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विधवाओं के दुखों को दर्शाती एक कथा ''यही सच है''

वह सब कुछ भूल कर दौड़ती हुई भैया के घर चली आई।

विधवाओं के दुखों को दर्शाती एक कथा यही सच है
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आज विधवा जिया को उसके ससुराल वालों ने घर से निकाल दिया। भाभी-भैया ने तो उसे अपने घर रखने में पहले ही असमर्थता जता दी थी। जिया अपनी नन्ही बच्ची को हृदय से लगाए विधवा आश्रम चली आई थी। यहां आने पर पहली बार उसे महसूस हुआ कि आश्रम में उससे भी कहीं ज्यादा दु:खी और सताई हुई परित्यक्तता विधवा दुनिया में हैं।
जैसे-तैसे उसने अपनी बच्ची को पढ़ाया-लिखाया उसे योग्य बनाया। बच्ची भी आज्ञाकारिणी, शिष्ट, विनम्र और होनहार निकली। आज भैया के घर से सूचना आई कि भाभी इस दुनिया में नहीं रही। वह सब कुछ भूल कर दौड़ती हुई भैया के घर चली आई। उसने देखा भैया बेहद दु:खी हैं और वे फूट-फूटकर रो रहे हैं। वह भैया को समझाने लगी, ‘भैया, अपने आप को संभालो। बच्चों की ओर देखो। भाभी का बस इतना ही साथ था।’ यह कहते हुए उसका जी चाहा-वह कह दे कि मैंने इतने बरस कैसे बिताए? यह आपने कभी जानने का प्रयास किया? पर ऐसे नाजुक समय पर यह कहना भी उचित नहीं था। वह गंभीर बैठी रही।
आज उसने सुना कि भैया दुबारा विवाह करने जा रहे हैं। वह सकते में आ गई। अभी छह महीना पहले ही तो भैया, भाभी के नाम पर बेहद आंसू बहा रहे थे। मात्र छह महीने में ही भाभी का प्यार भुला बैठे? उसे अपने भैया से नफरत होने लगी। वह उसी समय भैया के घर चली आई। भैया कह रहे थे, ‘बहन तू धन्य है। पूरी स्त्री जाति ही धन्य है। स्त्रियां भीतर से सबल होती हैं। वे बिना पुरुष के भी अपना जीवन संयम पूर्वक जी कर दिखा सकती हैं पर हम पुरुष बेहद कमजोर होते हैं। हमें जीने के लिए किसी न किसी स्त्री के साथ की जरूरत होती है।’ कहते हुए भैया जिया की ओर गर्व से देखने लगे। जिया सोचने लगी ..क्या सारे पुरुष इस सच को स्वीकार कर पाएंगे? कोई माने न माने पर यही सच है। वह बुदबुदा रही थी।
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