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सतीश सिंह का लेख : बैंकों में हाशिये पर हिंदी

बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों, स्थानीय प्रधान कार्यालयों और बैंक के कोर्पोरेट केंद्र या हेड ऑफिस में हर तिमाही, हिंदी में किए जा रहे काम-काजों की समीक्षा की जाती है। आंकड़ों में सभी विभाग हिंदी में काम करने के लक्ष्य को हासिल कर लेते हैं, लेकिन हकीकत में कोई भी विभाग हिंदी में कार्य नहीं करता है।

सतीश सिंह का लेख : बैंकों में हाशिये पर हिंदी
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सतीश सिंह

बैंकों में औपचारिक समारोह का प्रतीक बनकर रह गया है हिंदी दिवस। चौदह सितंबर को या फिर पूरे सितंबर महीने में बैंकों में विविध प्रतियोगिताएं आयोजित करवाई जाती हैं। पुरस्कार और नाश्ते के लालच में बैंककर्मी प्रतियोगिताओं में शामिल होते हैं। हालांकि हिंदी में काम करने के प्रति न तो उनकी कोई दिलचस्पी होती है और न ही कोई लगाव। अमूमन फिल्मी कलाकारों को मुख्य अथिति के रूप में समारोह में बुलाया जाता है, ताकि बैंक के अधिक से अधिक कर्मचारी और अधिकारी हिंदी से जुड़ी प्रतियोगिताओं एवं कार्यकर्मों में हिस्सा लेकर हिंदी दिवस को सफल बना सकें।

बैंकों के प्रशासनिक कार्यालयों, स्थानीय प्रधान कार्यालयों और बैंक के कोर्पोरेट केंद्र या हेड ऑफिस में हर तिमाही, हिंदी में किए जा रहे काम-काजों की समीक्षा की जाती है। आंकड़ों में सभी विभाग हिंदी में काम करने के लक्ष्य को हासिल कर लेते हैं, लेकिन हकीकत में कोई भी विभाग हिंदी में कार्य नहीं करता है। कुछ विभाग हिंदी में जरुर पत्राचार करते हैं, लेकिन कोई भी हिंदी में टिप्पणी या नोट नहीं लिखता है।

गृह मंत्रालय को दिखाने के लिए या हिंदी की प्रगति की समीक्षा करने वाली संसदीय समिति के निर्धारित मानकों पर खरा उतरने के लिए सभी कर्मचारियों एवं अधिकारियों के कंप्यूटर डेस्कटॉप पर मंगल फॉण्ट या यूनिकोड को इंस्टाल किया जाता है, लेकिन हकीकत में कोई भी कर्मचारी व अधिकारी कंप्यूटर पर हिंदी में काम नहीं करते हैं। बैंकों में हिंदी कर्मचारियों और निचले स्तर के अधिकारियों की भाषा मानी जाती है। हिंदी में लिखने-पढ़ने वालों को हीनता की नजरों से देखा जाता है। उन्हें बेवकूफ माना जाता है। बैंकों में ज्ञान का पैमाना भाषा है। जो अंग्रेजी में बोल या लिख सकता है उसे ही ज्ञानवान माना जाता है। हालांकि, बैंक की उत्तर भारत की सभी शाखाओं में बैंककर्मियों को हिंदी में बात करनी पड़ती है, क्योंकि अधिकांश ग्राहक हिंदी या बोलियों में बातें करते हैं। दक्षिण भारत के अनेक हिस्सों में ग्राहक हिंदी में बात करते हैं। बावजूद इसके, बैंक शाखा में पदस्थ कर्मचारी व अधिकारी आंतरिक पत्राचार अंग्रेजी में करते हैं। निजी और विदेशी बैंकों में तो कोई भी हिंदी में बात नहीं करता है।

