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पढ़िए एक लघुकथा ''प्रभात फेरी''

दादाजी बच्चों को सुबह उठकर पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।

पढ़िए एक लघुकथा
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दादाजी अपने सात साल के पोते को बता रहे थे, ‘पता है बेटा, हम लोग पहले रोज सुबह पांच बजे ही प्रभात फेरी के लिए निकल जाया करते थे।’ बच्चे ने उत्सुकतावश पूछा, ‘दादाजी ये प्रभात फेरी क्या होती है?’
दादाजी उसे अपनी गोद में उठाकर प्यार से बताने लगे, ‘सुबह के समय कई सारे लोग बाहर सैर करने एक साथ निकलते हैं, उसे प्रभात फेरी कहते हैं। इसमें हम कई सारे लोग भगवान का भजन-कीर्तन करते हुए अपने पूरे गांव में घूमा करते थे। लोगों को जगाते थे, बच्चों को सुबह उठकर पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे।’
पोते ने मासूमियत से पूछा, ‘दादाजी मैंने तो यहां कभी प्रभात फेरी नहीं देखी, क्या अब प्रभात फेरी नहीं निकलती है?’
दादाजी ने उदास होकर कहा, ‘हां बेटा, अब प्रभात फेरी नहीं सब अलग-अलग मॉर्निंग वॉक पर निकलते हैं। अब भजन-कीर्तन करने या जागरण का संदेश देने लोग नहीं जाते बल्कि अपने डॉगी के साथ वॉक करते हैं। जो ऐसा नहीं करता वो बैकवर्ड कहलाता है।’ पोते ने दादाजी का चेहरा देखते हुए पूछा, ‘दादाजी हम लोग डॉगी कब पालेंगे?’ दादाजी अवाक् रह गए।
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