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हिंदी दिवस 14 सितंबर विशेष: चुनौतियों के बीच बढ़ते कदम

विज्ञान भूषण | UPDATED Sep 14 2018 2:47PM IST
हिंदी दिवस 14 सितंबर विशेष: चुनौतियों के बीच बढ़ते कदम

हर वर्ष हिंदी दिवस आते ही उसको लेकर चिंताएं प्रकट होने लगती हैं। उसके प्रसार और सम्मान के लिए तमाम संकल्प किए जाते हैं। लेकिन सवाल है कि हिंदी के समक्ष वास्तव में कौन-सी समस्याएं और चुनौतियां हैं, जो इसे अपेक्षित सम्मान और प्रसार की दिशा में बाधक हैं? इसके लिए सरकारी और व्यक्तिगत स्तर पर क्या प्रयास हो रहे हैं? इस दिशा में और प्रभावी परिणाम हासिल करने के लिए क्या किए जाने की आवश्यकता है? बीते अगस्त में मॉरीशस में संपन्न हुए ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में भी इन सवालों पर चर्चा हुई। यहां प्रस्तुत है सम्मेलन में सम्मिलित हुए तीन हिंदी साहित्यकारों के विचार...

युवाओं पर है हिंदी की समृद्धि का दायित्व

चित्रा मुद्गल

भाषा का ताल्लुक केवल अभिव्यक्ति से नहीं होता है। यह हमारी सोच, विचारधारा, बुद्धिमत्ता, चेतना और मनोभावों को भी प्रकट करती है। भाषा अपने समाज को अभिव्यक्त करती है और उसे प्रभावित भी करती है। भाषा का मूल तत्व सांस्कृतिक संवेदना होती है। इस लिहाज से हिंदी पूरे भारतवर्ष को जोड़ने वाली भाषा है। यह केवल काम-काज की राजभाषा मात्र नहीं है। हमें इस बात को समझना होगा। कुछ समय पूर्व मॉरीशस में संपन्न हुए 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल होते हुए मैंने यह महसूस किया कि युवा पीढ़ी को हिंदी से जोड़ने के लिए उसके डिजिटलीकरण के भरपूर प्रयास किए जा रहे हैं। तमाम सॉफ्टवेयर तैयार किए जा रहे हैं।

यह देखकर और जानकर अच्छा लगा कि अब हिंदी भी कागज, कलम और किताब से निकलकर स्क्रीन पर आ गई है। निश्चित ही ये प्रयास सराहनीय हैं। लेकिन अब युवाओं पर बड़ी जिम्मेदारी है कि तकनीक के इस्तेमाल से हिंदी भाषा को समृद्ध करें और इसके विकास में अपना योगदान दें। लेकिन इसके पूर्ण मशीनीकरण के साथ ही इसकी गरिमा और सांस्कृतिक संवेदना का भी ध्यान रखना होगा, क्योंकि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, इस राष्ट्र की संस्कृति और पहचान की वाहक भी है। वहां यह जानकर भी अच्छा लगा कि संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को मान्यता दिलाने के लिए सरकार प्रयास कर रही है। यह एक स्वागत योग्य कदम है। 

हिंदी सम्मेलन में शामिल होते हुए मैंने यह भी महसूस किया कि वहां कई ऐसे लोग भी पहुंच गए थे, जिन्हें इस सम्मेलन की गंभीरता से कोई लेना-देना नहीं था। इसके बजाय विदशों से आए कई हिंदी विद्वान मुझे ज्यादा गंभीर और सम्मेलन से जुड़े हुए लगे। एक रूसी हिंदी विद्वान ने अपनी चिंता प्रकट करते हुए सवाल किया कि हिंदी में अंग्रेजी भाषा के शब्दों का इतना इस्तेमाल क्यों किया जाता है? किसी भाषा को समृद्ध करने के लिए उसी भाषा के शब्दों के नए प्रयोग किए जाने चाहिए, न कि दूसरी भाषाओं के शब्द उधार लेने चाहिए।

