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पढ़िए एक कहानी अजनबी

उसका न आना मेरे लिए शाम का ठहर जाना जैसा था।

पढ़िए एक कहानी अजनबी
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कई दिनों तक जब भी शाम के समय वह खिड़की से झांकती तो एक लड़के को स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़ा पाती। कई दिनों तक यह क्रम चलता रहा। उसे लगता कि वह उससे प्यार करता है। और फिर अचानक उसका दिखना बंद हों गया। वह बेचैन हो गई। पर एक रात अप्रत्याशित तरीके से वह लड़का फिर दिखा और फिर...
कमरे की खिड़की के शीशे टूटने की आवाज से मेरी नींद खुल गई, मम्मी-पापा भी जाग गए थे। पापा ने उठकर बत्ती जलाई।
‘क्या हुआ...?’ मम्मी ने पूछा।
‘किसी ने पत्थर मारकर खिड़की के शीशे तोड़ दिए हैं।’ पापा बोले। यह सुनते ही मेरे चेहरे पर दहशत फैल गई और मम्मी की आंखों में जिज्ञासा।
‘कौन है वह बदमाश, इतनी रात गए हमारे कमरे की खिड़कियों के शीशे तोड़ दिए...?’ मम्मी गुस्से में बोलीं। पापा चुप थे। खिड़की के पास खड़े होकर बाहर नीचे सड़क की ओर देख रहे थे।
‘होंगे कोई शरारती लड़के’ पापा ने अनुमान लगाया। तभी मम्मी बोलीं-‘तुम नीचे जाकर देख तो आओ, किसने की है यह शरारत..।’
मंैने बीच में टोकते हुए कहा-‘क्या जरूरत है इतनी रात किसी से बहस करने की। वैसे भी सभी लड़के शरारती किस्म के होते हैं, खामखां मुंह लगाने से क्या फायदा?’
पापा नहीं माने, वे सीढ़ी से उतरने लगे। मम्मी ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘तुम किसी से मुंह मत लगना, बस इतना ही पता करना कि यह शरारत किसने की और क्योंं की...?’
इतना कहकर मम्मी सोफे पर बैठ गर्इं और मैं खिड़की के एक कोने में जाकर खड़ी हो गई। फर्श पर शीशे के टुकड़े बिखरे पड़े थे।
मैं खिड़की के परदे की आड़ से नीचे सड़क की ओर देखने लगी। चौराहे की पान की दुकान खुली थी, सड़क पर आठ-दस लड़कों की भीड़ थी। भीड़ में फंसे किसी लड़के की चीखने-चिल्लाने की आवाज सुनाई दी। मुझे लगा शायद वही बदमाश होगा जो हमारे घर की खिड़की के शीशे तोड़कर भाग रहा था, फिर पकड़ लिया गया। थोड़ी देर के बाद चीखने-चिल्लाने की आवाज बंद हो गई और भीड़ छंटने लगी। वह लड़का उठ खड़ा हुआ। स्ट्रीट लाइट की रोशनी में उसका चेहरा देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गई। यह वही लड़का है, जो हर शाम स्ट्रीट लाइट के नीचे घंटो खड़े होकर हमारे घर की खिड़की की तरफ नजरें गड़ाए रखता था। उसे इस हाल में देखकर मैं हैरान रह गई। एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा कि मेरे सिर के ऊपर की छत, तेजी से घूम रही है और मेरी आंखों में अंधेरा छाने लगा। एकाएक मम्मी खीझ उठीं।
‘तू क्या देख रही है खिड़की के बाहर, क्या किसी को पहचानती है?’