सच कहा जाए तो बैंकों में हिंदी की वर्तमान दुर्दशा के लिए बहुत हद तक बैंकों के शीर्ष कार्यपालक जिम्मेदार हैं, क्योंकि वे खुद तो हिंदी में कार्य नहीं करते हैं। कई बार हिंदी में काम करने वालों को दंडित भी किया जाता है। हिंदी में काम करने वाले कर्मचारियों व अधिकारीयों का बैंकों में मजाक उड़ाना आम बात है। आजकल बैंकों में सभी लोग बैंकिंग से जुड़े सारे कार्य अंग्रेजी में कर रहे हैं। भले ही, उन्हें अंग्रेजी भाषा का ज्ञान न हो। विवशतावश ही बैंक के अधिकारी हिंदी में लिखने-पढ़ने या बोलने के लिए तत्पर होते हैं। वे हिंदी की रोटी खाकर अंग्रेजी के मोहपाश में जकड़े रहते हैं। उनका अंग्रेजी प्रेम इतना अटूट होता है कि उनके बच्चों की शिक्षा-दीक्षा कान्वेंट स्कूलों में होती है। उनके बच्चे हिंदी की गिनती तक नहीं जानते हैं। बैंकों में हिंदी अनुवाद की भाषा बन गई है। बैंक के विविध विभाग काम अंग्रेजी में करते हैं, लेकिन राजभाषा के नियमों का अनुपालन करने के लिए उसका अनुवाद राजभाषा विभाग से हिंदी में करवाते हैं। देखा जाए तो बैंकों का राजभाषा विभाग केवल अनुवाद करने का ही काम करता है। हालांकि अनुवाद करने में कई बार अर्थ का अनर्थ भी हो जाता है। साथ ही अनुवाद बहुत ही कठिन होता है। जमा पर्ची, निकासी पर्ची, ऋण के दस्तावेज आदि के हिंदी में अनुवाद किए गए हैं, लेकिन आम आदमी को तो छोड़ दीजिये, पढ़े-लिखे लोगों को भी अनुवाद वाली हिंदी समझ में नहीं आती है। कहा जा सकता है कि राजभाषा विभाग में पदस्थ कर्मचारी व अधिकारी और बैंक के शीर्ष कार्यपालक बैंकों में बदहाल हिंदी की दशा और दिशा को लेकर अपनी खूब छाती कूटते व पीटते हैं, लेकिन 14 सितंबर के बाद या फिर सितंबर महीने के बाद हिंदी को आगे बढ़ाने की बातें बिसरा देते हैं।

हालांकि हिंदी दिवस रूपी वार्षिक अनुष्ठान के कर्मकांड को करने में बैंक के शीर्ष कार्यपालक किसी भी कीमत पर पीछे नहीं रहना चाहते हैं, लेकिन इस तरह की खानापूर्ति से क्या होगा? क्या इससे बैंकों में हिंदी का प्रचार-प्रसार होगा या हिंदी को दिल से आत्मसात्ा करने की जिजीविषा बैंक कर्मियों के मन-मस्तिष्क में पनपेगी? मामले में यह कहना उचित होगा कि बैंकों में की जा रही दिशाहीन कवायदों से हिंदी आगे बढ़ने की बजाये, पिछड़ जाएगी। आज बैंकों में हिंदी कुलीनतावाद की शिकार हो गई है, जिसका कारण हमारी उपनिवेशवादी मानसिकता है। बैंकों में अंग्रेजी सभी के मन-मस्तिष्क पर हावी हो गई है। वैसे, इसका एक कारण देश के नीति-निर्धारकों द्वारा हिंदी को आधे-अधूरे मन से बढ़ावा देने की नीति भी है। हिंदी को आज भी रोजगार सृजन से नहीं जोड़ा गया है। इसलिए अंग्रेजी के विकास को बल मिल रहा है। साथ ही, बैंकों में अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को प्रतिष्ठा का पर्याय माना जाता है, जबकि अंग्रेजी का इस्तेमाल दैनिक जीवन और कामकाज में भोजन में स्वादानुसार डाले गए नमक की तरह होना चाहिए, लेकिन आज बैंकों में ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसी वजह से बैंकों में हिंदी आज भी वहीं है, जहां कल थी।

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