मुझे सुखद अचरज हुआ कि एक विदेशी हिंदी प्रेमी को इस भाषा को लेकर इतनी चिंता है। हम सभी हिंदी लेखकों, विद्वानों और पत्रकारों को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। अगर हमारे मन में हिंदी को लेकर इतनी चिंता और चेतना नहीं है तो हम इसे समृद्ध करने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं कर सकते।  इसमें संदेह नहीं कि हमारा देश बहुत बड़ा है, यहां अनेक भाषाएं बोली जाती हैं। हर प्रदेश की अपनी मातृ भाषा है। इसीलिए हिंदी को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकृति मिलने की राह में चुनौती है।

जब किसी भाषा का प्रश्न मतपत्रों में बदल जाता है तो हम उसका सम्मान नहीं कर पाते हैं। ऐसे में भले ही हिंदी को संयुक्त राष्ट्र में स्वीकृति मिल जाए लेकिन इसे अपने देश में सम्मान तभी मिलेगा, जब यहां की राजनीतिक सोच और नागरिकों की मानसिकता बदलेगी। हम दूसरों को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। हिंदी के विस्तार और सम्मान के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की उदासीनता सर्वाधिक जिम्मेदार है। आजादी के 71 वर्ष बाद भी अगर हम हिंदी को राष्ट्र भाषा नहीं बना पाए तो इसमें कमी हमारी ही है। महात्मा गांधी ने आजादी से पहले ही कह दिया था कि केवल हिंदी ही हिंदुस्तान की राष्ट्र भाषा हो सकती है। लेकिन हमने उस दिशा में आवश्यक और गंभीर प्रयास नहीं किए। ऐसे सम्मेलनों का उद्देश्य भी तभी पूरा होगा।    

दयनीय नहीं है हिंदी की स्थिति

प्रेम जनमेजय 

बीते अगस्त में विश्व हिंदी सम्मेलन की धूम थी। जैसे भारतीय प्रजातंत्र में चुनाव की धूम होती है वैसी ही धूम हिंदी के प्रजातंत्र में विश्व हिंदी सम्मेलन की होती है। मैं भी इस सम्मेलन का हिस्सा बना पर व्यंग्यकार के रूप में नहीं अपितु प्रवासी संसार के जिज्ञासु के रूप में। मॉरीशस में आयोजित 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन का विषय था, ‘हिंदी विश्व और भारतीय संस्कृति।’ कुल आठ सत्रों में-लोक-संस्कृति, भाषा, फिल्म, प्रौद्योगिकी, संचार, बाल साहित्य, प्रवासी साहित्य आदि से जुड़े मुद्दों पर चर्चाएं की गईं। 10वें एवं 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में महत्वपूर्ण ये रहा कि चर्चाएं विस्तृत हुईं। पिछले कुछ सम्मेलनों में तो अधिकांश सत्रों में केवल रस्म अदायगी के रूप में एक डेढ़ मिनट के लिए मंच को सुशोभित करने तथा विश्व हिंदी सम्मेलन में सहभागिता का इतिहास रचने के सुअवसर प्रदान किए गए थे।

11वें सम्मेलन में इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि पिछले सम्मेलन में विद्वानों द्वारा की गई अनुशंसाओं को रद्दी की टोकरी में न डाला जाए। अपितु अनुशंसा पालन समिति इसकी कार्रवाई की रपट प्रस्तुत करे और ऐसा इस बार हुआ भी। अन्यथा अतीत में जहां विश्व हिंदी सम्मेलन सातवें के बाद आठवें से केवल अंक के कारण जुड़ते थे, वहीं इस बार वे कार्रवाई के मकसद से जुड़े। भविष्य में आगामी विश्व हिंदी सम्मेलन कोई भी करे, यदि इस कदम को उसका हिस्सा बनाया जाए तो चर्चाओं और अनुशंसाओं का महत्व होगा एवं वे रद्दी की टोकरी में जाने से बचेंगी।

