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कैसे होगा हिंदी दिवस सार्थक, क्यों शांत हैं हिंदी के कमेंटेटर

आज यानी 14 सितंबर 2018 को भारत समेत विदेशों में भी हिंदी दिवस को मनाया जा रहा है। जसदेव सिंह की आवाज को देश आधी सदी से भी अधिक समय से रेडियो-टीवी सुन रहा था। उनकी क्रिकेट, हॉकी, गणतंत्र दिवस समारोह वगैरह की कमेंट्री सुन-सुनकर कई पीढ़ियां बढ़ी हो गईं।

कैसे होगा हिंदी दिवस सार्थक, क्यों शांत हैं हिंदी के कमेंटेटर
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आज यानी 14 सितंबर 2018 को भारत समेत विदेशों में भी हिंदी दिवस को मनाया जा रहा है। जसदेव सिंह की आवाज को देश आधी सदी से भी अधिक समय से रेडियो-टीवी सुन रहा था। उनकी क्रिकेट, हॉकी, गणतंत्र दिवस समारोह वगैरह की कमेंट्री सुन-सुनकर कई पीढ़ियां बढ़ी हो गईं। उनकी आवाज का जादू सिर का चढ़कर बोलता रहा।

वो हिन्दी कमेंट्री के शिखर पर बने रहे। पर अब वो खामोश हैं। आप उनसे पांच सवाल करते हैं, वे एकाध का सिर हिलाकर उत्तर दे देते हैं। किस्सों के खजाना लेकर घूमने वाले जसदेव सिंह की चुप्पी से उनके प्रशंसक कष्ट में हैं। ये स्थिति लगभग सात-आठ माह से हुई है उनकी। हसौड़ रहे जसदेव सिंह को ये क्या हो गया है? उनकी पत्नी कृष्णा जी बताती हैं कि उनकी याददाश्त क्षीण हो चुकी है।

कुछ पुरानी बातें याद रहती हैं, नई भूल जाते हैं। पर उन्हें यकीन है कि जसदेव सिंह फिर से खड़े होंगे। उनमें गजब की जिजिविषा है। मारवाड़ी परिवार से संबंध रखने वाली कृष्णा और जसदेव सिंह ने वर्ष 1957 में विवाह किया था। तब जयपुर में बहुत चर्चित हुआ था सिख और मारवाड़ी का मंगलमिलन। गांधी जी की शव यात्रा की अंग्रेजी में मेलविल डिमेलो ने कमेंट्री सुनाई थी।

उस भावपूर्ण कमेंटरी को सुनकर जसदेव सिंह की भी आंखें नम हुईं थीं। उस दिन जसदेव सिंह ने भी कमेंटेटेर बनने का निश्चय किया था। वे तब जयपुर के एक कॉलेज के छात्र थे। ये सारी बातें बताई जा रही हैं। जसदेव सिंह भी सामने बैठे हैं। पर वे इन सब बातों को अपने साउथ दिल्ली के मंदाकिनी के आवास में निर्विकार या कहें कि शून्यचित भाव से सुन रहे हैं।

वे उसी रफ्तार से हॉकी मैच की कमेंट्री सुनाते थे, जिस रफ्तार से गेंद मैदान में यहां से वहां होती थी। निश्चित रूप से किसी भी सफल कमेंटेटर से अपेक्षा रहती है कि वो नामों और शब्दों का सही उच्चारण करेगा। रेडियो कमेंट्री करते वक्त श्रोता के सामने एक तस्वीर खींचने की चुनौती होती है। वे इन सभी मोर्चों पर अपना लोहा मनवाते रहे।

जसदेव सिंह जब स्वस्थ थे, तब वे अपने जीवन के गुजरे पन्नों को दोस्तों के सामने अवश्य सांझा करते थे। बताते थे कि उन्होंने सन 1955 में रेडियो जयपुर में नौकरी शुरू की। रोचक तथ्य यह है कि वर्ष 1950 में आल इंडिया रेडियो के आडिशन में असफल रहने वाले सिंह ने 1955 में रेडियो जयपुर में 200 रुपए वेतन पर 'आवाज का सफर' शुरू किया।

1961 में पहली दफा लाल किले से स्वतंत्रता दिवस की कमेंट्री की और 1963 में राजपथ से गणतंत्र दिवस की कमेंट्री की। नौ आलंपिक खेलों, छह एशियाड और आठ हॉकी विश्वकप की कमेंट्री करने वाले सिंह ने कहा कि आखिर अंग्रेजी की बैसाखियों के सहारे कब तक चलेंगे, लेकिन कमेंट्री करते समय तकनीकी शब्दों का हिन्दी में अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए।

शब्दों के प्रयोग का भी काफी महत्व है, क्योंकि कमेंट्री को आम आदमी से लेकर विशेषज्ञ भी सुनता है। वे कमेंट्री में उर्दू के शेर और हिन्दी, अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं की कहावतों का प्रयोग करने में माहिर थे। जरा दुर्भाग्य देखिए कि जसदेव सिंह को पता भी नहीं है कि उनके गुरु समान रहे अटबिहारी वाजपेयी अब इस संसार में नहीं रहे हैं। दोनों को हिन्दी जोड़ती थी।

दूरदूर्शन के उप महानिदेशक पद से 1989 में रिटायर होने के बाद भी वे लंबे समय तक रेडियो और टीवी पर सक्रिय रहे। जसदेव सिंह शानदार मेजबान रहे हैं। उनके घर के ड्राइंग रूम में आपकी नजर एक फोटो पर तुरंत जाती है। पहली फोटो तो उस लम्हे की है, जब वे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिल रहे हैं। फोटो 1975 की है। बैकग्राउंड में विश्व कप विजेता भारतीय हाकी टीम भी खड़ी है।

आपको पंजाब के पूर्व डीजीपी अश्वनी कुमार भी दिखाई देते हैं। उस विश्व कप की कमेट्री जसदेव सिंह ने ही की थी। हॉकी कमेंट्री में उनका कोई सानी नहीं रहा है। वे उस गति से कमेट्री करते हैं, जिस रफ्तार से गेंद मैदान में इधर-उधर घूम रही होती है।

जसदेव सिंह बताते थे कि मेरे घर में एक दौर में अमीन स्यानी, आकाशवाणी के चोटी के समाचार वाचक देवकीनंदन पांडे, तमाम खिलाड़ियों, पत्रकारों, लेखकों की महफिलें चलती थीं। पर फिलहाल सब कुछ शांत है।

सब उनके फिर पहले की तरह बोलने का इंतजार कर रहे हैं। जब घर में उनकी आवाज और उनके शब्दों की बात होती है तो वो चुपचाप सब सुनते रहते हैं। उम्मीद है कि जल्द बोलेंगे।

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