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पढ़िए एक व्यंग्य ''कितने आतंक''

नेता जी के जाते ही सड़क वीरान सी हो गई।

पढ़िए एक व्यंग्य
उस दिन नेता टाइप आदमी का काफिला निकला। फितरतानुसार नेता की गाड़ी बीच में थी। जीप से कमांडो के शरीर के आधे भाग बाहर निकले थे। आस-पास चलने वाले वाहनों को हड़का रहे थे। सड़क वीरान सी हो गई। यह नेता का जलवा है। जहां से गुजरता है, वहीं सीन कब्रिस्तान सा हो जाता है। नेता हवा की भांति बह गए। लोगों को थोड़ी राहत भरी हवा लगी। यह भी आतंक का ही एक रूप है।
आप संशय मे न आएं। ऊपर आतंक लिखा है, पाकिस्तान नहीं। कितने पाकिस्तान तो कमलेश्वर का उपन्यास है। उससे आतंक का कुछ लेना-देना नहीं। यह बात अलग है कि साहित्य में थोड़ा कच्चा होने की वजह से पहली बार पढ़ने पर वह समझ में ही नहीं आया। वैसे नासमझी भी एक तरह का आतंक ही है। दूसरों के लिए तो पक्का है। कल ज्ञानीजी मिले। उनका मिलना मेरे लिए आतंक का मिलना होता है। यूं कहें कि उनके ज्ञान से मैं अज्ञानी हमेशा आतंकित रहता हूं। वे मिलते ही बोले, ‘और बताओ?’
मैंने कहा, ‘आपके समक्ष मेरा बोलना, जैसे जीभ पे हड्डी लगाना। मैं तो सिर्फ सुनना जानता हूं। प्राइवेट नौकरी में लगातार सुनने की क्षमता खुद-ब-खुद विकसित हो जाती है...।’ मगर वे नहीं माने। मजबूरन ‘और बताओ’ की जवाबदेही मेरी हो गई। मैंने सीधा, सरल, पेंचीदा और सर्वव्याप्त विषय छेड़ दिया। कहा कि आजकल आतंक बढ़ गया है। आपका क्या विचार है? वे बोले, ‘सो तो है। आज हर घर आतंक, घर-घर आतंक पसरा है।’
‘जी मैं समझा नहीं...’ मैं बोला।
‘वेरी गुड...’ वे बोले, ‘यही तुम्हारी विशेषता है। एक बार मे न समझने वाले बहुत आगे जाते हैं...।’
‘नहीं बात घुमाइए नहीं। क्या आपका तात्पर्य है कि अब घर-घर मे आतंक का वास है?’
‘बिलकुल! ऐसा ही है। यही नियम है। तुमने तो सुना होगा- भय बिन होत न प्रीत। वो तब की बात थी। आतंक की जगह भय कह दिया गया। देखो, हम आज तक भगवान के नाम पे भय खाते हैं।’
‘लेकिन मैं तो पड़ोसी देश द्वारा फैलाए जा रहे आतंक की बात कर रहा हूं...।’ ज्ञानी जी पूरी रौ में थे। बोले, ‘अजी उनकी ऐसी की तैसी। उनके आतंक से हमें डर नहीं लगता साहब। उनके प्यार से जरूर लगता है। आतंकवाद उनकी आदत है। निंदा करके आतंकवाद से निपटना हमारी आदत है।’
‘वैसे मैं उस आतंक की बात भी नहीं कर रहा। मैं तो पॉजिटिव आतंक की बात कर रहा हूं।’ मेरा मुंह देखकर वे खुश हुए। समझ गए कि इस बाबत मैं और विस्तार चाहता हूं। जोशीले अंदाज मे गले को खखारते हुए बोले, ‘बात जिस आतंक की है, वह दरअसल पॉजिटिव है। कुछ उदाहरण देता हूं। बात तुम्हारे पल्ले पड़ेगी। कल मैं मोटर साइकल से जा रहा था। रास्ते मे पुलिस का एक गुट मिला। लाठी-डंडों से परिपूर्ण। एक-एक बाइक को झपट्टा मारके रोक रहे थे। मुस्तैदी ऐसी कि जैसे किसी आतंकवादी को घेर कर पकड़ रहे हों। जिसके पास कागज पूरे थे, उन्हें मनहूस करार दिया। जाने दिया। जिसके पास नहीं थे, उसकी आवभगत मे जुट जाते। कुछ का चालान काटकर मजबूरी में व्यवस्था से न्याय किया। ज्यादातर अपने साथ न्याय करते। फैसला आॅन स्पॉट के तहत अपनी जेब गरम करते। तो मैं ऐसे ही किसी न्याय से आतंकित रहता हूं। डर के मारे मैंने अपना रास्ता बदल लिया। ये होता है आतंक। चोर तो खैर चोर है। पुलिस देखकर शरीफ आदमी भी अपना रास्ता बदल लेता है। जनता पस्त। सेवक मस्त।’
‘इसी तरह के कितने आतंक फैले हैं देश में। कहते हैं दुर्घटना से देर भली। कोई यह भी बताए कि आदमी जल्दी में है क्यों? कारण साफ है- आतंक। प्रेमी को अपनी या किसी और की प्रेमिका से मिलने में देरी हो रही है। देर न हो, इसीलिए वह रफ्तार बढ़ा देता है। आदमी दफ्तर के लिए देर से निकलता है। मगर पहुंचता समय पर है। क्यों? क्योंकि एक आतंक-फैक्टर है इसके पीछे। आदमी जानता है कि स्मार्ट युग में इस कहावत में कुछ नहीं रखा है। दुर्घटना हो, ठीक है। देर हुई तो बॉस वैसे भी दुर्घटना के कुएं मे धकेल देंगे।’
कुछ ठहरकर वह फिर बोले, ‘नेता, अफसर, बाबू, सभी लालच नाम के आतंकवादी से डरे-सहमे रहते हैं। इसीलिए अपना समग्र विकास करते हैं। ये तो कुछ भी नहीं। उस दिन नेता टाइप आदमी का काफिला निकला। आगे-पीछे दो-दो जीप। फितरतानुसार नेता की गाड़ी बीच में थी। जीप से कमांडो के शरीर के आधे भाग बाहर निकले थे। आस-पास चलने वाले वाहनों को हड़का रहे थे। सड़क वीरान सी हो गई। यह नेता का जलवा है। जहां से गुजरता है, वहीं सीन कब्रिस्तान सा हो जाता है। कर्फ्यू जैसा माहौल हो गया। नेता हवा की भांति बह गए। लोगों को थोड़ी राहत भरी हवा लगी। यह भी आतंक का ही एक रूप है। जिसके डर से आदमी जिंदा है, पर बेजान है। यदि उनके काफिले का आतंक न होता, तो क्या वे इतनी आसानी से ओझल हो पाते?’ ज्ञानीजी थकने के मूड में नहीं लग रहे थे। किंतु उनके बड़बोलेपन से मैं आतंकित हो उठा। सो मैंने कहा, ‘ठीक है। मैं सब समझ गया। कुल मिलाकर बात ये है कि हम सब आतंक के साए में थे, हैं और रहेंगे...’
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