मुझे ‘प्रवासी संसारः भाषा ओर साहित्य’ सत्र में बीज वक्तव्य देना था। मेरी मुख्य चिंता थी कि प्रवासी संसार के इस सत्र में मॉरीशस के अधिकांश प्रवासी साहित्यकार नहीं हैं। क्या उनकी इस विषय पर कोई चिंता नहीं है। क्या हमने अपनी सांस्कृतिक, भाषाई और साहित्यिक धरोहर को बचाने के लिए युवा पीढ़ी को तैयार किया है? नहीं किया है। मॉरीशस के घरों में, हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या यदि 1972 में ढाई लाख से अधिक थी तो आज सात हजार भी नहीं हैं। ये गिरमिटिया देशों की समस्या नहीं है अपितु लंदन, अमेरिका, दुबई आदि देशों में बसे प्रवासियों की भी यही समस्या है। इसके लिए हमें पुलों का निर्माण करना होगा। 

सवाल यह भी है कि भारत में क्या हिंदी की स्थिति बेहतर हो रही है? भाषा का नवउपनिवेशीकरण हो रहा है। एक सोचे-सोचाए षड़यंत्र के तहत अखबारों और चैनलों की हिंदी भाषा को भ्रष्ट किया जा रहा है। हिंदी के लिए विपन्न, अक्षम, पुरातनपंथी एवं निर्बल देवनागरी लिपि को छोड़कर सरल, सहज, सस्ती, टिकाऊ, सुंदर एवं संपन्न रोमन लिपि अपनाने की नेक सलाह दी जा रही है। हिंदी की बढ़ती ताकत को देखते हुए उसे अशक्त करने की चालें चली जा रही हैं। विज्ञापनों की भाषा, समाचारों की भाषा, धारावाहिकों की भाषा और हिंदी फिल्मों से अपनी रोजी-रोटी, चलाने वाले बेचारे हीरो-हीरोइन की कब्जीयुक्त हिंदी-भाषा ने आपके कानों में अनेक प्रकार के रस घोले ही होंगे।

सच तो यह है कि भाषा हमारे सामाजिक स्तर का भी पर्याय बन गई है। अति संपन्न कॉलोनियों की भाषा, यहां तक उनके सेवकों की भी भाषा अंग्रेजी है और निम्न आय वर्गीय कॉलोनियों की भाषा हिंदी है। बेचारा मध्यवर्ग, वह तो इधर-उधर डोलता रहता है। कभी आपने संभ्रांत, पाश्चात्य परिधान में लिपटे व्यक्ति से हिंदी में बतियाने का साहस कभी किया है? आपका बच्चा अंग्रेजी स्कूल में पढ़ता है और उसका विज्ञान विषय कमजोर है तो आपको उसे हिंदी वाले स्कूल में भरती कराने का सुझाव दिया जाता है। कमजोर विज्ञान है और आपको सुझाव भाषा सुधारने का दिया जाता है। हिंदी दरिद्र नहीं है और न ही हिंदी की स्थिति दयनीय है। इसे दयनीय वे सिद्ध कर रहे हैं, जिनके इसे दयनीय रखने में अपने स्वार्थ सधते हैं। और वे ही अपना उत्पाद बनाने के लिए इसे ‘समृद्ध’ भी करते रहते हैं।

मानसिकता बदलने से मिलेगा हिंदी को सम्मान

राजेंद्र उपाध्याय

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आज के युवा वर्ग में और विशेषकर महानगरीय युवा पीढ़ी में हिंदी के प्रति लगाव और सम्मान कम हो रहा है। दरअसल, युवा पीढ़ी करियर को लेकर काफी सजग है। उन्हें अंग्रेजी माध्यम में ज्यादा अवसर दिखते हैं साथ ही उन्हें हिंदी के बजाय अंग्रेजी लेखकों की किताबें पढ़ना पसंद होता है। उच्च वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग के लोग तो सीधे मानते हैं कि अगर कोई लेखक विद्वान है तो वह अंग्रेजी में क्यों नहीं लिखता है। यानी एक वर्ग के लोग यह मानते हैं कि विद्वता का सीधा संबंध अंग्रेजी से ही होता है। मानो हिंदी लेखक चाहे कितना बड़ा विद्वान हो लेकिन एक खास वर्ग की नजर में उसका कोई मोल नहीं है।

