिंसा और विषमता आदि का अंत हो जाएगा। हालांकि हर साल होली का त्योहार पूरा देश धूमधाम से मनाता है, परंतु ऐसी क्या वजह है कि समाज में तमाम बुराइयां कम होने की बजाय बढ़ती जा रही हैं। और अच्छाई किसी एक कोने में दुबकी त्योहारों के जरिए अपनी बारी का इंतजार करती प्रतीत हो रही है। होली के दिन जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र की दीवारों को प्राय: गिरते देखते हैं, परंतु अन्य दिनों में हमारा समाज क्यों इनकी चादर ओढ़े रहता है।

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इसकी वजह यही है कि अब समाज इस दिन को बस एक उत्सव के रूप में मना कर भूल जाता है, जबकि जरूरत इसके संदेशों को अपने जीवन में उतारने की है। यही वजह है कि बाजार इस पर हावी हो गया है। दरअसल, हमारे त्योहारों की आधारशिला ही उस जीवन दर्शन पर टिकी है, जिसका केंद्र बिंदु प्रकृति के साथ साहचर्य है। इस प्रकार देखा जाए तो ये त्योहार हमें प्रकृति के बनाए नियमों के अनुकूल व्यवहार करने को प्रेरित करते हैं।

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हमें याद रखनी चाहिए कि होली एक दूसरे से मिलने जुलने, सारे लोगों को वैर-भाव भूलकर एक दूसरे को गले लगाने का संदेश देती है। हमें इसके संदेशों को अपने जीवन में उतारना होगा तभी इसकी सार्थकता सिद्ध होगी, अन्यथा इसका महत्व नहीं है। हां, इसका महत्व सिर्फ बाजार के रूप में रहेगा? हम देख सकते हैं कि किस तरह शहरों में जहां बाजार हावी है, वहां होली का सांस्कृतिक स्वरूप गायब हो रहा है। बीते साल देश में सत्ता बदली, उसके बाद एक नई आशा का संचार हुआ है।

हालात बदलते दिख रहे हैं, लेकिन देश व समाज के सामने अब भी ढेर सारी चुनौतियां हैं। इन चुनौतियों से एकजुटता से ही लड़ा जा सकता है। संसद में कई ऐसे विधेयक लंबित हैं, जो सीधे तौर पर देशहित से जुड़े हैं। उन्हें पारित कराना जरूरी है, लेकिन विरोधी दलों में सत्ता पक्ष के प्रति अब भी कटुता दिखाई दे रही है। उनका ऐसा व्यवहार निराशाजनक है। जाहिर है ये सभी हमारी प्रकृति का संदेश, जो कि हर साल होली के जरिए आती है, नहीं है। होली को आपसी प्रेम एवं एकता का प्रतीक माना जाता है।

इसीलिए इस पवित्र पर्व के अवसर पर हमें ईर्ष्या, द्वेष, कलह आदि बुराइयों को दूर भगाना चाहिए। वास्तव में हमारे द्वारा होली का त्योहार मनाना तभी सार्थक होगा जब हम इसके वास्तविक महत्व को समझकर उसके अनुसार आचरण करें। इसलिए वर्तमान परिवेश में जरूरत है कि इस होली पर आडंबर की बजाय इसके पीछे छुपे हुए संस्कारों और जीवन मूल्यों को अहमियत दी जाए तभी व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र सभी का कल्याण होगा। वही सच्ची होली होगी।

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