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व्यंग्य / पोते का मतदान प्रेम

आलोक पुराणिक | UPDATED Nov 27 2018 1:28PM IST
व्यंग्य / पोते का मतदान प्रेम

दस साल हो गए दद्दू को महाजन के पास गिरवी रखे खेत छोड़ कर गए। तबसे लेकर आज तक उनके हर श्राद्ध में हमारे द्वारा उन्हें सादर आमंत्रित करने के बाद भी वे अपनी जगह किसी पंडित को नॉमिनेटिड कर तृप्त होते रहे हैं। अपने एक्स दद्दू में चाहे लाख बुराइयां रही हों, पर एक अच्छाई तो उनमें गजब की है। ऐसी अच्छाई तो उनमें भी नहीं जो दिनरात लोकतंत्र को मोटा करने के नेक इरादे से पसीना बहाते खुद ही दिन दुगने, रात चौगुने मोटे हुए जा रहे हैं। 

मेरे दद्दू ने लोकतंत्र के तो छोडिए, अपने लगाए पेड़ के फल भी भले ही कभी न खाए हों, जाने के बाद भले ही एकबार भी हमारे सपने में भी न आएं हों, पर पंचायत से लेकर प्रधानमंत्री तक को अपने नाम का वोट डालने जो हर बार गुपचुप तरीके से आते रहे हैं, हमारे खानदान के लिए यह बहुत गर्व की बात है। एक्स होने के बाद ये उनका लांकतांत्रिक विश्वास है। 

पिछली दफा मैंने अपने गांव के पोलिंग बूथ के एजेंट को कहा भी था कि जब दद्दू वोट देने आएं तो उन्हें रोक लेना प्लीज! मैं उनसे मिलना चाहता हूं। उनके द्वारा छोड़ी वसीयत का रफड़ा सा पड़ा है। पर बाद में उसने बताया कि पता ही नहीं चला कि वे वोट पाकर चले गए। इन एक्स वोटरों के साथ बस यही एक दिक्कत होती है कि जहां एक ओर जिंदों को बड़ी मुश्किल से वोट डालने के लिए लाना पड़ता है,

वहीं दूसरी ओर ये एक्स टाइप के दद्दू कब वोट डाल गए, पता ही लगने देते। इस बार मैं भी सौ रुपये पर वोट के हिसाब से अपने घर के पांच वोट उनके डिब्बे में डालने लोकतंत्र को मजबूत करने गया था तो इमोशनल होते पोलिंग बूथ में बैठे एजेंट से मैंने अपने दद्दू के बारे में पूछा, दस साल पहले एक्स हुए मेरे दद्दू वोट डाल गए क्या,

कुछ देर तक वह मुझे देखता रहा कि कौन सा पोता अपने दद्दू के वोट के बारे में पूछ रहा है। वोट डालकर जा चुके दद्दू के पोते को कुछ देर पहचानने के बाद उसने अपनी आंखों पर से चश्मा उठा वोटर लिस्ट में टिक हुए नामों पर बिन घड़ी पेंसिल गंभीर हो ऊपर से नीचे चलानी शुरू की। मेरे दद्दू का नाम उसे नहीं मिला तो वह खीझने लगा।

एकाएक तीसरे पेज के पच्चीसवें नंबर पर मेरे वाले दद्दू के नाम के आगे उसकी पेंसिल ठिठक गई, यही है न तुम्हारे एक्स दद्दू। हां!उनका नाम के आगे वोट डाल गया वाला टिक लगा देखा तो मेरे आंसू छलक आए। मतलब, अबके भी दद्दू वोट डाल चुपचाप निकल गए! तो वह मुस्कुराता चैन की सांस लेता बोला, हां यार! डाल गए तुम्हारे एक्स दद्दू भी वोट।

तुम्हारे एक्स दद्दू ही क्या, उसकी एक्स दादी भी वोट डाल चली गईं। दोस्तो! जिंदा जी मेरे दद्दू भले ही वोट पाने गए हों या नए पर एक्स होने के बाद वे हर किस्म के चुनाव में आकर जिस तरह मुफ्त में अपना वोट पाने आना नहीं भूलते। दद्दू! तुम यों ही हर चुनाव में अपना कीमती वोट डालने आ बिना मिले जाते रहो, मेरी बस यही कामना! 


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-Tags:#Assembly Elections 2018#Assembly Election 2018

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