यह बेहद खेद का विषय है कि अभी भी हिंदुस्तान में हिंदी को लेकर ऐसी मानसिकता बनी हुई है। जब तक यह मानसिकता हर वर्ग के लोगों में नहीं बदलेगी, हिंदी को अपेक्षित सम्मान नहीं मिलेगा। इस भाषा के प्रति युवा पीढ़ी में सम्मान तभी जगेगा, जब शिक्षा प्रणाली से लेकर नौकरी तक में इसकी आवश्यकता और महत्ता को स्थान मिलेगा। हर तरह की सरकारी नौकरी में हिंदी का एक अनिवार्य प्रश्नपत्र होना चाहिए। हिंदी के जरिए रोजगार के अवसर सृजित होने चाहिए। आजादी के पहले और उसके कुछ वर्ष बाद तक हिंदी लेखकों को काफी सम्मान मिला करता था। बहुत सी पत्रिकाएं हुआ करती थीं, जो लेखकों को उचित पारिश्रमिक दिया करती थीं।

यही वजह थी कि उस दौर में बहुत से लेखक पूर्णकालिक लेखन करके भी अपनी जीविकोपार्जन कर लेते थे। आज का हाल किसी से छिपा नहीं है। अधिकांश साहित्यिक पत्रिकाएं पारिश्रमिक देती ही नहीं जो देती भी हैं तो नाम मात्र का। आज कोई हिंदी लेखक चाहे कि वह केवल लेखन के जरिए अपनी जीविका चला लेगा तो यह संभव नहीं है। ऐसे में हिंदी और हिंदी लेखकों के प्रति लगाव और सम्मान कैसे बढ़ेगा? हालांकि सारा परिदृश्य अंधकारमय नहीं है। हिंदी की व्यापकता भी कुछ मायनों में बढ़ रही है।

हिंदी में बेशुमार अखबार निकल रहे हैं। उत्तर भारत में इनका प्रसार बढ़ भी रहा है। फिल्में, सीरियल्स और विज्ञापन  भी हिंदी में खूब बन रहे हैं, काफी बड़ा वर्ग इन्हें पसंद करता है। मैं समझता हूं कि देवनागरी लिपि के प्रसार के लिए हिंदी को संकीर्णता से थोड़ा उबरना होगा। दूसरी भाषाओं के प्रति सहिष्णु होने की भी जरूरत है। इस क्रम में बीते अगस्त माह में मॉरीशस में संपन्न 11वें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी के डिजिटलीकरण की दिशा में बढ़ते कदम के बारे में बहुत कुछ नया सामने आया।

मालूम पड़ा कि किस तरह से हिंदी अब डिजिटल रूप में हर किसी के लिए सहज होती जा रही है। इस लिहाज से हिंदी के प्रसार और उसकी स्वीकृति में यह बहुत अच्छा कदम माना जा सकता है। भारत सरकार की सी-डैक जैसी संस्थाएं हिंदी को डिजिटलाइज करने की दिशा में बहुत से नए सॉफ्टवेयर तैयार कर रही हैं ताकि अधिक से अधिक  युवा पीढ़ी इससे जुड़ सके। जहां तक ऐसे बड़े आयोजनों को और सार्थक और प्रभावी बनाने की बात है तो मेरा मानना है कि ऐसे सम्मेलनों को राजनीति से थोड़ा दूर रहना चाहिए।

यह हिंदी सेवियों, हिंदी प्रेमियों, हिंदी के विद्वानों और हिंदी साहित्यकारों का सम्मेलन होता है तो इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप कम होना चाहिए। इसके साथ ही हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकारों पर साहित्य अकादमी ने जो डॉक्यूमेंट्रीज बनाई हैं, उन्हें भी वहां दिखाना चाहिए, ताकि विदेशी हिंदी प्रेमियों को उन्हें जानने का मौका मिले। मेरा यह भी मानना है कि ऐसे सम्मेलन देश के बजाय विदेश में ही होने चाहिए, इससे उस देश के लोगों को भी हिंदी के बारे में जानने और समझने का अवसर मिलेगा, इसको और व्यापकता मिलेगी। विदेश में रहने वाले हिंदी शिक्षकों और विद्वानों को अनुदान देना चाहिए ताकि और लोग प्रोत्साहित हों।

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