‘नही तो...’ एकाएक मेरे मुंह से निकल पड़ा।
मम्मी से मैं कैसे कहती उस लड़के के बारे में उससे मेरा क्या रिश्ता है? वह लड़का तब भी चीख रहा था, चिल्ला रहा था।
महीनों के बाद आज वह लौटा है, पता नहीं वह इतने दिन तक कहां रहा। उसे आखिरी बार नए साल की शाम को देखा था। मोहल्ले के बच्चों को चॉकलेट और ग्रीटिंग्स बांटते हुए। उस दिन के बाद से वह यूं गायब हुआ, फिर आज दिखा। उसे देखकर मैं इस बात से हैरान हो रही थी कि क्या वह इस तरह की हरकत भी कर सकता है। आखिर वह इतनी रात गए हमारे घर की खिड़की के शीशे, क्यों तोड़ना चाहता है। बहुत देर तक मैं यही सोचती रही।
मैंने उसे पहली बार कब देखा था, वह दिन, महीना और साल तो याद नहीं है। लेकिन इतना जरूर याद है कि जब हम इस किराए के मकान में रहने के लिए आए थे, उसके करीब पंद्रह-बीस दिन के बाद की घटना है। एक शाम जब मैं खिड़की के पास खड़ी होकर नीचे सड़क की ओर देख रही थी कि एकाएक मेरी नजर स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़े उस अजनबी की ओर गई।
वह एकटक खिड़की की तरफ नजरें गड़ाए खड़ा था। वह दिखने में बदसूरत नहीं था, लेकिन उसके चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी, धंसी हुई आंखें, आंखों के नीचे गहरा कालापन, सूखे और मोटे काले भद्दे होंठ, बिखरे हुए बाल उसकी सुंदरता पर ग्रहण लगा रहे थे। कुल मिलाकर उसका चेहरा और कपड़े काफी गंदे थे। मेरी तरफ, एकटक देखने की उसकी मुद्रा से मैं बुरी तरह से डर गई थी। इतना ज्यादा कि मैंने जल्दी से खिड़की बंद कर दी थी। दूसरे दिन शाम को भी ऐसा ही हुआ और फिर तीसरे दिन शाम को भी। फिर यह सिलसिला रोज शाम को यूं ही चलता रहा।
शाम के वक्त वह उसी स्ट्रीट लाइट के नीचे घंटों खड़े होकर मेरे घर की खिड़की की तरफ एकटक देखता रहता था, और अंधेरा होने से पहले वह चला जाता था। मुझे वह इस मोहल्ले का नहीं लगा और न ही आस-पास के इलाके का। इतने बड़े शहर में मुझे वह एकदम अकेला सा लगा। न किसी से दुआ-सलाम और ना ही किसी से किसी प्रकार का संवाद। मैंने उसे कभी हंसते हुए नहीं देखा था। जब भी देखा उदास ही। गले में लाल मफलर, बदन पर काले रंग का स्वेटर, इन कपड़ों के अलावा उसे मैंने कभी किसी दूसरे कपड़े में भी नहीं देखा था। वह मेरी तरफ एकटक देखता रहता था।
आखिर वह इस तरह हर शाम स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़े रहकर अपना वक्त क्यों गंवाता है? क्या नाम है उसका? शहर में किस मुहल्ले में रहता है? क्या करता है? मुझे तो उसके बारे में कुछ भी नहीं मालूम, मेरे लिए तो वह एक अजनबी ही है। क्या वह मुझे चाहता है, मुझसे प्यार करता है?
एक शााम वह नहीं दिखा, मैं उसके आने के इंतजार में खिड़की के पास काफी देर तक खड़ी रही। आखिर वह नहीं आया। उसका न आना मेरे लिए शाम का ठहर जाना जैसा था। मुझे यकीन था कि वह दूसरे दिन जरूर आएगा, पर वह दूसरे दिन भी नहीं आया, तीसरे दिन भी, सप्ताह, महीनों तक वह दिखा नहीं। उसके न आने से हर शाम, मुझे अधूरी सी लगने लगी थी और वह सड़क बेजान, बेमजा सी।
आज उसे देख मेरा मन रो पड़ा। वह चीख रहा था, चिल्ला रहा था। लोग उसे घसीटते हुए सड़क पर से ले जा रहे थे। मैं यह समझ नहीं पा रही थी कि लोग उसे कहां ले जाना चाहते हैं। लोग उसे कहीं पागल तो नहीं समझ रहे हैं? पर मुझे पूरा यकीन है कि वह पागल नहीं है।
मैं उसे इस तरह तड़फते हुए नहीं देख पा रही थी। मैं अपने बिस्तर पर लौट आई। एक पल के लिए मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं उस भीड़ से पूछूं कि इसने तुम लोगों का क्या बिगाड़ा है, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकी। आंखें बंद कर तकिए के नीचे मुंह छुपा लिया। कुछ देर के बाद पापा कमरे में लौट आए।
‘कौन था वह बदमाश,’ मम्मी ने उत्सुकता से पूछा।
‘आशिक...मजनूं....हैदर नाम है उसका। इसी मकान में किराए से रहने वाली सुमेधा बैनर्जी नाम की बंगाली लड़की से प्यार करता था। उसके मां-बाप लड़की को साथ लेकर शहर छोड़कर दूसरे शहर चले गए। उस दिन से वह इसी तरह मारा-मारा फिरता है। हर शाम घंटों सड़क पर स्ट्रीट लाइट के नीचे खड़े होकर, उसके लौटने का इंतजार करता है। आज उस लड़की का जन्मदिन है, तोहफा लेकर आया है..।’ पापा बोल रहे थे। तभी मम्मी ने पूछा, ‘क्या पत्थर उसी ने फेंका था?’
‘हां उसने ही हमारे शीशे को तोड़ा है।’
‘तुमने उससे कुछ भी नहीं कहा’ मम्मी बोलीं।
‘क्या कहता, मोहल्ले के सभी लड़के उसे जानते हैं, पहचानते हैं। अच्छे घर का लड़का है, अच्छी कंपनी में नौकरी भी करता था। प्यार के चक्कर में नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा...।’ पापा हंस रहे थे, मम्मी गुस्से से फूट रही थीं-‘पागल कहीं का...।’
और मैं बिस्तर के किसी कोने में सिकुड़ रही थी। रात का अंधेरा गहराता जा रहा था।
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