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व्यंग्य : लोकसभा चुनाव के लिए ''गठजोड़ और भागदौड़''

शीत ऋतु आकर जा रही है। कायदे से इसके बाद वसंत को आना है, लेकिन इस बार चुनावी रुत की वजह से अपूर्व गठबंधन पर्व का आना तय है। हर ओर, समय रहते गांठ बांध लेने की जुगत चल रही है। नीले फूल वाले गुलदस्ते फर्जी लाल फूलों के बगलगीर हो मुस्करा रहे हैं। थोड़ी बहुत बरसात हो जाए तो देखते ही देखते सारा माहौल ही हरा-भरा हो जाए्गा।

व्यंग्य : लोकसभा चुनाव के लिए

शीत ऋतु आकर जा रही है। कायदे से इसके बाद वसंत को आना है, लेकिन इस बार चुनावी रुत की वजह से अपूर्व गठबंधन पर्व का आना तय है। हर ओर, समय रहते गांठ बांध लेने की जुगत चल रही है। नीले फूल वाले गुलदस्ते फर्जी लाल फूलों के बगलगीर हो मुस्करा रहे हैं। थोड़ी बहुत बरसात हो जाए तो देखते ही देखते सारा माहौल ही हरा-भरा हो जाए्गा।

सावनी दृष्टिबंध तो कालिमा के घटाटोप में भी हरा–हरा चर लेता है। हर रंग पर किसी राजनीतिक गिरोह का एकमेव अधिकार है, लेकिन एक प्रकाशवादी प्रिज्म है, जो प्रयोगशाला के सीलन भरे धुंधलके में रोशन लकीर के लिए बेतरह बेचैन है। जातिवादी लोग किसी न किसी गांठ में अंततः उसी तरह उलझ जाते हैं जैसे कंटीली झाड़ी बंधी लग्गी में दांवपेंच में कटी हुई बहुरंगी आवारा पतंगें।

उलझना उनका प्रारब्ध है और लग्गी का सम्यक इस्तेमाल कुछ लोगों के लिए राजनीतिक कार्यकुशलता का पर्यायवाची। इस गंठीले समय में राजनीतिक मतवाद का कोई टंटा विमर्श में सिरे से मौजूद ही नहीं है। सिर्फ शिखर पर पसर जाने की जबरदस्त जल्दबाज़ी है। यह वन प्लस वन माने ग्यारह वाली म्यूजिकल चेयर वाला भागमभाग का गेम है।

लोकतंत्र को हाशिये पर धकिया कर जनादेश का इच्छित फलित पा लेने की काबिलियत की अग्नि परीक्षा है। नीबू को चम्मच पर टिका कर और उसे मुंह में दबाकर निकलने का अपूर्व कौशल है। सबको पता है कि गांठ यदि मजबूत रहेगी तो उम्मीद की लौ बिना तेल बिना बाती भी फड़फड़ाती रहेगी। तब वोटिंग मशीन में मनोनुकूल आंकड़े खुद-ब-खुद प्रकट होंगे।

तब वह हैकिंग–वैकिंग कोई यक्ष प्रश्न न रहेगा। सत्ता का जादुई आंकड़ा उनकी कांख में स्वत: आ दबेगा। तब सत्ता के बीजगणित के जटिल सवाल बिना कुंजी पलटे फटाफट हल हो जाएंगे। फिलहाल गांठ लगाने के इल्म के माहिर अपने–अपने तरीके से जोड़-तोड़ करने में लगे हैं। यह तो वक्त ही बता पाएगा कि किसकी गांठ में से अन्तोत्गत्वा कौन सी ग्रंथि उजागर होती है।

गांठें लग तो सरलता से जाती हैं, लेकिन वे खुलती बड़ी मुश्किल से हैं। कभी–कभी यह खुलने के बजाय उलझकर रह जाती है। ऐसा भी होता है कि सुलझाने के चक्कर में इसका मौलिक सिरा गुम हो जाता है और तमाम नये सिरे उभर आते हैं। कुल मिला कर अनसुलझी गुत्थी बन जाते हैं। अक्सर देखा गया है कि उलझी–सुलझी गाठें ही आगे चलकर धरपकड़ का रूपक रचर इतिहास की तत्सम शब्दावली बन जाते हैं।

किसी बदनाम किस्से की तरह जनप्रिय किंतु अश्लील लोकोक्ति का रूप धर लेते हैं। ऐसी गांठे अपने वक्त का असल एजेंडा निर्धारित करती हैं। जानने वाले अब भली-भांति जान गए हैं कि हमारे अहद में गाँठ नाना प्रकार की होती हैं।

फांसी वाली गांठ, बिल्ली के भाग्याधीन छीके वाली गांठ, गांठ जैसा लगने वाला क्षद्म जोड़-जुड़ाव, दिखावटी नॉट , नॉटी (शरारती) गांठ, बेढंगी गांठ, चापलूसी वाली गांठ, अन्तरंग गाठ, सेमी–पॉलीटिकल फंदा, कम्युनल फंडा, सेक्युलर अखाड़ा, खुदगर्ज मेल-मिलाप, हर-हर हिट, हाहाकारी फिट, माउस मार्का वोटर ट्रेप आदि इत्यादि। गांठें ही गांठें।

तिलस्मी गांठ, चमत्कारी गांठ, बार-बार खुल-खुल जाने वाले जूड़े जैसी सम्मोहक गांठ,जर्जर रिश्तों में लगाई गयी किसी थिंकर या रफूगर की करिश्माई गांठ। गज्जक जैसी मीठी कुरकुरी गांठ, इतिहास प्रसिद्ध रस्मिया गांठ। यह अलग बात यह है कि इतनी अधिक गांठे यहां-वहां लग गई हैं कि जनता सोच रही है कि कौन सी गांठ बहुपयोगी साबित होगी।

गठ का कोई सीधा सरोकार लट्ठ से हो या न हो पर जिसकी लाठी उसकी भैंस वाले मुहावरे से कोई न कोई सनातन जुड़ाव जरूर है। होगा ही। चुनाव बाद यदि स्थिति वही हुई, जिसकी आस गठवादी बड़ी शिद्दत से लगाये हैं तो लट्ठ का गट्ठ सौदेबाज़ी की मेज पर जरूर धरा जायेगा। तब मोलतोल के चातुर्यपूर्ण प्राणी सत्ता की भैंस अपने बाड़े में हांक ले जायेंगे।

तब होगा यह कि जिसकी होगी जेब भारी, उसकी भैंस के दूध में सर्वाधिक भागीदारी। गठजोड़ की खबरें आ रही हैं तो राजनीतिक अस्तबल में बंधे अरसे से लगभग बेरोजगार चले आ रहे डरबी घोड़े रह-रह कर हिनहिना रहे हैं।

उन्हें लग रहा है कि उनके लिए कमोबेश मुरादों भरे दिन बस आने ही वाले हैं। उनका यह आशावाद बेवजह नहीं है। लोकतंत्र के पाए जब थरथराते हैं, तब घोड़ों की बन आती है। वे अपनी मुंह मांगी कीमत पा जाते हैं। इतिहास गवाह है कि हार्सट्रेडिंग वाले ही मनोवांछित माल पाते हैं।

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